Friday, 30 November 2018


                                 सपनों के सुलझे रहस्य 
              सपनों का संसार बहुत रोचक है | यह कोतुहल पैदा करता है की आखिर सपने हैं क्या ? कभी यह उम्मीद और जोश से भरे या फिर कभी डर से भी परिपूर्ण होते है | वैसे सपनों का सिलसिले वार आना नहीं होता | अभी एक पल में हम आसमान में उड़ रहे होते हैं की दूसरे ही पल हम पानी के बीच में होते हैं | कोई ओर छोर समझ में नहीं आता है और तो और हम अपने सपने याद भी नहीं रखते | पूरी जिन्दगी में हमें आठ दस सपने ही हैं जो पूरे के पूरे याद रहते है और अधिकतर वो, जो हाल ही के दिनों में आए हैं | जहां तक सपनों के सच होने की बात है वो तो केवल दो चार ही होते हैं जो हूबहू सच हो जाएं , लेकिन अगर दो चार सपने भी सच हो जाते हैं तो कैसे हो जाते हैं ? भविष्य की पूर्व जानकारी मिल जाती है तो कैसे ? क्या आने वाले समय में क्या होगा ये मालूम चल जाता है ? कुल मिला कर सपनों की दुनिया पूरी तरह से रहस्य की तरह है और इसलिए इसे सुलझाना बहुत रोमांचकारी है |

 एक बात जो मुझे समझ में आई कि जैसे जैसे हम अपने भीतर के मन को स्वच्छ करते चले जाते हैं हमारे सपने भी उसी हिसाब से स्वच्छ होते जाते हैं | मन को स्वच्छ करते रहने पर एक स्थिती ऐसी आती है जब हम कोई भी सपना नहीं देखते | यह स्थिती आती है, लेकिन बहुत कम लोगों में आती है | ऐसा कहते है की उस समय, हम एक तरह से जागते हुए भी सपने देखने लगते हैं | ये खुली आँखों के सपने होते हैं और वो भी इस तरह से कि सभी का निस्वार्थ रूप से, पूर्ण विवेक के साथ भला चाहने लगते हैं | उस स्थिती को भी सपना ही कहा जाता है क्यों कि तब हकीकत और सपने में कोई फर्क नहीं रह जाता, हम उसे होती हुई घटना कहें या सपना कोई फर्क नहीं पड़ता और तब हमारे सोने और जागने में कोई अंतर नहीं रहता |

 लेकिन सपनों को जानने से पहले हमें थोड़ा सा नींद के बारे में जानना पडेगा | हमें नींद क्यों आती है ? हमारी नींद का कारण क्या है ? वैज्ञानिक कहते हैं की हम काम करके थक जाते हैं तो हमें आराम की जरूरत होती है और हम सो जाते हैं | नींद में जब हम सोते हैं तो शिथिल पड़ जाते हैं, हमें होश ही नहीं रहता कि हम कौन हैं, क्या हैं ? हमारी बुद्धि शिथिल पड़ जाती है मगर हमारा मन जागता रहता है | यह मन तब पूर्णतया अपने हिसाब से चलता है और मजे की बात है कि सिलसिलेवार भी नहीं चलता | तो उस समय मन जो देखना चाहता है वो देख लेता है क्यों कि बुद्धि उस समय विकल हो जाती है |

एक मनुष्य अपने जीवन में एक तिहाई जीवन सो के बिताता है | बचपन में मनुष्य ज्यादा सोता है, करीब १८ घंटे तक सोता है | यह समय उसके विकास में सहायक होता है | फिर ज्यों ज्यों वो बड़ा होता जाता है उसकी नींद कम होने लगती है | वैज्ञानिकों का कहना है की एक वयस्क मनुष्य को ७-८ घंटे की नींद लेना आवश्यक है | शेष १५-१६ घंटे आदमी काम करता है | 

सही नींद का आना असल मायने में शरीर के थकने की वजह से होता है और शरीर थकता कब है ? शरीर मानसिक तौर पर थकता है इसलिए नींद हर मनुष्य को अलग अलग समय सीमा तक आती है | वैसे कहते हैं की जो मनुष्य प्रपंच नहीं करता उसे दो मिनट में कहीं भी नींद आ जाती है | इसे आजकल नैनो स्लीप का नाम दिया गया है | इस दो मिनट की नींद के बाद वो इंसान तरो ताज़ा हो जाता है |

तो कहने का मतलब है की एक स्थिती ऐसी आती है की उसे कुछ आराम चाहिए होता है और मनुष्य नींद ले लेता है | यह  स्थिति हर मनुष्य के साथ अलग अलग होती है कुछ लोग २४ घंटे में से पांच छः घंटा सो जाते है, कुछ तीन चार घंटा सो जाते है और कुछ लोग तो घंटा, डेढ़ घंटा ही सोते है   | ऐसा कम इसलिए होता है कि बहुत कम लोग नींद के आयाम के प्रति जागृत होते है | यदि हम सभी नींद के प्रति जागृत हो जाएं तो हम सभी ऐसे हो सकते है |

वैसे सामान्य अवस्था में नींद जब लेते हैं हम तो हमें सपने आते हैं | सपनों का अक्सर कोई सिर पैर नहीं होता | जागने पर हमें याद भी नहीं रहता की हमने क्या सपना देखा | कई बार हमें हमारी याददाश्त पर ज़ोर देना पड़ता है की हमने क्या सपना देखा | बचपन से हम सपने देखते आ रहे हैं और दो चार सपने हम ऐसे देख लेते हैं जो सच हो जाते हैं और यह बड़ी हैरान कर देने वाली बात है | कुछ  दिन पहले किसी अपने की मृत्यु के सपने देख लेना , परिवार में वंश वृद्धि के सपने देख लेना , अपनी तरक्की के सपने या किसी क्षेत्र में स्वयं के या किसी अपने के चयन हो जाने के सपने देख लेना यानी ऐसे सपने जो सच हो जाते हैं उन्हें देख लेना | वो सच हो जाते हैं और हम उन पर आश्चर्य करते रह जाते हैं की ये क्या हुआ और कैसे हुआ ?

यही वो प्रश्न हैं की जिनका उत्तर ढूँढना मेरे मस्तिष्क में आया | तब मैंने सपनों के बारे में विभिन्न लेखों को पढ़ा | फ्रायड को पढ़ा | चार्ल्स को पढ़ा | आचार्य श्री राम शर्मा को पढ़ा | फिर मुझे लगा कि विभिन्न धर्म भी तो हैं जो सपनों के बारे में बताते हैं ,तो मैंने उन्हें पढ़ा | मैंने हिन्दू धर्म में सपनों को पढ़ा, बुद्ध , महावीर , गुरु नानक , ईसा मसीह , मोहम्मद साहब में मैंने सपनों को पढ़ा | मैंने जरथ्रुस्त्र में सपनों को पढ़ा | मैंने जितने सपनों पर वीडियो हो सकते थे, उन्हें देखा | मैंने जितने नोबेल प्राइज जीते है उनमें से कितने लोग हैं जिन्होंने नोबेल प्राइज जीतने के पीछे अपने सपनों को श्रेय दिया है, ये जाना | मैंने रामानुजन को पढ़ा जो केवल ३३ वर्ष तक जीवित रहे और जिनके सपने में गणित के सूत्र आते थे और इनका कहना है कि इनकी कुल देवी इन्हें सपने में आ कर गणित के सूत्र बताती थी और इन्हें रायल फेलोशिप मिली हुई थी | मुझे ऐसा लगता है की मैंने सपनों को लेकर तमाम दुनिया की किताबों को छान लिया मगर ......... ? रहस्य रहस्य ही रहा, क्यों की मुझे अनुभव उस तरह का नहीं हुआ | जानकारी अवश्य हुई सपनों के बारे में और ये जानकारी जीवन में आगे आने वाले समय में सम्भव है कि मुझे अनुभव भी हो जाए | इस किताब में मैंने जो पढ़ा और और जो उसके बाद समझा है वो लिख दिया है | अब यात्रा इसके अनुभव की है | विभिन्न प्रकार से सो जाना और विभिन्न प्रकार की नींद लेना मनुष्य के अनुभव में आ जाए तो सपनों के सारे रहस्य सुलझ सकते हैं | 

के.बी व्यास 
( मेरी आने वाली पुस्तक "स्वप्न के सुलझे रहस्य" की भूमिका से उदृत )

Thursday, 1 March 2018


कैसे हो !

इस छोटे से वाक्य को अगर मुस्कुरा के कहा जाए तो शुरूआती बात तो वैसे ही बन जाए | एक पूरे दिन में इन्सान न जाने कितने लोगों से मिलता है | उसमें से अधिकतर जो मिलते हैं वो न जाने किस दुनिया में खोए रहते हैं | किसी को अपने परिवार की समस्या, किसी को अपनी नौकरी या व्यवसाय की समस्या, किसी को अपना बुढ़ापा सामने देख कर घबराहट होती है, किसी को रोग की समस्या और उसके बीच चलती हुई जिंन्दगी | ऐसे में कोई मुस्कुरा के पूछने वाला मिल जाए कि – कैसे हो ? तो अचानक जुबान पे  जवाब आता है कि – ठीक हूँ | यहाँ मुस्कुरा के पूछने वाली बात बहुत महत्वपूर्ण है | जिन्दगी एक जिन्दगी से पूछती है वो भी उल्लासित हो कर, तो चाहे कितना ही अवसाद में डूबा हुआ हो वो व्यक्ति उसे उम्मीद की किरण नजर आती है और वो कह बैठता है – ठीक हूँ | यहाँ से बात धनात्मक दिशा में शुरू होती है | 


उम्मीद का साथ हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए | एक न एक दिन हम जो चाहते हैं वो हमे मिल के रहता है | कितने ही तूफ़ान आ जाएं, कितनी ही आंधियाँ चलें वो इन्सान अपने पथ से कभी नहीं डिगता जो उम्मीद को साथ रखे है | ये आंधियां, ये तूफ़ान परीक्षाएं है इन्सान के समक्ष और कुछ नहीं हैं | ये हमारे भीतर रह रहे सत्य को प्रबल करने का साहस देती हैं | हम आंतरिक धरातल पर ऊपर उठते हैं | 

तूफ़ान और आँधियों को  पार पाने के लिए हमें उम्मीद का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए | आँख से आंसू चाहे हजार गिरें मगर एक दिन आता है जब विजय उद् धोष  हमारा ही होता है और हम उस समय भी हम अहंकार को करीब नहीं लाते | जो इन्सान इस तरह का जीवन जीता है वो महा - सम्राट है | उसे जीवन का अंतरतम मालूम है और उसे यह भी मालूम है कि क्या कर के हम कहाँ पहुचेंगें |


 तो मुस्कुरा के अगर किसी से पूछा कि – कैसे हो ? यह अपने आप में एक परिवर्तन लाता है और सुखद परिवर्तन लाता है | यह परिवर्तन बहुत बड़ा भी हो सकता है, ये बहुत छोटा हो सकता है लेकिन धनात्मक होता है | धनात्मक परिवर्तन अपने और दूसरों के जीवन में आना प्रगति का सूचक है | कैसे हो – ये मुस्कुरा के पूछना और मुस्कुरा के पूछने के साथ साथ आँखों में सामने वाले मनुष्य के लिए असीम गहराई का भाव भी अगर हो तो कहना ही क्या | पूरा का पूरा सामने वाला मनुष्य , कहने वाले के साथ एकाकार हो जाता है | इस तरह से अगर हम हर एक से अगर मुस्कुरा के पूछते चले जाएं कि – कैसे हो, तो हम शुरूआती सफलता प्राप्त कर सकते है – ये निश्चित है |


के.बी.व्यास