Sunday, 28 April 2013

जोधपुर यात्रा वृतांत (५ भागों की श्रंखला का भाग-२)

               जोधपुर यात्रा वृतांत (५ भागों की श्रंखला का भाग-२)


अदभुद संयोंगो के कारण दो बार टलते हुए, आखिर अंत में, बिना किसी अडचन के, अन्जाने में ही अपने आप पहले नवरात्रे के दिन, ११ अप्रेल गुरूवार को, नव वर्ष के उपलक्ष्य में, हंसराज जी महाराज के सेखाळा गांव के आश्रम जाने का कार्यक्रम तय हो गया.
डा.महेश चन्द्र व्यास जी की कार में, अरूण व्यास और सी.एस.पुरोहित प्रभु के साथ, जैसलमेर रोड पर बने गांव सेखाळा की ओर यात्रा सुबह सुबह शुरू हो गई.


 हंसराज जी महाराज के दर्शन और उनका सानिध्य सदैव एक अदभुत अनुभव हुआ करता है, बहुत सी बातें हर बार ऎसी होतीं हैं जो मिस्टिक होती हैं.
                                     


इस बार भी कुछ ऎसा ही हुआ. आश्रम में पहुंचते ही उनकी सौम्य मुस्कुराहट और आशीर्वाद ने ह्रदय भिगो दिया. हम सभी बैठ गए और पहले थोडी इधर उधर की बात कर के,हंसराज जी महाराज ने डेमोक्रेसी पर बोलना आरंभ किया, बहुत गहरे और अनूठे प्रयोगों के बारे जानकारी दी, कि किस तरह से एक बार एन आर आई युवाओं ने भारत का भाग्य बदलने की ठानी और तमिलनाडू में कुछ सीटें भी जीती. विश्व के विभिन्न देशों की राजनीति में क्या होता है? असल डेमोक्रेसी क्या है?


समाज एक नेता चुनता है फ़िर वे नेता कैसे अपने संकल्पों से बदल जाते हैं? आधुनिक विज्ञान की दिशा, ब्रह्मांड, ईथर,वारेन बफ़ेट,माइक्रो एटम, सिद्धों की परम्परा,मनोविज्ञान,चिकित्सा शास्त्र, सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व और उसके गुण, आदि विषयों पर पहले बहुत कुछ सुना था उनसे, लेकिन डेमोक्रेसी-राजनीति जैसे विषय पर मैं पहली बार उनके श्री मुख से कुछ सुन रहा था. शायद उन्हे आभास हो गया था कि रास्ते में हम लोग पुष्करणा एकता और हमारे समाज से एक एम पी के टिकट की राजनैतिक चर्चा कर रहे थे.अजीब संयोग था यह.

                      
पिछली एक भैंट के दौरान मैने उनसे कहा था " आप तो हज़ारों लोगों ने ज्ञान देवो सा, मने भी थोडो ज्ञान दे दो ताकि म्हारो भी कुछ भलो हु जा" उन्हौने हंस के उत्तर दिया "ज्ञान तो ऎडो हूवणों चईजे जिण सूं कोई फ़ायदो व्है, तू यूं कर सुबह ४ बजियों ऊठ ने नहा लिया कर" मेरी गाडी इस पहले पाठ पर ही अभी तक प्रयास रत है. तो इस बार की भैंट में राजनीति की चर्चा के बाद उन्हौंने विषय बदला और पुनः सुबह ४ बजे उठ कर नहा लेने के प्रभाव की चर्चा की, लेकिन इस बार थोडे विस्तार में.
उन्हौंने कहा " सुबह चार बजियों ऊठ ने नहा लेवण सूं एक आंतरिक परिवर्तन आया करे, जिना अनेकों अनेक लाभ हैं,...मतलब अपे होच नहीं सको वैडा लाभ है.जीवन मूल धरातल माते सुखद हूवण लाग जा, क्यूं कि अप्पे प्रकृति रे साथे हार्मनी में आ जाओं, सारी समस्याओं और दुःख प्रकृति रे साथे डिस-हार्मनी री वजह सूं आया करे" फ़िर उन्हौंने "एक" दिन की प्रकृति के बारे में बताया कि "सुबह ४ बजियों सूं १० बजियों तक रौ समय सात्विक गुण वाळो हुया करे,जिको ४ बजियों सूं आरंभ हू ने पहला तीन घंटे तक चढाव माते व्है और बाद में उतार माते व्है. पछे सुबह १० बजियों सूं शाम ४ बजियों तक रौ समय राजसिक गुण वाळौ व्है, जिको भी तीन घंटे चढाव पछे तीन घंटे उतार माते व्है, उन्ने पछे शाम ४ बजियों सूं रात १० बजियों तक रौ समय तामसिक गुणों वाळो व्है और औ भी तीन तीन घंटे रे चढाव उतार वाळो हुया करे. उन्ने बाद रात १० बजियों सूं सुबह ४ बजियों तक प्रकृति, आपरी तुरीय अवस्था में पाछी पूग जावे, याने खुद री मूल अवस्था में चली जावे, जिने आनंद री अवस्था भी कैया करे, जदै आ तुरीय अवस्था टूटे तो पुनः तीन गुणों में विभक्त हू ने बाकी रे १८ घंटो में बराबर बंट जावे. इण वास्ते सुबह ४ बजियों ऊठ ने नहा लेवण सूं जीवन में कई ऎसी बातों घटित हूवण लाग जा, ज्यों ने सामन्य तौर माते हमजाउण सूं संभवतः हमझ में नहीं आवे." आगे उन्हौंने कहा "अगर एक दिन ने ढंग सूं जी्वणो आ जा तो पूरौ जीवन ढंग सूं, पूरी हार्मनी रे सा्थे जियो जा सके, और एक दिन में भी अगर, उण दिन री सुबह ढंग सू जी लौं तौ पूरो दिन ढंग सू जियो जा सके"


इन सारी बातों के बाद आश्रम के खेत में श्रमदान कर के, प्रसादी ले कर हम पुनः जोधपुर की ओर निकल पडे.

सी.एस.पुरोहित प्रभु को लगा जैसे, सामाजिक, राजनैतिक और हर एक बात केवल उनके लिए ही कही जा रही हो. अरूण व्यास और डा. महेश जी व्यास प्रभु को भी आनंद आया. मुझे भी हर बार मेरे मन में उठते प्रश्नों का बिना पूछे उत्तर मिलता है, इस बार मेरे मन में चल रहे सामाजिक राजनैतिक मंथन से उपजे प्रश्नों का बिना पूछे उत्तर मिला और इस विषय पर दिशा मिली. इस बार की जोधपुर यात्रा में ऎसा आध्यात्मिक प्रसाद मिलना बहुत आनंददायक था,


 और अभी तक यह बात दिल में गहरे उतरी हुई है कि "अगर एक दिन ने ढंग सूं जी्वणो आ जा तो पूरौ जीवन ढंग सूं, पूरी हार्मनी रे साथे जियो जा सके, और एक दिन में भी अगर, उण दिन री सुबह ढंग सू जी लौं तौ पूरो दिन ढंग सू जियो जा सके"






Saturday, 27 April 2013

जोधपुर यात्रा वृतांत (५ भागों की श्रंखला का पहला भाग)


इस बार की जोधपुर यात्रा गुरू कृपा से बहुत रोमांचकारी रही. इस में ड्रामा भी था, एक्शन और इमोशन भी था,कौमेडी भी थी. पुष्करणा एकता की राजनैतिक सरगर्मियां थी, साफ़ा गुरू की पास, फ़ेल और सप्लीमेन्ट्री थी, फ़ेसबुक हस्तियों से सन्मुख मिल कर मधुर और आत्मीय संबन्धों का आगाज़ था, हाथी चौगान का निश्छल स्नेह बरस रहा था,यहीं पर स्वामी ईश्वरानंद जी के एक शिष्य के उदगार कि "गुरू कोई व्यक्ति नहीं गुरू तो एक तत्व है" जैसे ज्ञान व्याख्यान का लाभ मिल रहा था, लख जी की पौळ की आत्मीयता मन को भिगो रही थी,


 सी. आई.डी. वाले रात को एक खबर मिलते ही सरदारपुरा से रवाना हो रहे थे,और चर्चा के दौरान .."हमें राजनैतिक नेता नहीं वैचारिक नेता चाहिए" जैसे निष्कर्ष शेअर कर रहे थे. हाइकु किंग का फ़्रेंच कट अंदाज़ छा रहा था, रे-बैन अपने नन्हे रे बैन के साथ भूतनाथ में अभिषेक कर रहा था, चौ.हा.बो. की महान हस्तियां जालोरी गेट पर अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही थी,ज्ञापन की भाषा बनाने वाला और इसे टाइप करने वाला नींव की ईंट वाले काम कर रहे थे...



मुम्बई से ई मेल के ज़रिए नारे आ रहे थे, ७० से अधिक मोटर साइकिलों पर एक शिखाधारी, फ़ेवीकोल से नारे चिपका रहा था,



 

                                                       




कमला नेहरू नगर वाले चटखारे वाली तैरी का आनंद दिला कर पुरानी यादें ताज़ा करवा रहे थे, मिर्चीबडा कहीं १२ रू. कहीं १५ रू. प्रति नग होने के बावजूद हर दूसरे दिन सर चढ कर बोल रहा था. गेरों का, मेळे का, नवरात्रों का सांस्कृतिक-धार्मिक रंग परवान पर था, महान इतिहासवेत्ता स्व. श्री मीठालाल जी व्यास के दोहिते से पुष्करणा ब्राह्मणों के इतिहास पर चर्चा अत्यंत लाभकारी रही. मेरे अपने घर में कंस्ट्रकशन का काम चल रहा था और हर कारीगर मुझे "कमठा" की परिभाषा ठेठ ऊं ठेठ तक समझा रहा था,


एक दो शख्स रोज़ सुबह ५-६ बजे घण्टी कर रहे थे, सुबह ५-६ बजे से रात ११-३०//१२ बजे तक का समय पता नहीं कहां कैसे उड रहा था. जय प्रकाश नारायण आंदोलन से जुडा एक शख्स पाटोत्सवों के मूल कारणों की मधुर चीर फ़ाड कर के हास्य ज्ञान गंगा बहा रहा था और अपनी सुज़ुकी स्विफ़्ट में बिठा कर हंसराज जी महाराज के आश्रम तक बहुत अपनेपन से ले जा कर उनके सानिध्य में आंतरिक आनंद दिलवाने की प्रार्थना को मूर्त रूप देने का सहर्ष साधन बना था, मेरी स्कूल बालनिकेतन के परम श्रधेय बंधु जी के १०० वर्ष की आयु पूरी होने के उपलक्ष्य में, २२ वर्ष बाद अपने पुराने सहपाठियों के साथ बैठ कर बंधु जी एवम अपने गुरुजनों से आशीर्वाद लेने का सौभाग्य सुख दे रहा था,एक पुष्करणा फ़िल्म कलाकार के कठिन समय में एक चिकित्सक, कलाकार के आत्म सम्मान को बनाए रखते हुए सहायता पंहुचाने की मुहिम में जुटा था,

गायों की सेवा,पक्षियों की सेवा,रोगी सेवा,वानर सेवा,प्राणी मात्र की सेवा में लगे लोगों का सानिध्य मिल रहा था, इस बार की जोधपुर यात्रा में बडेरों के हाके भी थे और मित्रों के ठहाके भी थे. एक एक दिन रोमांच से भरा हुआ था

                               

 वाह क्या मौज बहार से लबरेज़ थी इस बार की जोधपुर यात्रा कि ह्रदय की आंतरिक परतों से सहज स्वतः ही निकलते हैं ये शब्द कि---समस्त पुष्करणा प्रभु की जय हो.