Saturday, 27 April 2013

जोधपुर यात्रा वृतांत (५ भागों की श्रंखला का पहला भाग)


इस बार की जोधपुर यात्रा गुरू कृपा से बहुत रोमांचकारी रही. इस में ड्रामा भी था, एक्शन और इमोशन भी था,कौमेडी भी थी. पुष्करणा एकता की राजनैतिक सरगर्मियां थी, साफ़ा गुरू की पास, फ़ेल और सप्लीमेन्ट्री थी, फ़ेसबुक हस्तियों से सन्मुख मिल कर मधुर और आत्मीय संबन्धों का आगाज़ था, हाथी चौगान का निश्छल स्नेह बरस रहा था,यहीं पर स्वामी ईश्वरानंद जी के एक शिष्य के उदगार कि "गुरू कोई व्यक्ति नहीं गुरू तो एक तत्व है" जैसे ज्ञान व्याख्यान का लाभ मिल रहा था, लख जी की पौळ की आत्मीयता मन को भिगो रही थी,


 सी. आई.डी. वाले रात को एक खबर मिलते ही सरदारपुरा से रवाना हो रहे थे,और चर्चा के दौरान .."हमें राजनैतिक नेता नहीं वैचारिक नेता चाहिए" जैसे निष्कर्ष शेअर कर रहे थे. हाइकु किंग का फ़्रेंच कट अंदाज़ छा रहा था, रे-बैन अपने नन्हे रे बैन के साथ भूतनाथ में अभिषेक कर रहा था, चौ.हा.बो. की महान हस्तियां जालोरी गेट पर अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही थी,ज्ञापन की भाषा बनाने वाला और इसे टाइप करने वाला नींव की ईंट वाले काम कर रहे थे...



मुम्बई से ई मेल के ज़रिए नारे आ रहे थे, ७० से अधिक मोटर साइकिलों पर एक शिखाधारी, फ़ेवीकोल से नारे चिपका रहा था,



 

                                                       




कमला नेहरू नगर वाले चटखारे वाली तैरी का आनंद दिला कर पुरानी यादें ताज़ा करवा रहे थे, मिर्चीबडा कहीं १२ रू. कहीं १५ रू. प्रति नग होने के बावजूद हर दूसरे दिन सर चढ कर बोल रहा था. गेरों का, मेळे का, नवरात्रों का सांस्कृतिक-धार्मिक रंग परवान पर था, महान इतिहासवेत्ता स्व. श्री मीठालाल जी व्यास के दोहिते से पुष्करणा ब्राह्मणों के इतिहास पर चर्चा अत्यंत लाभकारी रही. मेरे अपने घर में कंस्ट्रकशन का काम चल रहा था और हर कारीगर मुझे "कमठा" की परिभाषा ठेठ ऊं ठेठ तक समझा रहा था,


एक दो शख्स रोज़ सुबह ५-६ बजे घण्टी कर रहे थे, सुबह ५-६ बजे से रात ११-३०//१२ बजे तक का समय पता नहीं कहां कैसे उड रहा था. जय प्रकाश नारायण आंदोलन से जुडा एक शख्स पाटोत्सवों के मूल कारणों की मधुर चीर फ़ाड कर के हास्य ज्ञान गंगा बहा रहा था और अपनी सुज़ुकी स्विफ़्ट में बिठा कर हंसराज जी महाराज के आश्रम तक बहुत अपनेपन से ले जा कर उनके सानिध्य में आंतरिक आनंद दिलवाने की प्रार्थना को मूर्त रूप देने का सहर्ष साधन बना था, मेरी स्कूल बालनिकेतन के परम श्रधेय बंधु जी के १०० वर्ष की आयु पूरी होने के उपलक्ष्य में, २२ वर्ष बाद अपने पुराने सहपाठियों के साथ बैठ कर बंधु जी एवम अपने गुरुजनों से आशीर्वाद लेने का सौभाग्य सुख दे रहा था,एक पुष्करणा फ़िल्म कलाकार के कठिन समय में एक चिकित्सक, कलाकार के आत्म सम्मान को बनाए रखते हुए सहायता पंहुचाने की मुहिम में जुटा था,

गायों की सेवा,पक्षियों की सेवा,रोगी सेवा,वानर सेवा,प्राणी मात्र की सेवा में लगे लोगों का सानिध्य मिल रहा था, इस बार की जोधपुर यात्रा में बडेरों के हाके भी थे और मित्रों के ठहाके भी थे. एक एक दिन रोमांच से भरा हुआ था

                               

 वाह क्या मौज बहार से लबरेज़ थी इस बार की जोधपुर यात्रा कि ह्रदय की आंतरिक परतों से सहज स्वतः ही निकलते हैं ये शब्द कि---समस्त पुष्करणा प्रभु की जय हो.

                                       

No comments:

Post a Comment