दान पुण्य और उनका प्रचार
दान पुण्य करने से सौभाग्य बढता है और दूसरों को दान पुण्य के लिए प्रेरित करने से सौभाग्य द्रुत गति से बढता है. लेकिन स्वयं दान पुण्य करना और साथ में स्वयं ही उसका प्रचार कर देना, अर्जित सौभाग्य को बहुत क्षीण करता है और साथ में चित्त में दोष भी लगाता है. दान पुण्य का प्रचार कब और कैसे करना चाहिए यह एक अत्यंत गहरी सोच का विषय है. समाज के हर महान संत ने कई वर्षों तक अपने द्वारा किए गए दान पुण्य को प्रकट नहीं किया. गुरुदेव श्री रामऋषी महाराज ने अनगिनत रुप से दान किए और अनगिनत लोगों का भला करके पुण्य कार्य किए, लेकिन स्वयं अपने मुंह से अपने द्वारा किए हुए एक भी कार्य को नहीं गिनाया.फ़िर भी बहुत सारे लोगों में आज भी निःस्वार्थ सेवा परिपक्व होकर समाज का भला कर रही है. यह एक ही उदाहरण काफ़ी है जिस पर हमें गहन चिन्तन करना चाहिए. अपने गुरू के सानिध्य पथ पर चलते हुए श्री रामऋषी महाराज पहले कई वर्षों तक मौन रहे, और जब मौन टूटा तो कन्या स्कूल के प्रोजेक्ट के साथ.
अक्सर यह भ्रम पैदा होता है कि अगर हम दान पुण्य के कार्य का प्रचार नहीं करेंगे तो अन्य लोगों को पुण्य कार्यों के लिए प्रेरित कैसे करेंगे? बस यहीं पर बहुत बडी चूक हो जाती है. क्यों कि हम अज्ञानता वश इस बात से अन्जान रहते हैं कि पुण्य कार्यों का प्रचार होने से पहले पुण्य कार्य भीतरी परतों में पुष्ट होने चाहिए, पकने चाहिए. जब हमारे भीतर हमारे द्वारा किए गए पुण्य कार्य पक जाते हैं तो वे हमें परम सत्ता के करीब ले जाते हैं, अगर पहले क्षण दान पुण्य किया और दूसरे ही क्षण उसका प्रचार भी कर दिया या स्वयं दान पुण्य कर के अपने जीवन के दिनों में स्वयं ही उनका प्रचार कर दिया तो ऎसा दान पुण्य हमारे जीवन की भीतरी परतों में पुष्ट होने से, पकने से वंचित रह जाता है. इसलिए विवेक शील लोग दान पुण्य अपने गुरू के नाम से करते हैं, और उस गुरू के नाम से करते हैं जिनके सानिध्य में रह कर उन्हौंने निर अहंकार रहने का पाठ पढा हो.
दान पुण्य आदि सभी, धर्म के दायरे में आते हैं और धर्म की शिक्षा गुरू के सानिध्य में ही ली जाती है, जब तक जीवन में गुरू नहीं आते किसी भी तरह का दान पुण्य करने से किसी न किसी तरह के दोष लगते ही लगते हैं. गुरू के नाम पर दान पुण्य करने से स्वयं का चित्त, दोष मुक्त रहता है. मन का भाव मात्र दान पुण्य करना ही होना चाहिए, उसके प्रचार की तरफ़ कतई ध्यान नहीं देना चाहिए जब तक गुरु का
आदेश न हो, चाहे कोई इसका नोटिस ले या न ले.
दान पुण्य के कर्म को जीवन के अन्तर्मन में सशक्त करते रहना चाहिए, और कभी किसी से तुलना भी नहीं करनी चाहिए कि किसने कितना दान पुण्य किया. यह केवल सदगुरू ही जान सकते हैं किसके दान पुण्य में कितना माहात्म्य है. पाप हमें यह तर्क देकर कि "तुम्हारे पुण्य कार्य के प्रचार से अन्य लोग भी पुण्य कार्यों में प्रेरित होंगे" हमारे भीतर पुण्य को पकने से रोक देता है, प्रचार युक्त दान
पुण्य से जो भी व्यक्ति जुडा वो भी पुण्य को अपने भीतर पकने के बजाय उसके प्रचार में लग जाता है फ़िर एक के बाद एक सभी तोला भर पुण्य कर के मण भर उसके प्रचार में लग जाते हैं और इस तरह एक भी व्यक्ति के अंतस में पुण्य प्रखर नहीं हो पाता, सभी उथले
में रहते हैं और पाप अपना उद्देश्य हासिल कर लेता है.
आधुनिक समय में गुरुदेव श्री हंसराज जी जो कर रहे हैं वह भी चिंतन का विषय होना चाहिए. पूरे बीस वर्षों तक पहले उन्हौंने सिद्ध नाथ में बैठ कर अपने गुरू नेपाली बाबा के भौतिक और सूक्ष्म शरीर के सानिध्य में रहकर अपने पुण्य को पुष्ट किया और फ़िर करोडों रूपयों की राशि और हज़ारों संस्कारी लोग उनके द्वारा आरंभ किए दान पुण्य की धारा को आगे बढाने के लिए साथ आ गए, एक आश्रम बना
दिया और उनसे वहां रहने के लिए आग्रह किया. वे वहां आ तो गए लेकिन उन्होने कहा है
कि “मैं किसी भी दिन यह स्थान छोड कर जा सकता हूं” .
इस तरह परम सत्ता स्वयं संस्कारी लोगों को आगे लाती है और किए गए पुण्य कार्यों का किन्ही अन्य संस्कारी लोगों द्वारा प्रचार होता है.अभी तक गुरु हंसराज जी ने न तो कोई ट्रस्ट खोला है, न कोई रसीद कटती है न कोई बैनर पोस्टर लगता है, न किसी तरह का
योजना बद्ध प्रचार होता है, लेकिन फ़िर भी हज़ारों लोगों के अंतस में वे पुण्य कार्य करने की चेतना पैदा कर चुके हैं...उनके आश्रम में वहां एक गौशाला भी चलती है, वहां हज़ारो लोग उनके सानिध्य में बैठ कर आध्यात्म की गहराइयों का आनंद भी लेते हैं.
यह दूसरा जीवंत उदाहरण है जिस पर हमें चिंतन करना चाहिए.
आचार्य श्री राम शर्मा की पुस्तक " हमारी वसीयत और विरासत" उन्हौंने अपने जीवन काल में ही लिखी थी मगर उनका आदेश था कि यह पुस्तक उनके देह त्याग के बाद छापी जाय.क्या वजह रही होगी इस निर्णय के पीछे? यह हमारे चिंतन का विषय होना चाहिए. युग निर्माण योजना का कब और कैसे प्रचार प्रसार आरंभ हुआ, गुरूवर जब १५ वर्ष के हुए और १६वें वर्ष में प्रवेश किया तब उनका अपने गुरू से साक्षात्कार हुआ, फ़िर २४ वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ का आहार, और अखण्ड दीपक के सामने २४ गायत्री पुरश्चरण किए. फ़िर कैसे कब और किन लोगों का सहयोग मिला यह सब जानना चाहिए ताकि हम भी सही मार्ग पर चल सकें.
जितना दान पुण्य करना महत्वपूर्ण है उतना ही उसके प्रभाव को अपने अन्तर्मन में पकने देना, पुष्ट करना भी आवश्यक है. जहां तक दान पुण्य के प्रचार और युवाओं में इस भावना को प्रबल करने की बात है तो ऎसा संकल्प किसी गुरू परम्परा को आगे ले जाने के तहत ही होना चाहिए. जो समर्पित शिष्य होते हैं उन्हीं में गुरू तत्व प्रखर हो कर उदय होता है. आखिर हमारे बुज़ुर्गों ने बहुत सोच समझ कर ही यह कहा होगा कि अगर एक हाथ से दान पुण्य करो तो दूसरे हाथ तक को पता नहीं चलना चाहिए. वे चाहते थे कि हमारे पुण्य कार्य पूरी तरह से पकें और हमारी अंतर्चेतना की जडों तक उनका प्रभाव पंहुचे.
( यह लेख मेरे अपने विचारों की अभिव्यक्ति है, आप इससे सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है, उचित समझें तो जहां आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा जहां असहमति हो उसका कारण शेअर कीजिएगा ताकि चिंतन और प्रखर हो सके, फ़लस्वरूप संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिले)
के.बी.व्यास
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लेखक की अनुमति लेना आवश्यक है. सर्वाधिकार, पुष्करणा शोध प्रकाशन, नैक्स जेन ईवेन्ट्स एम.एफ़.ज़ेड.ई., रैक मीडिया सिटी, रस अल खैमाह, संयुक्त अरब अमीरात के पास सुरक्षित हैं
प्रिय संजय जी,
ReplyDeleteआपने मेरे विचारों को पढ़ा और अपनी स्वस्थ प्रतिक्रिया दी इसके लिए आपका धन्यवाद ! वैसे मुझे लगा था कि मैने तकरीबन सभी आयामों पर अपनी बात कह दी है लेकिन फिर भी सम्भव है कोई बात स्पष्ट न हुई हो तो आपकी शंकाओं और जिज्ञासाओं के यथोचित निवारण का प्रयास करुंगा. पहली बात जो आपने लिखी
“प्रथम तो यह कि आपने परम पूजनीय गुरूदेव श्री रामऋषि महाराज व परम पूजनीय गुरूदेव श्री हंसराज जी महाराज का उदाहरण देकर यह बताने की चेष्टा की कि दान जितना गुप्त रहे अच्छा है लेकिन यहां मेरा प्रश्न यह है कि इन दो महान विभूतियों की तुलना हमें अपने आप से नही करनी चाहिए”
यह तुलना नहीं उनके द्वारा जिए गए आदर्शों के अनुसरण की बात है,उनके द्वारा जिए गए उच्च आदर्शों को आत्मसात करने की बात है, जिसका प्रयास हमें करना चाहिए.
दूसरा आपने लिखा “गीता में भगवान कृष्ण ने भक्ति के जो मार्ग है उनमें से दान को भी ईश्वर प्राप्ति का एक मार्ग बताया है”
सही बात है....लेकिन जरा ध्यान दीजिए मैने दान पुण्य को गलत नहीं बताया बल्कि यह लिखा था कि दान पुण्य का “प्रचार” कब और कैसे करना चाहिए यह एक अत्यंत ही गहरी सोच का विषय है, और मेरा लेख इसी बात को गहराई से झांकने का प्रयास करता है. इसी प्रक्रिया के दौरान मुझे सभी संतो में एक कॉमन सोच दिखी जिसका मैने ज़िक्र किया.
आपकी निजी सोच का मैं सम्मान करता हूं. अंत में व्यक्ति को सभी की सुन कर अपने विवेक से निर्णय लेना चाहिए.
जो कुछ भी मैने लेख में लिखा यह मेरा विभिन्न गुरुओं के जीवन से सीख लेने के बाद का चिंतन है, जिसे सबके साथ शेअर किया है आप हो सकता है इससे सहमत ना हों यह आपकी स्वतंत्रता है. आपकी निजी सोच का मैं सम्मान करता हूं. अंत में व्यक्ति को सभी की सुन कर अपने विवेक से निर्णय लेना चाहिए.