दो कान, दो आँखें और एक मुँह
कुछ लोग बोलते हैं तो इतना बोलते
हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि क्या बोल गए | वे सामने वाले की सुनते ही नहीं
| ऐसा लगता है उन्हें एक मुँह और मिल गया हो | जब दो लोग ऐसे मिल जाएँ तब किसी को
किसी की बात समझ नहीं आती और जब १० में से ८ लोग ऐसे मिल जाएँ तब तो वहाँ बंटाधार
है | एक की बात पूरी नहीं होती तो दूसरा शुरू हो जाता है , दूसरे की बात पूरी नहीं
होती तो तीसरा अपनी बात कहने लगता है , फिर चौथा शुरू हो जाता है , फिर पाँचवाँ ,
फिर छटा, फिर सातवाँ और इस तरह पूरी धमाचौकड़ी मच जाती है | ऐसे लोगों को एक नेक
सलाह है कि हमे सुनने के लिए दो कान और बोलने के लिए एक मुँह मिला है | हमें
दुगुना सुनना है और उस हिसाब से आधा बोलना है | हमें दुगुना पढ़ना है और देखना है
तब आधा बोलना है | यह करना कठिन है | जो इंसान जागा हुआ हो वही कर सकता है |
सबसे पहले दो कान और एक मुँह को लेते हैं | असल में दुनिया में हमें सबको
सुनना चाहिये और भरपूर सुनना चाहिये | जो इंसान सब की सुन लेता है जाग कर, वो महान
व्यक्ति है | जब हम विभिन्न इंसानों को सुनते है तो हमारा नजरिया बिल्कुल अलग हो
जाता है | अलग अलग दृष्टिकोण सुनने को मिलते हैं | हो सकता है एक दृष्टिकोण दूसरे
दृष्टिकोण से भिन्न हो और यहाँ तक कि दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत भी हो सकते
हैं , मगर एक पॉइंट पर आकर सारे दृष्टिकोण एक हो जाते है |
उदाहरण के तौर पर मैं यहाँ विभिन्न
धर्मों को लेता हूँ | धर्म यूं तो सभी अलग अलग हैं मगर शान्ति हो दुनिया में यह
सारे धर्म चाहते हैं | तो यह एक कौमन दृष्टिकोण हो गया | विभिन्न धर्म सबसे अधिक
विरोधाभासी लगते हैं | जिन लोगों को सभी धर्मों में एकाकार मिल जाता वो सही मायने
में दो कान, दो आंख और एक मुँह वाली बात को साकार करते है | अपनी बात को दृढ़ता
पूर्वक संक्षेप में कह के हमें दोनों कानों से सामने वाले की बात सुननी चाहिये और
अपने मस्तिष्क को खुला रखना चाहिए |
अब दो आँखे और एक मुँह को लेते है |
हमें दो आँखे मिली हैं पढ़ने के लिए, देखने के लिए | तो हमे दुगुना पढ़ना चाहिए और
उस हिसाब से बोलना चाहिये | हमें लोगों को दुगुना देखना चाहिये | उन्हें देखने के
बाद , अपने भीतर निरीक्षण करना चाहिये | लोगों को देखने के बाद ही हम ये जान सकते
हैं कि इसका नजरिया क्या है | जब पढ़ने की बात चली है तो इस दिशा में अथाह सागर है
| हम सारी उम्र तक पढ़ सकते है | जीवन की आखिरी साँस तक पढ़ सकते हैं | जितनी भाषाएँ
हम जानते है , हम उतना पढ़ सकते है | विभिन्न जीवनियाँ हैं , कहानियाँ हैं ,
कविताएँ हैं , आलेख हैं, शायरी है , रुबाई है , गजल है और भी कितनी विधाएं है |
जैसे अभी पूरे विश्व में कविता का नया रूप आया है - हाइकु | जो मूलतः तो
जापान से आया है , मगर अलग अलग भाषाओं में भी लिखा जा रहा है | इसमें तीन लाइने
होती हैं और तीनों लाइने अलग अलग होती हैं | कोई भी एक दूसरे से मेल नहीं खाती |
पहली पंक्ति में ५ अक्षर , दूसरी में ७ अक्षर और तीसरी में पुनः ५ अक्षर होते हैं,
मगर जब तीनों पंक्तियों को एक साथ पढ़ा जाए तो एक भाव उभर के आता है | जिसे हाइकु कहते
हैं |
तो इस तरह पढ़ने के लिए
अथाह सागर है | जिसने जितनी भाषाएँ सीख ली उस इंसान का उतना विस्तार हो गया |
अकेले भारत में ही इतनी भाषाएं हैं कि हम उनके साहित्य को अगर पढ़तें जाएँ तो हमारी
उम्र निकल जाए |
इंसान जितना ज्यादा सुनता है
और पढ़ता है तथा लोगों को देखता है , उसे बात उतनी गहरी समझ में आती है | उसे लोगों
के बीच में रहना अच्छा लगता है | उसके बाद वो अपनी बात अगर बोले तो उसकी बात का
असर होता है | तो हम जितना बोलते हैं उससे दुगुना हमें सुनना चाहिये और जितना
बोलें उससे दुगुना पढ़ना व देखना चाहिये | ऐसा अगर हम करें तो जीवन सार्थक हो जाता
है |
के.बी.व्यास
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