Monday, 14 August 2017

प्रश्न का मनोविज्ञान
हर इंसान कभी ना कभी किसी ना किसी बात पर प्रश्न जरुर पूछता है | पूछा जाने वाला प्रश्न हमारी आंतरिक अवस्था का स्पष्ट प्रतिरूप होता है | जो मन के भीतर होता है वो अपनी अभिव्यक्ति में कई बार प्रश्न बन के भी उभरता है | 


यह जरूरी नहीं की जो हम प्रश्न हम पूछ रहे उसका उत्तर हम जानते नहीं, बल्कि कई बार सामने वाले को परखने के लिए भी हम प्रश्न पूछते हैं | भेद निकालने के लिए प्रश्न पूछते हैं और कई बार बात को भटकाने के लिए हम प्रश्न पूछते हैं | कई बार हम वाकई कोई प्रश्न पूछ रहे होते हैं जिनका उत्तर हमें पता नहीं होता | जब उत्तर कोई दे देता है तो हम उसे अपना बना कर पेश करते हैं | यंहा सबसे बड़ा रोड़ा आता है अहंकार का | पहले तो कई प्रश्नों के उत्तर ही हमें मालूम नहीं होते जब उत्तर मालूम हो जाते हैं तो हम ज्यादातर ये बताना नहीं चाहते कि उत्तर किसने दिया है | 
 हर उत्तर के पीछे बुद्धि और विवेक का हाथ होता है | किसी प्रश्न के उत्तर की खोज करना मनुष्य का स्वभाव है | मनुष्य अपने प्रश्नों के बल बूते पर ही आज यहाँ तक पहुचा है | विज्ञान का तो आधार ही प्रश्न है , बिना प्रश्न के कोई बात ही नहीं होती | प्रश्न पूछा फिर उसका उत्तर मिल जाता है, अब उसका आगे जाने पर उसका उत्तर कुछ नया होता है | प्रश्न वही रहता है मगर विज्ञान में उत्तर बदलते रहते है | आज के जमाने में इसे विज्ञान की प्रगति कहा जाता है |
 एक बात तो तय है की जो भी प्रश्न हमने पूछा है हमारे भीतर उसका उत्तर मौजूद है | जिसका उत्तर हमें मालूम नहीं उसका प्रश्न भी नहीं बन सकता | चाहे हम कोई भी प्रश्न सोच लें, चाहे कहीं से चलकर वो प्रश्न हमारे मस्तिष्क में आया है , हमारे मस्तिष्क में वही प्रश्न आएगा जिसका उत्तर हमारे भीतर होगा, इसलिए उत्तर देने से ज्यादा प्रश्न की गहराई क्या है यह जानना बहुत आवश्यक है | जैसे जैसे बुद्धि और विवेक सघन होते चले जाते हैं हमारे प्रश्न उसी हिसाब से बदलते जाते हैं | एक अवस्था वो आती है जब कोई प्रश्न नहीं रहता क्यों की तब तक सारे उत्तर मिल चुके होते हैं, विज्ञान तब शिशु लगता है क्यों की उसका प्रश्न तो वही होता है लेकिन उत्तर बदलते रहते हैं |
 

अपने बारे में, अपने परिवार के बारे में , समाज के बारे में, देश – दुनिया के बारे में, पूरे संसार के ओर-छोर के बारे में, इस सौरमंडल के बारे में, आकाशगंगा और पूरे ब्रह्मांड के बारे में प्रश्न उठ सकते है | इसलिए कहा गया है की प्रश्न की गहराई जानने का प्रयास करना चाहिए, जिस दिन बुद्धि और विवेक पूरे परिपक्व होंगे उस दिन प्रश्न का उत्तर हमें मिल जाएगा |
उत्तर सभी प्रश्नों के जीवन की भीतरी परतों में छुपे रहते हैं | सतह पे उत्तर भी होते हैं लेकिन केवल प्रश्न ज्यादा उठते है , जिन्हें सुनकर जानकार व्यक्ति ये पता लगा सकता है कि मनुष्य की आदत क्या कह रही है | इसी वजह से जितना ज्यादा मनुष्य और लोगों से मिले, जितना ज्यादा बात करे, जितना ज्यादा समझने की कोशिश करे उतना ज्यादा वो परिपक्व होता चला जाता है और इसका कोई अंत नहीं |


के. बी. व्यास


जीने की कला
एक पूरा जीवन जीने के बाद जब मृत्यु आती है तो कुछ लोगों को डर लगता है, कुछ को बहुत अटपटा लगता है बड़ा अजीब लगता है कि ये क्या हो रहा है मगर कुछ हैं जो बहुत शान्ति से मरते है | पूरी जिन्दगी हमारे सामने कुछ ही देर में एक फिल्म की तरह घूम जाती है | हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने किस किस को सुख दिए और किस किस को दुःख दिए | मृत्यु के समय हमारी त्वचा और हड्डियों के बीच में एक हवा चलती है | जिसने सारी उम्र लोगों को दुःख दिए ये हवा बहुत डराती है, वो इंसान पसीने पसीने हो जाता है उसे घबराहट होने लगती है, वो कुछ कह नहीं पाता लेकिन उसे भीतर ही भीतर पता चलने लगता है कि उसने क्या किया है |

वहीं दूसरी ओर अच्छे कर्म करने वालों के भीतर ये हवा बहुत सुहानी लगती है, उन्हें भरपूर आनन्द आता है, उन्हें अहसास होने लगता है कि उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है | अंतिम समय में मन का अहसास मनुष्य को बता देता है कि उसने क्या किया | अक्सर हमने कुछ लोगों को अपने अंतिम समय में माफ़ी मांगते हुए देखा है | सारी उम्र जिससे दुश्मनी रही उससे क्षमा मांग ली जाती है | कहते हैं उसका अंतिम समय आ गया है, इसलिए जो कर दिया वो बदल तो नहीं सकता क्षमा मांग सकता है और उसका फल भोग सकता है | यही उसके बस में होता है और यह एक बहुत बड़े परिवर्तन का सूचक है |

जीने की कला आनी चाहिए | जीते जी जो सुख से जीता है वह मृत्यु पर भी सुखी है | जो व्यक्ति जीते जी दूसरों के भले के बारे में सोचता है और कर देता है उतना ही वो सुखी होता है | इसलिए हमें लोगों की सुननी और समझनी तो चाहिए, मगर फिर अपने विचारों में डूब कर चितंन मनन करना चाहिए और अंत में वही करना चाहिए जो सही हो | बुद्धि पूछ सकती है कि सही और गलत का निर्णय कौन करेगा ? तो वो हमारा मन करेगा | मन के भाव सब खेल खेलते हैं इसलिए निरंतर मन के भावो को ऊपर उठाना चाहिए, यही जीने की कला है |
के.बी.व्यास
( मेरी पुस्तक “सहज अभिव्यक्ति” से उदृत )