Monday, 14 August 2017



जीने की कला
एक पूरा जीवन जीने के बाद जब मृत्यु आती है तो कुछ लोगों को डर लगता है, कुछ को बहुत अटपटा लगता है बड़ा अजीब लगता है कि ये क्या हो रहा है मगर कुछ हैं जो बहुत शान्ति से मरते है | पूरी जिन्दगी हमारे सामने कुछ ही देर में एक फिल्म की तरह घूम जाती है | हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने किस किस को सुख दिए और किस किस को दुःख दिए | मृत्यु के समय हमारी त्वचा और हड्डियों के बीच में एक हवा चलती है | जिसने सारी उम्र लोगों को दुःख दिए ये हवा बहुत डराती है, वो इंसान पसीने पसीने हो जाता है उसे घबराहट होने लगती है, वो कुछ कह नहीं पाता लेकिन उसे भीतर ही भीतर पता चलने लगता है कि उसने क्या किया है |

वहीं दूसरी ओर अच्छे कर्म करने वालों के भीतर ये हवा बहुत सुहानी लगती है, उन्हें भरपूर आनन्द आता है, उन्हें अहसास होने लगता है कि उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है | अंतिम समय में मन का अहसास मनुष्य को बता देता है कि उसने क्या किया | अक्सर हमने कुछ लोगों को अपने अंतिम समय में माफ़ी मांगते हुए देखा है | सारी उम्र जिससे दुश्मनी रही उससे क्षमा मांग ली जाती है | कहते हैं उसका अंतिम समय आ गया है, इसलिए जो कर दिया वो बदल तो नहीं सकता क्षमा मांग सकता है और उसका फल भोग सकता है | यही उसके बस में होता है और यह एक बहुत बड़े परिवर्तन का सूचक है |

जीने की कला आनी चाहिए | जीते जी जो सुख से जीता है वह मृत्यु पर भी सुखी है | जो व्यक्ति जीते जी दूसरों के भले के बारे में सोचता है और कर देता है उतना ही वो सुखी होता है | इसलिए हमें लोगों की सुननी और समझनी तो चाहिए, मगर फिर अपने विचारों में डूब कर चितंन मनन करना चाहिए और अंत में वही करना चाहिए जो सही हो | बुद्धि पूछ सकती है कि सही और गलत का निर्णय कौन करेगा ? तो वो हमारा मन करेगा | मन के भाव सब खेल खेलते हैं इसलिए निरंतर मन के भावो को ऊपर उठाना चाहिए, यही जीने की कला है |
के.बी.व्यास
( मेरी पुस्तक “सहज अभिव्यक्ति” से उदृत )

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