Sunday, 1 October 2017

कर्मों का आरम्भ
कर्मों का महत्व है और जागे हुए लोग इसका सही मूल्यांकन कर सकते हैं | हम हर समय कोई ना कोई कर्म अवश्य करते हैं, मगर एक समय बाद उन कर्मों के करने में हमारे गुरु की प्रेरणा भी हमारे साथ होती है | कर्म तो हम ही करते हैं परन्तु एक प्रेरणा हमारे साथ होती है जो दिशा निर्देश देती रहती है | गुरु – शिष्य का सम्बन्ध फिर प्रगाढ़ होता चला जाता है | एक स्थिति पर आकर गुरु – शिष्य दोनों एक हो जाते हैं, और उनमें कोई फर्क नहीं रह जाता | यह जागृति की स्थिति है |

कुछ लोगों के जीवन में गुरु नहीं होते मगर किसी व्यक्ति की प्रेरणा से वो प्रभावित होता है | उसने जिस तरह से जीवन में कोई कार्य किया हम भी अमूमन वैसा ही करना चाहते हैं | संगीत के क्षेत्र में, कला के क्षेत्र में, कानून के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में, आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में, आजकल तो व्यापार और प्रबन्धन के क्षेत्र में भी लोग उसकी ओर नजर डालते है जिसकी प्रेरणा और दिशा - निर्देश उन्हें लक्ष्य पर पंहुचा दे | तो इस तरह से ही जो जीवन में प्रेरणा दे दे और दिशा – निर्देश दे दे वो गुरु होता है |

लेकिन आपने सोचा है कभी कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए ? कर्मों के आधार पर ही हमारा जन्म होता है और कर्मों के आधार पर ही हमारी मृत्यु हो जाती है | मगर ये सिलसिला कब से चल रहा है ? हम हर पल नया कर्म कर रहे हैं और न जाने कब से कर रहे हैं | मगर इसकी कहीं तो शुरुआत होगी, कहीं तो इसका आरम्भ हुआ होगा | तो ये कर्म हमने सौ, दो सौ , चार सौ , हजार वर्ष पहले, दस हजार वर्ष पहले, लाखों, करोड़ो, अरबों, खरबों, अनंत वर्षों पहले से, अनगिनत, असीमित और असंख्य वर्षों पहले से कर रहे हैं | वो तब से हमीं में सुरक्षित पड़ा हुआ है और जैसे जैसे हम जागृत होते हैं वैसे वैसे हम इन्हें देख सकते हैं |

कर्मों को करने से उनके फल भी सामने आए और अच्छे और बुरे कर्म भी सामने आए | स्त्री रूप भी सामने आया और पुरुष रूप भी सामने आया | फिर दो तरह के व्यक्ति बने, सज्जन व्यक्ति और दुर्जन व्यक्ति | हालंकि दोनों आपस में परिवर्तनशील हैं | इसलिए सज्जन व्यक्ति को हर पल जागरूक और सजग रहना पड़ता है, मगर वो भी चूक सकता है इसलिए गुरु की आवश्यकता होती है, जिससे वो कभी चूके नहीं |

वैसे हम आपनी बुद्धि का केवल ५% हिस्सा उपयोग में लेते हैं, कुछ लोग अपनी बुद्धि का ७% हिस्सा उपयोग में लेते हैं उन्हें हम बुद्धिमान कहते हैं, आइन्स्टाइन तो अपनी बुद्धि का १२% उपयोग में लिया करता था ये वैज्ञानिक बता चुके हैं | तो अगर हम बाकी की बुद्धि का भी उपयोग कर लें तो हमें मालूम चल जाएगा कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए | यदि हम जागृत अवस्था में आ जाएं तो हमें मालूम हो जाएगा कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए और उन्हें करते करते हम कैसे आज की स्थिति तक पंहुचे हैं | निरन्तरता के नियम के आधार पर हम जागृत होने की ओर आगे बढ़ते रहें तो हम उस मूलभूत स्थिती को प्राप्त कर सकते हैं , जिसे पूर्णतया जागृति कहते हैं | तब हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए थे |

के.बी.व्यास

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