Monday, 7 November 2016

  मृत्यु सहज है
                    अधिकांशत लोग मृत्यु के नाम से ही डर जाते है मगर इसमें डरने वाली बात बिलकुल भी नहीं है | जो जन्मा है वो मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा | समस्या तब आती है जब हम किसी की असमय मृत्यु देख लेते हैं , और असमय तो हम कहते हैं असल में वो होती अपने समय पर ही है | जो मृत्यु को प्राप्त हुआ है वो अपनी आगे की यात्रा पर जा चुका है | यह समझना बहुत जरूरी है वरना हम अपने मन के भावों से उसके भी आगे की यात्रा को बाधित करते है | अगर हम दुःख में रोते है तो वो भी रोएगा और यदि हम सुख से उसे याद करते हैं तो वो भी सुखी होगा, यह कर्मों का अंतरसंविधान है |
              जन्म और मृत्यु एक चक्र के समान हैं | ये बात हमको पता है मगर चूंकि हम इंसान हैं और इंसान के भावों में मोह एक ऐसी भावना होती है जो सारी बात का मूल है | मोह से धीरे धीरे ऊपर उठ कर हम प्रेम के धरातल पर पंहुचते है और प्रेम के धरातल पर पंहुचने के बाद हम देखते हैं कि जन्म और मृत्यु तो सहज है ये तो जीवन का वो अंश है जो हमने धरती पर जिया | जीवन तो अनंत है , अनादि है | ये कभी जन्मा ही नहीं तो इसे मृत्यु कैसे छू सकती है | ये तो जन्म और मृत्यु से परे की बात है , मगर इस छोटी सी बात को आत्मसात करने में हमें समय लगता है 
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                 मोह हमारे अहंकार का द्योतक है | मोह में हम बाहरी आवरण तो प्रेम जैसा ले लेते हैं मगर भीतर में अहंकार इस मोह को पोषण देता रहता है | मोह में हम मन ही मन में अपने प्रति या किसी और के प्रति इतना भावुक हो जाते हैं कि हमारी विवेक क्षमता क्षीण हो जाती है | हम उतना सोच ही नहीं पाते जितना हमें सोचना चाहिये | मोह इन सारी उलझनों की जड़ है | मोह के कारण इस दुनिया में झगड़े तक हो जाते हैं | हम सब यह जानते है पर अपने भीतर भी ये मोह है, इसे पहचानते नहीं | यदि हम पहचान लें तो समझिए कि हम प्रेम की दिशा में बढ़ चुके हैं | प्रेम के धरातल पर सब कुछ स्पष्ट हो जाता है | प्रेम दुनिया में प्रेम ही पैदा करता है और सब कुछ प्रेममय हो जाता है | यदि हमें प्रेम का आभास हो जाए तो जाने वाले इंसान की यात्रा की खबर रहती है | ऐसा हो जाना सही रूप में मनुष्य हो जाना है |
प्रार्थना इस प्रेम को पाने का एक साधन है |




के.बी.व्यास 

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