Friday, 30 November 2018


                                 सपनों के सुलझे रहस्य 
              सपनों का संसार बहुत रोचक है | यह कोतुहल पैदा करता है की आखिर सपने हैं क्या ? कभी यह उम्मीद और जोश से भरे या फिर कभी डर से भी परिपूर्ण होते है | वैसे सपनों का सिलसिले वार आना नहीं होता | अभी एक पल में हम आसमान में उड़ रहे होते हैं की दूसरे ही पल हम पानी के बीच में होते हैं | कोई ओर छोर समझ में नहीं आता है और तो और हम अपने सपने याद भी नहीं रखते | पूरी जिन्दगी में हमें आठ दस सपने ही हैं जो पूरे के पूरे याद रहते है और अधिकतर वो, जो हाल ही के दिनों में आए हैं | जहां तक सपनों के सच होने की बात है वो तो केवल दो चार ही होते हैं जो हूबहू सच हो जाएं , लेकिन अगर दो चार सपने भी सच हो जाते हैं तो कैसे हो जाते हैं ? भविष्य की पूर्व जानकारी मिल जाती है तो कैसे ? क्या आने वाले समय में क्या होगा ये मालूम चल जाता है ? कुल मिला कर सपनों की दुनिया पूरी तरह से रहस्य की तरह है और इसलिए इसे सुलझाना बहुत रोमांचकारी है |

 एक बात जो मुझे समझ में आई कि जैसे जैसे हम अपने भीतर के मन को स्वच्छ करते चले जाते हैं हमारे सपने भी उसी हिसाब से स्वच्छ होते जाते हैं | मन को स्वच्छ करते रहने पर एक स्थिती ऐसी आती है जब हम कोई भी सपना नहीं देखते | यह स्थिती आती है, लेकिन बहुत कम लोगों में आती है | ऐसा कहते है की उस समय, हम एक तरह से जागते हुए भी सपने देखने लगते हैं | ये खुली आँखों के सपने होते हैं और वो भी इस तरह से कि सभी का निस्वार्थ रूप से, पूर्ण विवेक के साथ भला चाहने लगते हैं | उस स्थिती को भी सपना ही कहा जाता है क्यों कि तब हकीकत और सपने में कोई फर्क नहीं रह जाता, हम उसे होती हुई घटना कहें या सपना कोई फर्क नहीं पड़ता और तब हमारे सोने और जागने में कोई अंतर नहीं रहता |

 लेकिन सपनों को जानने से पहले हमें थोड़ा सा नींद के बारे में जानना पडेगा | हमें नींद क्यों आती है ? हमारी नींद का कारण क्या है ? वैज्ञानिक कहते हैं की हम काम करके थक जाते हैं तो हमें आराम की जरूरत होती है और हम सो जाते हैं | नींद में जब हम सोते हैं तो शिथिल पड़ जाते हैं, हमें होश ही नहीं रहता कि हम कौन हैं, क्या हैं ? हमारी बुद्धि शिथिल पड़ जाती है मगर हमारा मन जागता रहता है | यह मन तब पूर्णतया अपने हिसाब से चलता है और मजे की बात है कि सिलसिलेवार भी नहीं चलता | तो उस समय मन जो देखना चाहता है वो देख लेता है क्यों कि बुद्धि उस समय विकल हो जाती है |

एक मनुष्य अपने जीवन में एक तिहाई जीवन सो के बिताता है | बचपन में मनुष्य ज्यादा सोता है, करीब १८ घंटे तक सोता है | यह समय उसके विकास में सहायक होता है | फिर ज्यों ज्यों वो बड़ा होता जाता है उसकी नींद कम होने लगती है | वैज्ञानिकों का कहना है की एक वयस्क मनुष्य को ७-८ घंटे की नींद लेना आवश्यक है | शेष १५-१६ घंटे आदमी काम करता है | 

सही नींद का आना असल मायने में शरीर के थकने की वजह से होता है और शरीर थकता कब है ? शरीर मानसिक तौर पर थकता है इसलिए नींद हर मनुष्य को अलग अलग समय सीमा तक आती है | वैसे कहते हैं की जो मनुष्य प्रपंच नहीं करता उसे दो मिनट में कहीं भी नींद आ जाती है | इसे आजकल नैनो स्लीप का नाम दिया गया है | इस दो मिनट की नींद के बाद वो इंसान तरो ताज़ा हो जाता है |

तो कहने का मतलब है की एक स्थिती ऐसी आती है की उसे कुछ आराम चाहिए होता है और मनुष्य नींद ले लेता है | यह  स्थिति हर मनुष्य के साथ अलग अलग होती है कुछ लोग २४ घंटे में से पांच छः घंटा सो जाते है, कुछ तीन चार घंटा सो जाते है और कुछ लोग तो घंटा, डेढ़ घंटा ही सोते है   | ऐसा कम इसलिए होता है कि बहुत कम लोग नींद के आयाम के प्रति जागृत होते है | यदि हम सभी नींद के प्रति जागृत हो जाएं तो हम सभी ऐसे हो सकते है |

वैसे सामान्य अवस्था में नींद जब लेते हैं हम तो हमें सपने आते हैं | सपनों का अक्सर कोई सिर पैर नहीं होता | जागने पर हमें याद भी नहीं रहता की हमने क्या सपना देखा | कई बार हमें हमारी याददाश्त पर ज़ोर देना पड़ता है की हमने क्या सपना देखा | बचपन से हम सपने देखते आ रहे हैं और दो चार सपने हम ऐसे देख लेते हैं जो सच हो जाते हैं और यह बड़ी हैरान कर देने वाली बात है | कुछ  दिन पहले किसी अपने की मृत्यु के सपने देख लेना , परिवार में वंश वृद्धि के सपने देख लेना , अपनी तरक्की के सपने या किसी क्षेत्र में स्वयं के या किसी अपने के चयन हो जाने के सपने देख लेना यानी ऐसे सपने जो सच हो जाते हैं उन्हें देख लेना | वो सच हो जाते हैं और हम उन पर आश्चर्य करते रह जाते हैं की ये क्या हुआ और कैसे हुआ ?

यही वो प्रश्न हैं की जिनका उत्तर ढूँढना मेरे मस्तिष्क में आया | तब मैंने सपनों के बारे में विभिन्न लेखों को पढ़ा | फ्रायड को पढ़ा | चार्ल्स को पढ़ा | आचार्य श्री राम शर्मा को पढ़ा | फिर मुझे लगा कि विभिन्न धर्म भी तो हैं जो सपनों के बारे में बताते हैं ,तो मैंने उन्हें पढ़ा | मैंने हिन्दू धर्म में सपनों को पढ़ा, बुद्ध , महावीर , गुरु नानक , ईसा मसीह , मोहम्मद साहब में मैंने सपनों को पढ़ा | मैंने जरथ्रुस्त्र में सपनों को पढ़ा | मैंने जितने सपनों पर वीडियो हो सकते थे, उन्हें देखा | मैंने जितने नोबेल प्राइज जीते है उनमें से कितने लोग हैं जिन्होंने नोबेल प्राइज जीतने के पीछे अपने सपनों को श्रेय दिया है, ये जाना | मैंने रामानुजन को पढ़ा जो केवल ३३ वर्ष तक जीवित रहे और जिनके सपने में गणित के सूत्र आते थे और इनका कहना है कि इनकी कुल देवी इन्हें सपने में आ कर गणित के सूत्र बताती थी और इन्हें रायल फेलोशिप मिली हुई थी | मुझे ऐसा लगता है की मैंने सपनों को लेकर तमाम दुनिया की किताबों को छान लिया मगर ......... ? रहस्य रहस्य ही रहा, क्यों की मुझे अनुभव उस तरह का नहीं हुआ | जानकारी अवश्य हुई सपनों के बारे में और ये जानकारी जीवन में आगे आने वाले समय में सम्भव है कि मुझे अनुभव भी हो जाए | इस किताब में मैंने जो पढ़ा और और जो उसके बाद समझा है वो लिख दिया है | अब यात्रा इसके अनुभव की है | विभिन्न प्रकार से सो जाना और विभिन्न प्रकार की नींद लेना मनुष्य के अनुभव में आ जाए तो सपनों के सारे रहस्य सुलझ सकते हैं | 

के.बी व्यास 
( मेरी आने वाली पुस्तक "स्वप्न के सुलझे रहस्य" की भूमिका से उदृत )

Thursday, 1 March 2018


कैसे हो !

इस छोटे से वाक्य को अगर मुस्कुरा के कहा जाए तो शुरूआती बात तो वैसे ही बन जाए | एक पूरे दिन में इन्सान न जाने कितने लोगों से मिलता है | उसमें से अधिकतर जो मिलते हैं वो न जाने किस दुनिया में खोए रहते हैं | किसी को अपने परिवार की समस्या, किसी को अपनी नौकरी या व्यवसाय की समस्या, किसी को अपना बुढ़ापा सामने देख कर घबराहट होती है, किसी को रोग की समस्या और उसके बीच चलती हुई जिंन्दगी | ऐसे में कोई मुस्कुरा के पूछने वाला मिल जाए कि – कैसे हो ? तो अचानक जुबान पे  जवाब आता है कि – ठीक हूँ | यहाँ मुस्कुरा के पूछने वाली बात बहुत महत्वपूर्ण है | जिन्दगी एक जिन्दगी से पूछती है वो भी उल्लासित हो कर, तो चाहे कितना ही अवसाद में डूबा हुआ हो वो व्यक्ति उसे उम्मीद की किरण नजर आती है और वो कह बैठता है – ठीक हूँ | यहाँ से बात धनात्मक दिशा में शुरू होती है | 


उम्मीद का साथ हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए | एक न एक दिन हम जो चाहते हैं वो हमे मिल के रहता है | कितने ही तूफ़ान आ जाएं, कितनी ही आंधियाँ चलें वो इन्सान अपने पथ से कभी नहीं डिगता जो उम्मीद को साथ रखे है | ये आंधियां, ये तूफ़ान परीक्षाएं है इन्सान के समक्ष और कुछ नहीं हैं | ये हमारे भीतर रह रहे सत्य को प्रबल करने का साहस देती हैं | हम आंतरिक धरातल पर ऊपर उठते हैं | 

तूफ़ान और आँधियों को  पार पाने के लिए हमें उम्मीद का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए | आँख से आंसू चाहे हजार गिरें मगर एक दिन आता है जब विजय उद् धोष  हमारा ही होता है और हम उस समय भी हम अहंकार को करीब नहीं लाते | जो इन्सान इस तरह का जीवन जीता है वो महा - सम्राट है | उसे जीवन का अंतरतम मालूम है और उसे यह भी मालूम है कि क्या कर के हम कहाँ पहुचेंगें |


 तो मुस्कुरा के अगर किसी से पूछा कि – कैसे हो ? यह अपने आप में एक परिवर्तन लाता है और सुखद परिवर्तन लाता है | यह परिवर्तन बहुत बड़ा भी हो सकता है, ये बहुत छोटा हो सकता है लेकिन धनात्मक होता है | धनात्मक परिवर्तन अपने और दूसरों के जीवन में आना प्रगति का सूचक है | कैसे हो – ये मुस्कुरा के पूछना और मुस्कुरा के पूछने के साथ साथ आँखों में सामने वाले मनुष्य के लिए असीम गहराई का भाव भी अगर हो तो कहना ही क्या | पूरा का पूरा सामने वाला मनुष्य , कहने वाले के साथ एकाकार हो जाता है | इस तरह से अगर हम हर एक से अगर मुस्कुरा के पूछते चले जाएं कि – कैसे हो, तो हम शुरूआती सफलता प्राप्त कर सकते है – ये निश्चित है |


के.बी.व्यास

Tuesday, 5 December 2017

रिसर्च

अंग्रेजी का ये शब्द रिसर्च बड़ा मजेदार शब्द है | सर्च और रिसर्च दो शब्द हैं अंग्रेजी भाषा में | तो सर्च तो हो चुकी है अब हम रिसर्च कर रहे हैं और फिर से री –रिसर्च और फिर री री – रिसर्च करेंगे | याने घूमते रहेंगें एक ही धुरी पर और खोज खोज कर के वो ही चीज़े लाते रहेंगें, जो कभी किसी जमाने में, किसी युग में सभी के सामने आ चुकी हैं | फिर समय बदला, युग बदला और वो खोज धीरे धीरे भुला दी गई और अब उसे पुनः ज़िंदा करना होता है, इसलिए रिसर्च होती है |

यदि हम याद करें कि कौन कौन लोग हैं जो सदियों तक याद रखे जाते हैं | तो ऐसे में वो ही लोग आते हैं जिन्होंने धर्म रखा, जिन्होंने इसकी आधारशिलाएं रखी और आधारशिला तो हम कह रहे हैं, उन्होंने उन सिद्धांतों को सामने रखा जो उस समय के लोगों को मालूम ही नहीं था | हम इन्सान को याद तो करते हैं लेकिन उनका मूल उद्देश्य क्या था ये भूल जाते हैं | हम उनकी बातों को जो हमारे सामने अधूरी बन के आ रही हैं पूरा समझ कर अपना ध्येय मान लेते हैं | लोग तो याद रहते हैं मगर उनकी कही बात कहीं गुम हो जाती है, इसलिए बार बार रिसर्च करनी पड़ती है, पुनः खोज करनी पड़ती है, खोज कर सामने लाना पड़ता है | लोग इसीलिए कहते हैं जो कहा गया वो बिल्कुल नया है, जबकि उसका सिर्फ कहने का तरीका नया है मगर बात उसमें शाश्वत ही है | अहंकार इस मामले में बहुत अहम रोल अदा करता है | वो बात को सही रूप में आने से रोकता है जो कि एक आसुरी वृत्ति है |

अहंकार से निपटने के लिए मनुष्य गुरु करता है, लेकिन गुरु भी कई प्रकार के होते हैं | असली गुरु मनुष्य को उसके भीतर प्रवेश करने में मदद करता है | बाहरी दुनिया से भीतर की दुनिया में कदम रखवाने में मदद करता है | एक बार मनुष्य भीतर उतरा तो उसे सभी अपने लगने लगते हैं | उसमें ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद नहीं रहता | सभी ‘मैं’ हो जाता है, कोई भेद नहीं रहता |

इस दिशा में लोगों को जगाना सबसे बड़ा चैलेन्ज है | कुछ लोग हैं जो पूरे सोए हुए हैं, कुछ लोग हैं जो आधे सोए आधे जागे हुए हैं और बहुत कम ऐसे हैं जो पूर्णतया जाग गए हैं | रिसर्च आधे सोए आधे जागे लोगों के लिए है |

के.बी.व्यास

Friday, 24 November 2017



नींद, कर्म और मन 


               हमें नींद क्यों आती है ? वैज्ञानिक कहते हैं कि जब शरीर काम करके थक जाता है तो हमें नींद आ जाती है | हम जब उठते हैं तो तरोताजा हो कर उठते हैं | जब जागते हैं तो हमारी बुद्धि हमें बताती रहती है कि ये नहीं करना, वो नहीं करना , इसे ऐसे नहीं करना, इसको ऐसे करना इत्यादि | सो जाने पर हमारी बुद्धि भी विकल हो जाती है | हमें पता ही नहीं चलता कि हमारी टांग कहाँ पर है और हमारे हाथ कहाँ पर हैं और हमारा शरीर कहाँ पर किस अवस्था में है | 



ऐसे समय में मन स्वतंत्र हो जाता है , वो जो देखना चाहता है वही देख लेता है | किसी की मार – पिटाई करनी हो तो मार – पीट के आ जाता है और किसी को प्यार वगैराह कुछ करना हो तो प्यार कर के आ जाता है | इसलिए जो बात जागने में संभव नहीं हो पाती वो बात सो जाने पर एक तरह से पूरी हो जाती है | यह एक तरह के सपने हैं | अगर किसी विषय के बारे में चिंता है मन में कि इसका क्या होगा, कैसे होगा तो हम नींद में भटकेंगे, हमें रास्ता नहीं मिलेगा, हमारी ट्रेन छूट जाएगी और अगर हम आनन्दित हैं किसी विषय को लेकर तो नींद में हम मित्रों की महफिल में बैठे हुए होंगे, परिवार में बेठे हुए होंगे, ठहाके लग रहे होंगे और आनन्द ही आनन्द होगा | ये सब मन के कारण होता है | 


                मन को हम जितना शुद्ध करेंगे उतना ही सो जाने पर हम शुद्ध चीज को देखेंगे | मन को शुद्ध कैसे करें ? तो यह जागने पर विचारों को शुद्ध करने से होगा | जब किसी व्यक्ति के बारे में कोई विचार उठे तो वो धनात्मक ही उठे | हमारे लिए लाख किसी व्यक्ति ने गलत काम किए हों लेकिन हमारे मन में उसके प्रति कोई गलत भाव न आए तो हमारे विचार भी सही होंगे | ये काम जरा कठिन है, मगर हम इस दिशा में प्रयास कर के सफलता प्राप्त कर सकते हैं | प्रार्थना को नियमित करना इसका सरल उपाय है | हमारे विचार ही हमारे बोल बनते हैं, और हमारे बोल ही हमारे कृत्य बनते हैं | ये तीनों चीजे विचार, बोल और कृत्य, हमारे कर्म कहलाते हैं | हमारे कर्मों को धनात्मक दिशा देना मन को शुद्ध करना है | मन को शुद्ध करने के बाद हम सपने भी शद्ध ही देखेंगे | वो सपने देखेंगे, जो समय से पहले ही देख लें और जो सच हो जाएं | ऐसा कैसे होता है कि हम वो सभी कुछ जो अभी तक नहीं हुआ स्पष्ट देख लेते हैं ? तो यह आगे की बात है और यह होना भी कोई अचरज की बात नहीं | प्रार्थना में चलते चलते एक बिंदु आता है जब यह सम्भव हो जाता है | हालांकि नींद भी एक अवस्था है, इससे आगे सुषुप्ति है और इससे आगे तुरीया की स्थिति है, ऐसा सनातन धर्म में कहा गया है |


              कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें नींद नहीं आती, वे सिर्फ आराम करते हैं और उनके आस पास उन्हें सब पता होता है कि कहाँ पर क्या हो रहा है | फिर उन्हें सपने भी नहीं आते | सपनों का नींद से ही सम्बन्ध है और नींद में जाने पर पूर्णतया मन का साम्राज्य चलता है | जो कभी सोया ही नहीं उस पर मन का साम्राज्य नहीं चलता | मन उनके अनुसार चलता है, वे मन के अनुसार नहीं चलते | वैसे मन के शुद्ध हो जाने पर हमारे विचार, हमारे बोल और हमारे कृत्य तीनों शुद्ध हो जाते हैं | हमें तब स्वप्न भी सुस्वप्न आते हैं, लेकिन पंहुचे हुए लोग कहते हैं कि – जब जाग रहे हैं तो भी ये सपना देख रहे हैं , असल में वे जागृति की बात कर रहे हैं | जो पूर्णतः जागृति की अवस्था में है उन्हें सपने नहीं आते और उनके कर्म भी जागृत होते हैं | 
 के.बी.व्यास
             

Sunday, 1 October 2017

कर्मों का आरम्भ
कर्मों का महत्व है और जागे हुए लोग इसका सही मूल्यांकन कर सकते हैं | हम हर समय कोई ना कोई कर्म अवश्य करते हैं, मगर एक समय बाद उन कर्मों के करने में हमारे गुरु की प्रेरणा भी हमारे साथ होती है | कर्म तो हम ही करते हैं परन्तु एक प्रेरणा हमारे साथ होती है जो दिशा निर्देश देती रहती है | गुरु – शिष्य का सम्बन्ध फिर प्रगाढ़ होता चला जाता है | एक स्थिति पर आकर गुरु – शिष्य दोनों एक हो जाते हैं, और उनमें कोई फर्क नहीं रह जाता | यह जागृति की स्थिति है |

कुछ लोगों के जीवन में गुरु नहीं होते मगर किसी व्यक्ति की प्रेरणा से वो प्रभावित होता है | उसने जिस तरह से जीवन में कोई कार्य किया हम भी अमूमन वैसा ही करना चाहते हैं | संगीत के क्षेत्र में, कला के क्षेत्र में, कानून के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में, आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में, आजकल तो व्यापार और प्रबन्धन के क्षेत्र में भी लोग उसकी ओर नजर डालते है जिसकी प्रेरणा और दिशा - निर्देश उन्हें लक्ष्य पर पंहुचा दे | तो इस तरह से ही जो जीवन में प्रेरणा दे दे और दिशा – निर्देश दे दे वो गुरु होता है |

लेकिन आपने सोचा है कभी कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए ? कर्मों के आधार पर ही हमारा जन्म होता है और कर्मों के आधार पर ही हमारी मृत्यु हो जाती है | मगर ये सिलसिला कब से चल रहा है ? हम हर पल नया कर्म कर रहे हैं और न जाने कब से कर रहे हैं | मगर इसकी कहीं तो शुरुआत होगी, कहीं तो इसका आरम्भ हुआ होगा | तो ये कर्म हमने सौ, दो सौ , चार सौ , हजार वर्ष पहले, दस हजार वर्ष पहले, लाखों, करोड़ो, अरबों, खरबों, अनंत वर्षों पहले से, अनगिनत, असीमित और असंख्य वर्षों पहले से कर रहे हैं | वो तब से हमीं में सुरक्षित पड़ा हुआ है और जैसे जैसे हम जागृत होते हैं वैसे वैसे हम इन्हें देख सकते हैं |

कर्मों को करने से उनके फल भी सामने आए और अच्छे और बुरे कर्म भी सामने आए | स्त्री रूप भी सामने आया और पुरुष रूप भी सामने आया | फिर दो तरह के व्यक्ति बने, सज्जन व्यक्ति और दुर्जन व्यक्ति | हालंकि दोनों आपस में परिवर्तनशील हैं | इसलिए सज्जन व्यक्ति को हर पल जागरूक और सजग रहना पड़ता है, मगर वो भी चूक सकता है इसलिए गुरु की आवश्यकता होती है, जिससे वो कभी चूके नहीं |

वैसे हम आपनी बुद्धि का केवल ५% हिस्सा उपयोग में लेते हैं, कुछ लोग अपनी बुद्धि का ७% हिस्सा उपयोग में लेते हैं उन्हें हम बुद्धिमान कहते हैं, आइन्स्टाइन तो अपनी बुद्धि का १२% उपयोग में लिया करता था ये वैज्ञानिक बता चुके हैं | तो अगर हम बाकी की बुद्धि का भी उपयोग कर लें तो हमें मालूम चल जाएगा कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए | यदि हम जागृत अवस्था में आ जाएं तो हमें मालूम हो जाएगा कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए और उन्हें करते करते हम कैसे आज की स्थिति तक पंहुचे हैं | निरन्तरता के नियम के आधार पर हम जागृत होने की ओर आगे बढ़ते रहें तो हम उस मूलभूत स्थिती को प्राप्त कर सकते हैं , जिसे पूर्णतया जागृति कहते हैं | तब हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए थे |

के.बी.व्यास

Monday, 14 August 2017

प्रश्न का मनोविज्ञान
हर इंसान कभी ना कभी किसी ना किसी बात पर प्रश्न जरुर पूछता है | पूछा जाने वाला प्रश्न हमारी आंतरिक अवस्था का स्पष्ट प्रतिरूप होता है | जो मन के भीतर होता है वो अपनी अभिव्यक्ति में कई बार प्रश्न बन के भी उभरता है | 


यह जरूरी नहीं की जो हम प्रश्न हम पूछ रहे उसका उत्तर हम जानते नहीं, बल्कि कई बार सामने वाले को परखने के लिए भी हम प्रश्न पूछते हैं | भेद निकालने के लिए प्रश्न पूछते हैं और कई बार बात को भटकाने के लिए हम प्रश्न पूछते हैं | कई बार हम वाकई कोई प्रश्न पूछ रहे होते हैं जिनका उत्तर हमें पता नहीं होता | जब उत्तर कोई दे देता है तो हम उसे अपना बना कर पेश करते हैं | यंहा सबसे बड़ा रोड़ा आता है अहंकार का | पहले तो कई प्रश्नों के उत्तर ही हमें मालूम नहीं होते जब उत्तर मालूम हो जाते हैं तो हम ज्यादातर ये बताना नहीं चाहते कि उत्तर किसने दिया है | 
 हर उत्तर के पीछे बुद्धि और विवेक का हाथ होता है | किसी प्रश्न के उत्तर की खोज करना मनुष्य का स्वभाव है | मनुष्य अपने प्रश्नों के बल बूते पर ही आज यहाँ तक पहुचा है | विज्ञान का तो आधार ही प्रश्न है , बिना प्रश्न के कोई बात ही नहीं होती | प्रश्न पूछा फिर उसका उत्तर मिल जाता है, अब उसका आगे जाने पर उसका उत्तर कुछ नया होता है | प्रश्न वही रहता है मगर विज्ञान में उत्तर बदलते रहते है | आज के जमाने में इसे विज्ञान की प्रगति कहा जाता है |
 एक बात तो तय है की जो भी प्रश्न हमने पूछा है हमारे भीतर उसका उत्तर मौजूद है | जिसका उत्तर हमें मालूम नहीं उसका प्रश्न भी नहीं बन सकता | चाहे हम कोई भी प्रश्न सोच लें, चाहे कहीं से चलकर वो प्रश्न हमारे मस्तिष्क में आया है , हमारे मस्तिष्क में वही प्रश्न आएगा जिसका उत्तर हमारे भीतर होगा, इसलिए उत्तर देने से ज्यादा प्रश्न की गहराई क्या है यह जानना बहुत आवश्यक है | जैसे जैसे बुद्धि और विवेक सघन होते चले जाते हैं हमारे प्रश्न उसी हिसाब से बदलते जाते हैं | एक अवस्था वो आती है जब कोई प्रश्न नहीं रहता क्यों की तब तक सारे उत्तर मिल चुके होते हैं, विज्ञान तब शिशु लगता है क्यों की उसका प्रश्न तो वही होता है लेकिन उत्तर बदलते रहते हैं |
 

अपने बारे में, अपने परिवार के बारे में , समाज के बारे में, देश – दुनिया के बारे में, पूरे संसार के ओर-छोर के बारे में, इस सौरमंडल के बारे में, आकाशगंगा और पूरे ब्रह्मांड के बारे में प्रश्न उठ सकते है | इसलिए कहा गया है की प्रश्न की गहराई जानने का प्रयास करना चाहिए, जिस दिन बुद्धि और विवेक पूरे परिपक्व होंगे उस दिन प्रश्न का उत्तर हमें मिल जाएगा |
उत्तर सभी प्रश्नों के जीवन की भीतरी परतों में छुपे रहते हैं | सतह पे उत्तर भी होते हैं लेकिन केवल प्रश्न ज्यादा उठते है , जिन्हें सुनकर जानकार व्यक्ति ये पता लगा सकता है कि मनुष्य की आदत क्या कह रही है | इसी वजह से जितना ज्यादा मनुष्य और लोगों से मिले, जितना ज्यादा बात करे, जितना ज्यादा समझने की कोशिश करे उतना ज्यादा वो परिपक्व होता चला जाता है और इसका कोई अंत नहीं |


के. बी. व्यास


जीने की कला
एक पूरा जीवन जीने के बाद जब मृत्यु आती है तो कुछ लोगों को डर लगता है, कुछ को बहुत अटपटा लगता है बड़ा अजीब लगता है कि ये क्या हो रहा है मगर कुछ हैं जो बहुत शान्ति से मरते है | पूरी जिन्दगी हमारे सामने कुछ ही देर में एक फिल्म की तरह घूम जाती है | हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने किस किस को सुख दिए और किस किस को दुःख दिए | मृत्यु के समय हमारी त्वचा और हड्डियों के बीच में एक हवा चलती है | जिसने सारी उम्र लोगों को दुःख दिए ये हवा बहुत डराती है, वो इंसान पसीने पसीने हो जाता है उसे घबराहट होने लगती है, वो कुछ कह नहीं पाता लेकिन उसे भीतर ही भीतर पता चलने लगता है कि उसने क्या किया है |

वहीं दूसरी ओर अच्छे कर्म करने वालों के भीतर ये हवा बहुत सुहानी लगती है, उन्हें भरपूर आनन्द आता है, उन्हें अहसास होने लगता है कि उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है | अंतिम समय में मन का अहसास मनुष्य को बता देता है कि उसने क्या किया | अक्सर हमने कुछ लोगों को अपने अंतिम समय में माफ़ी मांगते हुए देखा है | सारी उम्र जिससे दुश्मनी रही उससे क्षमा मांग ली जाती है | कहते हैं उसका अंतिम समय आ गया है, इसलिए जो कर दिया वो बदल तो नहीं सकता क्षमा मांग सकता है और उसका फल भोग सकता है | यही उसके बस में होता है और यह एक बहुत बड़े परिवर्तन का सूचक है |

जीने की कला आनी चाहिए | जीते जी जो सुख से जीता है वह मृत्यु पर भी सुखी है | जो व्यक्ति जीते जी दूसरों के भले के बारे में सोचता है और कर देता है उतना ही वो सुखी होता है | इसलिए हमें लोगों की सुननी और समझनी तो चाहिए, मगर फिर अपने विचारों में डूब कर चितंन मनन करना चाहिए और अंत में वही करना चाहिए जो सही हो | बुद्धि पूछ सकती है कि सही और गलत का निर्णय कौन करेगा ? तो वो हमारा मन करेगा | मन के भाव सब खेल खेलते हैं इसलिए निरंतर मन के भावो को ऊपर उठाना चाहिए, यही जीने की कला है |
के.बी.व्यास
( मेरी पुस्तक “सहज अभिव्यक्ति” से उदृत )