Sunday, 30 June 2013



बहरा अंधा गूंगा

बहुत समय पहले की बात है !! एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहते थे !! सरोवर के बीचों -बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था !! खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी थी !!एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस करवाई जाए !! रेस में भाग लेने वाली प्रतियोगीयों को खम्भे पर चढ़ना होगा और जो सबसे पहले एक ऊपर पहुच जाएगा वही विजेता माना जाएगा !!रेस का दिन पंहुचा !! चारो तरफ बहुत भीड़ थी !! आस -पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुचे !! माहौल में सरगर्मी थी !! हर तरफ शोर ही शोर था !!
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रेस शुरू हुई, लेकिन खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुंच पायेगा !! हर तरफ यही सुनाई देता - "अरे ये बहुत कठिन है !! वो कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायंगे !! सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं !! इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता
!!"और यही हो भी रहा था, जो भी मेंढक कोशिश करता, वो थोड़ा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता !! कई मेंढक दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे !!पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी - "ये नहीं हो सकता , असंभव !!" और वो उत्साहित मेंढक भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास छोड़ दिया !!लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था !! वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और अंततः वह खम्भे के ऊपर पहुच गया और इस रेस का विजेता बना !!उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ !! सभी मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे - "तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हे अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की ??"तभी पीछे से एक आवाज़ आई - "पहले उसके कान में ठुंसी हुई रुई निकालो तब वो सुन पाएगा !!"मेंढक ने अपने कान की रुई निकालते हुए कहा कि आप लोगों की निराशाजनक बातों से बचने कर प्रयास करते रहने का एक ही तरीका था कि मैं अपने कान बंद लूं. जीवन में विजय हासिल करने के लिए निराशाजनक बातों के प्रति बहरा बनना, गुजरी हुई असफलता से सीख लेने के बाद उस असफलता के प्रति आंख बंद कर लेना और अपने प्रयासों को अथक रूप से जारी रखने के दौरान किसी भी टिप्पणी के उत्तर में गूंगा बनना लाभदायक रहता है.

Wednesday, 12 June 2013

 
 
   सहज सुंदर मन
 
 
कहते हैं जो भाव व्यक्ति के मन में होते हैं वो उसके चेहरे पे आ जाते हैं और जो भाव चेहरे पर होते हैं उनका सार व्यक्ति की आंखों में झलक जाता है. एक चेहरा भौतिक होता है जो दिखता है लेकिन वाणी की गुणवत्ता और शब्दों का चयन भी व्यक्ति का दूसरा चेहरा कहलाता है. मन के भावों का जब पूरे होश ओ हवास में प्रबंधन(मैनेज) किया जाय, और मन को सुंदर भावों से भरा जाय तो चेहरे पर स्वतः ही अदभुद सौम्यता आ जाती है. ठीक वैसे ही जैसे यदि जडें मज़बूत हों तो वृक्ष स्वतः ही समृ्द्ध होता है. सुंदर और धनात्मक भाव सबसे बडी संपदा हैं. इस संपदा को समृ्द्ध करना अपने आप में एक चुनौती है, और धार्मिक व्यक्ति वही है जो इस चुनौती को स्वीकार कर के अंत में विजय प्राप्त करे.
 
 

जब आस पास के सभी लोग स्नेह दे रहे हों तब तो भावों को सुंदर और धनात्मक रखना आसान है, लेकिन जब कोई व्यक्ति या घटना आहत कर दे, मन को चोट पंहुचा दे तब भावों को सुंदर और धनात्मक रखना मुश्किल है. कभी कभी जीवन की रहस्यता देख कर हम आवाक रह जाते हैं. जैसे अगर किसी ने स्नेह प्रेम प्रोत्साहन के दो शब्द कह दिए तो मन उमंगों से भर जाता है और अगर दूसरे ही क्षण उस व्यक्ति ने कुछ अप्रिय कहा तो क्रोध आ जाता है. तो जब क्रोध आया तब वो उमंगें कहां गायब हो गई? और जब उमंगें थी तब क्रोध कहां था? चिंतन करने से पता चलता है कि दोनो ही हमारे अंदर अदृष्य निहित रूप(लेटेन्ट)में थे, बाहरी वातावरण में कुछ घटा और प्रत्युत्तर में भीतर से कुछ प्रकट (मैनीफ़ेस्ट) हुआ, कभी खुशी या उमंग या कभी क्रोध या उदासी.तो अगर यही सिलसिला चलता रहे कि जब वातावरण में कोई प्रेम स्नेह दे तो खुशी, जब कोई अप्रिय घटे तो क्रोध या उदासी, तो हम एक तरह से वातावरण की कठपुतली बन के रह जाते हैं. हमारी खुशी वातावरण पर निर्भर हो जाती है. धार्मिक व्यक्ति वह है जो वातावरण या जीवन घटनाओं के हाथों की कठपुतली ना बने. उसकी खुशी उसके अपने प्रबंघन में रहे, उसका दुख उसके अपने प्रबंधन में रहे. यह यात्रा धर्म की यात्रा है.
 
फ़र्ज़ कीजिए कांच के एक ग्लास में पानी भरा हुआ है,जिसमें थोडी मिट्टी डली हुई है. अगर इस ग्लास को थोडी देर स्थिर रख दिया जाय तो मिट्टी नीचे बैठ जाएगी और ऊपर का पानी साफ़ दिखेगा. लेकिन अगर कोई इस ग्लास को हिला दे तो पूरा का पूरा पानी गंदा दिखने लग जाएगा, तो अब ये पानी जो गंदा दिख रहा है क्या इसमें उसका दोष है जिसने ग्लास को हिलाया? अगर पानी पूरा का पूरा स्वच्छ हो तो कोई कितना ही ग्लास को हिला दे, पानी तो साफ़ का साफ़ रहेगा.धार्मिक व्यक्ति अपने जीवन के पानी को स्वच्छ करके उस पर अच्छी संगत का फ़िल्टर युक्त इतना टाइट ढक्कन लगा देता है कि कोई उसमें गंदगी डाल ही नहीं सकता. इसी को सत्संग कहते हैं.
 
इसके अलावा अच्छे, सुंदर और धनात्मक भावों के साथ साथ विवेक को जगाना भी समान रूप से आवश्यक है, ताकि अप्रिय वाणी या घटनाओं के उत्तर में अच्छे भाव भी निकलें और स्व गरिमा भी बनी रहे. विवेक, भावुकता और सही-गलत की सोच के बीच संतुलन बनाए रखता है.कोरी भावुकता भी मोहवश पाप करवा देती है और कोरी सही-गलत की सोच भी व्यक्ति को शुष्क और संवेदन हीन बना देती है. इन दोनों पक्षों का संतुलन विवेक द्वारा होता है.इसलिए विवेकशील व्यक्ति ही सच्चा न्याय करने वाला होता है.
अन्तर्मन को साफ़ करना, हमारे भावों को स्वच्छ रखना ही सही मायनों में धार्मिक होना है.अपनी ओर से सभी के लिए अच्छी वाणी और अच्छे भाव ही उपजें और किसी भी तरह की घटना या कही गई बात के प्रत्युत्तर में, सुंदर और धनात्मक भाव ही निकले, इस तरह के एक्शन और रिएक्शन का अभ्यास सही मायनों में धर्म मार्ग पर चलने जैसा है.इस मार्ग पर चलने की शुरूआती दिशा और प्रेरणा, किसी को किताबें पढ के मिल जाती है,किसी को अपने मां बाप रिश्तेदार मित्र या टीचर प्रोफ़ेसर की सीख में मिल जाती है,किसी को जीवन की किसी ऎसी घटना से मिल जाती है जिसका बहुत गहरा असर हुआ हो, किसी को किसी धर्म-गुरू के सानिध्य में बैठ के मिल जाती है, किसी को जप तप से मिल जाती है और किसी को इन सभी में से दो या दो से अधिक विकल्पों के आपसी संयोग से मिल जाती है.आप सहमत होंगे इस बात से कि शुरूआत कैसे भी हो मगर होनी चाहिए और मन को स्वच्छ निर्मल करने की और इसे धनात्मक भावों से भरे रखने की यात्रा सतत रूप से जारी रहनी चाहिए.
 
                                               
 
किसी भी क्षेत्र की शिक्षा लेनी हो, चाहे खेलों की,विज्ञान की,संगीत की,चिकित्सा की,कला की,कानून की तो उसी क्षेत्र के किसी उत्तम कोटि के जानकार के साथ रहकर उससे शिक्षा लेना उचित रहता है. ठीक इसी प्रकार यदि जीवन दर्शन की शिक्षा लेनी हो तो किसी उत्तम कोटि के जानकार के साथ रहकर ही लेनी चाहिए. जीवन दर्शन की शिक्षा में मात्र किताबें पढना इतना प्रभावी नहीं होता जितना किसी उत्तम कोटि के जानकार के सानिध्य में बैठ कर सीखना. ऎसा व्यक्ति ही जीवन दर्शन की शिक्षा-यात्रा में हमें अहंकार से बचाए रख कर, अर्जित ज्ञान को अमल में लाने हेतु प्रोत्साहित करने का काम कर सकता है.
 

 
जब ज्ञान अमल में आना आरंभ होता है तो हम वातावरण की कठपुतली कदापि नहीं बनते. हम अपनी मनः स्थिति के स्वयं राजा होते हैं, स्वामी होते हैं. एसे लोगों को सच्चा स्वामी जी कहना ठीक है.जीवन के बारे में पूर्ण जागृति मन को सहज सुंदर बनाती है, भावों को सहज सुंदर बनाती है फ़लस्वरूप चेहरा,वाणी,शब्दों के चयन स्वतः ही सहज सुंदर हो जाते हैं. जितने ज़्यादा लोग इस तरह खिल जाते हैं धरती पर स्वर्ग उतना ही अधिक महकता है.
 

 
 
के.बी.व्यास


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लेखक की अनुमति लेना आवश्यक है. सर्वाधिकार, पुष्करणा शोध प्रकाशन, नैक्स जेन ईवेन्ट्स एम.एफ़.ज़ेड.., रैक मीडिया सिटी, रस अल खैमाह, संयुक्त अरब अमीरात के पास सुरक्षित हैं

Sunday, 9 June 2013

         


       कर्म और भाग्य

विचार, वाणी और कृत्य, इन तीन धरातलों पर कर्म किया जाता है, विचारों को प्रभावित करने के लिए पांच इंद्रियों द्वारा भी संस्कार निर्मित होते हैं, कुछ देखने से भी एक संस्कार निर्मित होता है, कुछ छूने से भी एक संस्कार निर्मित होता है, कुछ सुनने से भी एक संस्कार निर्मित होता है,कुछ सूंघने से भी एक संस्कार निर्मित होता है,कुछ स्वाद चखने से भी एक संस्कार निर्मित होता है, याने ये सब हमारे विचारों को प्रभावित करते हैं और विचारों की गुणवत्ता का निर्माण करते है.

विचार ही हमारे बोल बनते हैं हमारे बोल ही अंत में हमारे कृत्य बन जाते हैं, और फ़िर इन तीन धरातलों पर किए गए कर्मों की पुनरावृत्ति कर्म-स्वभाव बनाती है. यही कर्म स्वभाव पुनः हमारे विचारों वाणी और कृत्य को प्रभावित करते हैं और संस्कार गहरी जड पकडते हैं. इसे कर्म चक्र कहते हैं. हमारे कर्म, बीज रूप में जीवन भूमि में पडे रहते हैं और जब उपयुक्त वातावरण मिलता है तो प्रस्फ़ुटित होते हैं और इस तरह जीव अपना कर्म फ़ल भोगता है.

भाग्य, व्यक्ति के खुद के ही कर्मो से बनता है,किस्मत स्वयं के अच्छे बुरे कर्मों का ही प्रतिफ़ल है. जो कुछ भी घटित होता है,जन्म से लेकर मरने तक, लिंग निर्धारण से लेकर, किस देश में जन्म लेंगे, किस समाज में जन्म लेंगे, कौन सा वंश-कुटुम्ब होगा, कौन मां बनेगी कौन पिता बनेगा, कौन भाई बहन पति पत्नि संतान बनेगी, वे आपस में कैसा व्यवहार करेंगे, कब कैसे शरीर छूटेगा, सभी कुछ स्वय़ं के ही कर्मों और अन्य इन सभी के व्यक्तिगत कर्मों के आपसी सटीक सामंजस्य के फ़लस्वरूप होता है. यही वजह है कि आपने एक विशेष मां बाप के घर में जन्म लिया है, अपने पडौसी के घर में जन्म नहीं लिया. इसे आपसी कर्म बन्धन भी कहते हैं.




अपने परिवेश अपनी किस्मत के लिए,व्यक्ति स्वयं ज़िम्मेवार है, अन्य कोई ज़िम्मेवार नहीं है इस उदघोष का मूल अर्थ यह है कि कमान व्यक्ति के स्वयं के हाथों में है. यदि व्यक्ति ठान ले तो अपनी किस्मत स्वयं बदल सकता है और अपनी मनः स्थिति तो पूर्णतः आनंद की अवस्था में रख ही सकता है.यह स्वयं उसके अपने हाथ में है. अपने सुख और दुख का बीज कारण व्यक्ति स्वयं है . चूं कि जीव स्वयं अपने वास्तविक स्वरुप के प्रति अज्ञानी रहता है इसलिए बहुत सारे प्रश्न परेशान करते हैं, विशेष रूप से दुख की घडी में, जैसे कि, जो हो रहा है वो क्यूं हो रहा है,मेरे साथ ही ऎसा क्यूं हो रहा है, कौन है नियंता? ये सारे प्रश्न तब तक ही हैं जब तक हमें स्वयं अपने आप के बारे में, निज के बारे में, आधी अधूरी जानकारी या बिल्कुल भी जानकारी नहीं होती. आधी अधूरी जानकारी तो और भी खतरनाक होती है. जिस दिन जीवन या जीव या अन्तर्चेतना के मूल स्वभाव का ज्ञान हो जाए, कोई भी प्रश्न अनुत्तरित नहीं रहता. इसलिए "मैं" कौन हूं इसकी खोज बहुत महत्वपूर्ण है, और इस दिशा में गुरू एक अहम किरदार अदा करते हैं.
                                                           
सच्चे गुरू , शिष्य को स्वयं पे निर्भर नही करते, उसे आत्म ज्ञान के पथ पर स्वयं अपने बल बूते पर खडा होने और अग्रसर होने की प्रेरणा का उपक्रम करते है. पहले तो जीव अन्जाने में ही,ज्ञानता में ही अपना अच्छा बुरा भाग्य लिखता है, यह सुप्त अवस्था है,बेहोशी की अवस्था है. फ़िर एक स्थिति आती है जब पूरे होश ओ हवास में जीव अपना भाग्य लिखता है, यह जागृति की अवस्था है. यह वो क्षण होता है जब वो वाकई यह पूर्णरूपेण जान लेता है कि अपने भाग्य का निर्माता वो स्वयं है उसे उत्तर मिल जाता है कि "मैं" कौन हूं, "नियंता" कौन है, इस "मैंऔर "नियंता" में क्या और कैसा संबन्ध है, ये दो हैं या एक ? कर्म चक्र कैसे चलता है? कर्म बीज कैसे निर्मित होता है? कर्म फ़ल कैसे बनता है? कर्मों की गति कैसी होती है? कार्मिक स्वभाव कैसे निर्मित होते हैं? कर्म कैसे बदले जा सकते हैं? बीज रूप में कर्म कैसे जीवन की भूमि में पडे रहते है और कैसे प्रस्फ़ुटन के लिए अपने सही वातावरण की प्रतीक्षा करते है ? समय क्या है? समय कैसे आगे पीछे किया जा सकता है? सही समय का क्या तात्पर्य है? ये सारे प्रश्न गुरू कृपा से उत्तर पाते हैं. अनंत शक्ति और ऊर्जा स्त्रोत हमारे ही भीतर निहित है, गुरू हमें जगाते हैं और जागृति की उस प्रक्रिया को आरंभ करते हैं जिसके पूरा होने के क्षण में यही अनंत शक्ति और ऊर्जा आंतरिक जगत में प्रचंड रूप से विस्फ़ोटित हो कर सब कुछ स्पष्ट कर देती है.
                                                  

                                  


प्रश्न है यात्रा के आरंभ करने का.खोज करने का.....इस यात्रा का आरंभ, मध्य एवम अंत सभी सुखद है, और अंत मे पता चलता है कि यह यात्रा अनंत है और परम सुख से भरी हुई है.प्रार्थना की शक्ति, विश्वास की शक्ति, आस्था का बल, इन सारे पक्षों का अनुभव गुरु सानिध्य मे होता हैं. गुरू एक व्यक्ति नहीं गुरू एक तत्व है, यह ज्ञान भी गुरू कृपा से ही आ पाता है.

गुरू का व्यक्ति रुप में जीवन में आना प्रथम सोपान है, उसके बाद कडी से कडी जुडती चली जाती है. गुरू भी स्वयं की प्यास के प्रत्युत्तर में प्रकट होते हैं,प्रश्नों के उत्तर पाने की सच्ची गहन सघन उत्कंठा के फ़लस्वरूप प्रकट होते हैं, गुरू व्यक्ति के स्वयं के कर्म फ़ल के अनुसार प्रकट होते हैं.

यह पूरी यात्रा जीव के स्वयं के कर्मों की गति के अधार पर संचलित होती है. पूरी की पूरी भौतिक जीवन यात्रा में पांच इन्द्रियों द्वारा निर्मित संस्कार, विचारों को प्रभावित करने वाले अलग अलग आयाम हैं. विचार अपना प्रभाव वाणी पर डालते हैं और फ़िर विचार और वाणी अंत में हमारे कृत्यों को प्रभावित करते हैं. ये सब कर्म कहलाते हैं और भाग्य, मात्र स्वयं के द्वारा किए गए कर्मों का कर्म-फ़ल है, जिनका प्रभाव अत्यंत क्षीण किया जा सकता है यहां तक कि उन्हें बदला भी जा सकता है.


के.बी.व्यास



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