तन्हाइयों में भी महफ़िले सजाना सीखा है
धूप के सफ़र में भी गुनगुनाना सीखा है
मोहताज नहीं ज़माने की महफ़िल ओ छांव के
हमने तो हर दरवेश से यही सीखा है
उजालों का इस्तकबाल करो ये सीखा है
गमों की गिरेफ़्त में ना रहो, ये सीखा है
हो बाहर घुप्प सी दुनिया,जो हाथ को हाथ ना सूझे
अंतस-दिया जलाना, अंधेरे से दौरान ए जंग सीखा है
तलाशी हज़ारों खुशियां ज़माने में, फ़िर ये सीखा है
करोडों खुशियां टिमटिमाती हैं भीतर, अब ये सीखा है
क्यूं लगाऊं मैं मेरे दर्द के इश्तेहार ज़माने भर में
जो कहना है कह दो इबादतों में,... यही सीखा है
के.बी.व्यास
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