Monday, 3 June 2013

दिल सुनाता रहा कलम लिखती रही
बात में से बात यूं ही खिलती रही
मैं इरादातन तो नहीं बैठा था वहां
मोड पे हर एक से नज़र मिलती रही

जो ज़िन्दगी सभी के दर्द दूर करती रही
उसी की रूह में यारों सदा गंगा बहती रही
तेरे वज़ूद से दूर कहां हूं मैं ज़रा देख
खुदाई नेक बंदों से ता उम्र यही कहती रही
 
झूठ की फ़ितरत, नए नए दांव लाती रही
सच से फ़िर हर बार, शिकस्त खाती रही
यूं तो हर दौर में जंग रही, सच झूठ की
सच बुलंद करने फ़रिश्तों की खेप आती रही
 
किसी के चंद लफ़्ज़ों से नेकी की महक आती रही
किसी के बेइंतेहा बोल लेने से यकीनी जाती रही
बात करने वालों ने बात को इतना ज़्यादा बोला
महफ़िल में बेवजह, बात की असरदारी जाती रही
 
के.बी.व्यास

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