Sunday, 2 June 2013

पाकीज़गी प्यार की आज कुछ इस कदर गहरी हुई है
जिस्म की सरहदों से आगे रूह से रूह की बातें हुई है
ज़ुबां खामोश, लफ़्ज़ गुम, मगर है गुफ़्तगू अजब सी
समंदर सी गहरी बात एक मुस्कुराहट में सिमटी हुई है

सोचता हूं मैं ये कहानी ज़िन्दगी में बहुत अजब सी हुई है
आजकल जादू भरे दिन महकते हैं रातें खुशगवार हुई हैं
सोच की सारी खिडकियों से तेरे खयालों की बयार आए
मेरे वज़ूद की दरो दीवारें, हज़ारों खुशबुऒं से महकी हुई हैं

कशिश अब दिल की गहराइयों तलक उतरी हुई है
वस्ल हो ये दुआ दिल से उठी लबों पे पंहुची हुई है
हर सांस के आने जाने पर तेरे नाम की सरगम है
सुबह कोयलों की कुहुक, शामें पपीहे का राग हुई है

न जाने कब कहां कैसे ये तिलिस्मी बात हुई है
दिल के महीन तारों में तेरे नाम की झंकार हुई है
कोई सुर उठा है तमनाओं के साज़ पे सज कर
कायनात के हर कोने तक उमंगों की बारात हुई है

के.बी.व्यास

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