Friday, 26 December 2014

हमने कर्म करने प्रारंम्भ कब किए ?



 हमने कर्म करने प्रारंम्भ कब किए ? 
यह एक जटिल प्रश्न है मगर फिर भी एक सामान्य उत्तर प्रस्तुत कर सकता हूँ कि कर्म हमने पूर्व जन्म जन्मान्तरों में किए जिसका फल या तो भोग रहे है अन्यथा आगे भोगेंगे इसके अलावा हम अब भी हर पल कर्म कर रहे है.प्रतिपल नया कर्म कर रहे हैं. और न जाने कब से कर रहे है सौ, दौ सौ ,चार सौ, हजारो, लाखो, करोड़ो, अरबो, खरबों,अनंत सालो से अनगिनत असीमित असंख्य सालो से कर रहे है. हर पल में दो काम हो रहे है एक तो जो कर्म किया उसका फल भोग रहे है और दूसरा नया कर्म भी कर रहे है, जो बाद में फल देगा. ये दोनों काम एक साथ हो रहे हैं.
अब नया कर्म जो कर रहे है वह अमूमन पुराने कर्मो के प्रभाव में हो रहा है. और इसी तरह कर्मों का एक चक्र निर्मित होता है. इसलिए जिनके कर्म उलटे है उनके अमूमन उलटे ही कर्म होते है और जिनके सीधे कर्म होते है उनके सीधे होते है तथा जिनके दोनों मिले जुले होते उनके पुनह मिले जुले कर्म हो जाते हैं. मरने पर हमारे कर्मो की एक बैलेंस शीट बन जाती है. एक तरह से हम कर्म चक्र में बंध जाते है और सदियों से वही कर्म किये जाते है. तब प्रश्न यह उठता है कि आखिर कर्म बदलें कैसे ? इसी एक काम के लिए कुछ लोगों ने जन्म लिए है जिन्हें गुरु कहा जाता है. लोगों के कर्म बदलने के लिए ही गुरु जन्म लेता है और लोगों के कर्म बदल कर वो चला जाता है. यहाँ कर्म को अच्छे में बदलने की बात हो रही है. इसलिए जब भी कर्म बदलना हो एक गुरु का समर्पण के साथ होना जरुरी है.
सच्चे गुरु में और बुद्ध में कोई अंतर नहीं. मूलतः हम बुद्ध है. हर कोई बुद्ध है इसलिए हर कोई आदर के योग्य है. कई जन्म जन्मान्तरो पहले हम बुद्ध थे. जब सृष्टि शुरू नहीं हुई थी तब हम सभी बुद्ध थे. फिर सृष्टि शुरू हुई  और कालान्तर में हम कुछ और बन गए. यह थोडा जटिल विषय है.
पुल्लिंग या स्त्रीलिंग दोनों में से कुछ भी उस वक्त हुए और होते चले गए. कई योनिया बदली और वर्तमान में मनुष्य है. मनुष्य के भीतर जो छुपा हुआ है वह अद्भुत है. हम मूलतः बुद्ध है का अर्थ है हममे सामर्थ्य है बुद्ध बनने की. हममें योग्यता है बुद्ध बनने की. सारे कर्मों का निष्कर्ष है कि हम जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते है. इसे समझने की कोशिश करें.
जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति संभव नही लेकिन जन्म और मृत्यु के दुःख से मुक्ति मिल सकती है. जन्म और मृत्यु दोनों को सुखी बनाकर, और जन्म और मृत्यु दिखते दो है मगर हैं एक ही. इसे सीढ़ि चढना बोल सकते है और इसके ऊपर पहुच कर हमें बुद्ध होने का ज्ञान होता है.मानव ही मुक्त होता है और मुक्त अवस्था में वह जन्म और मृत्यु का अनुभव करता है यानी मानव ही बुद्ध बनता है, और बुद्ध बनने के बाद वो दूसरों के बुद्ध बनने का इन्तजार करता है और सही वक्त पर जन्म लेता है. यह क्रम बहुत पहले से चल रहा है. वह प्रकृति का आनन्द लेता है, वह सुरों में डूब जाता है, वह हर पल का आनन्द उठाता है. केवल जीवित रहना ही उसके लिए आनन्द है फिर इसमें आने वाले कष्ट तो मात्र हवा है. वह हर कष्ट को उत्साह और उमंग से लेता है. और फिर मृत्यु भी उसके लिए आनन्द है. यही फर्क है गुरु में और दूसरे इंसान में. कष्ट को हंसते हुए सहकर गुरु आनन्द की स्थिति में रहता है.
सृष्टि का अंत जिस दिन होगा हम पुनः बुद्ध होगे. सृष्टि का आरम्भ हुआ है तो इसका अंत भी होगा. सूर्य की भी एक उम्र है चन्द्रमा की भी एक उम्र है हर ग्रह की एक उम्र है.लेकिन जो सूर्य चन्द्र पृथ्वी इन सबसे परे है, वो हम है, वो हम ही हैं. इस जीवन का यही सार है. 

No comments:

Post a Comment