Friday, 24 November 2017



नींद, कर्म और मन 


               हमें नींद क्यों आती है ? वैज्ञानिक कहते हैं कि जब शरीर काम करके थक जाता है तो हमें नींद आ जाती है | हम जब उठते हैं तो तरोताजा हो कर उठते हैं | जब जागते हैं तो हमारी बुद्धि हमें बताती रहती है कि ये नहीं करना, वो नहीं करना , इसे ऐसे नहीं करना, इसको ऐसे करना इत्यादि | सो जाने पर हमारी बुद्धि भी विकल हो जाती है | हमें पता ही नहीं चलता कि हमारी टांग कहाँ पर है और हमारे हाथ कहाँ पर हैं और हमारा शरीर कहाँ पर किस अवस्था में है | 



ऐसे समय में मन स्वतंत्र हो जाता है , वो जो देखना चाहता है वही देख लेता है | किसी की मार – पिटाई करनी हो तो मार – पीट के आ जाता है और किसी को प्यार वगैराह कुछ करना हो तो प्यार कर के आ जाता है | इसलिए जो बात जागने में संभव नहीं हो पाती वो बात सो जाने पर एक तरह से पूरी हो जाती है | यह एक तरह के सपने हैं | अगर किसी विषय के बारे में चिंता है मन में कि इसका क्या होगा, कैसे होगा तो हम नींद में भटकेंगे, हमें रास्ता नहीं मिलेगा, हमारी ट्रेन छूट जाएगी और अगर हम आनन्दित हैं किसी विषय को लेकर तो नींद में हम मित्रों की महफिल में बैठे हुए होंगे, परिवार में बेठे हुए होंगे, ठहाके लग रहे होंगे और आनन्द ही आनन्द होगा | ये सब मन के कारण होता है | 


                मन को हम जितना शुद्ध करेंगे उतना ही सो जाने पर हम शुद्ध चीज को देखेंगे | मन को शुद्ध कैसे करें ? तो यह जागने पर विचारों को शुद्ध करने से होगा | जब किसी व्यक्ति के बारे में कोई विचार उठे तो वो धनात्मक ही उठे | हमारे लिए लाख किसी व्यक्ति ने गलत काम किए हों लेकिन हमारे मन में उसके प्रति कोई गलत भाव न आए तो हमारे विचार भी सही होंगे | ये काम जरा कठिन है, मगर हम इस दिशा में प्रयास कर के सफलता प्राप्त कर सकते हैं | प्रार्थना को नियमित करना इसका सरल उपाय है | हमारे विचार ही हमारे बोल बनते हैं, और हमारे बोल ही हमारे कृत्य बनते हैं | ये तीनों चीजे विचार, बोल और कृत्य, हमारे कर्म कहलाते हैं | हमारे कर्मों को धनात्मक दिशा देना मन को शुद्ध करना है | मन को शुद्ध करने के बाद हम सपने भी शद्ध ही देखेंगे | वो सपने देखेंगे, जो समय से पहले ही देख लें और जो सच हो जाएं | ऐसा कैसे होता है कि हम वो सभी कुछ जो अभी तक नहीं हुआ स्पष्ट देख लेते हैं ? तो यह आगे की बात है और यह होना भी कोई अचरज की बात नहीं | प्रार्थना में चलते चलते एक बिंदु आता है जब यह सम्भव हो जाता है | हालांकि नींद भी एक अवस्था है, इससे आगे सुषुप्ति है और इससे आगे तुरीया की स्थिति है, ऐसा सनातन धर्म में कहा गया है |


              कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें नींद नहीं आती, वे सिर्फ आराम करते हैं और उनके आस पास उन्हें सब पता होता है कि कहाँ पर क्या हो रहा है | फिर उन्हें सपने भी नहीं आते | सपनों का नींद से ही सम्बन्ध है और नींद में जाने पर पूर्णतया मन का साम्राज्य चलता है | जो कभी सोया ही नहीं उस पर मन का साम्राज्य नहीं चलता | मन उनके अनुसार चलता है, वे मन के अनुसार नहीं चलते | वैसे मन के शुद्ध हो जाने पर हमारे विचार, हमारे बोल और हमारे कृत्य तीनों शुद्ध हो जाते हैं | हमें तब स्वप्न भी सुस्वप्न आते हैं, लेकिन पंहुचे हुए लोग कहते हैं कि – जब जाग रहे हैं तो भी ये सपना देख रहे हैं , असल में वे जागृति की बात कर रहे हैं | जो पूर्णतः जागृति की अवस्था में है उन्हें सपने नहीं आते और उनके कर्म भी जागृत होते हैं | 
 के.बी.व्यास
             

Sunday, 1 October 2017

कर्मों का आरम्भ
कर्मों का महत्व है और जागे हुए लोग इसका सही मूल्यांकन कर सकते हैं | हम हर समय कोई ना कोई कर्म अवश्य करते हैं, मगर एक समय बाद उन कर्मों के करने में हमारे गुरु की प्रेरणा भी हमारे साथ होती है | कर्म तो हम ही करते हैं परन्तु एक प्रेरणा हमारे साथ होती है जो दिशा निर्देश देती रहती है | गुरु – शिष्य का सम्बन्ध फिर प्रगाढ़ होता चला जाता है | एक स्थिति पर आकर गुरु – शिष्य दोनों एक हो जाते हैं, और उनमें कोई फर्क नहीं रह जाता | यह जागृति की स्थिति है |

कुछ लोगों के जीवन में गुरु नहीं होते मगर किसी व्यक्ति की प्रेरणा से वो प्रभावित होता है | उसने जिस तरह से जीवन में कोई कार्य किया हम भी अमूमन वैसा ही करना चाहते हैं | संगीत के क्षेत्र में, कला के क्षेत्र में, कानून के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में, आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में, आजकल तो व्यापार और प्रबन्धन के क्षेत्र में भी लोग उसकी ओर नजर डालते है जिसकी प्रेरणा और दिशा - निर्देश उन्हें लक्ष्य पर पंहुचा दे | तो इस तरह से ही जो जीवन में प्रेरणा दे दे और दिशा – निर्देश दे दे वो गुरु होता है |

लेकिन आपने सोचा है कभी कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए ? कर्मों के आधार पर ही हमारा जन्म होता है और कर्मों के आधार पर ही हमारी मृत्यु हो जाती है | मगर ये सिलसिला कब से चल रहा है ? हम हर पल नया कर्म कर रहे हैं और न जाने कब से कर रहे हैं | मगर इसकी कहीं तो शुरुआत होगी, कहीं तो इसका आरम्भ हुआ होगा | तो ये कर्म हमने सौ, दो सौ , चार सौ , हजार वर्ष पहले, दस हजार वर्ष पहले, लाखों, करोड़ो, अरबों, खरबों, अनंत वर्षों पहले से, अनगिनत, असीमित और असंख्य वर्षों पहले से कर रहे हैं | वो तब से हमीं में सुरक्षित पड़ा हुआ है और जैसे जैसे हम जागृत होते हैं वैसे वैसे हम इन्हें देख सकते हैं |

कर्मों को करने से उनके फल भी सामने आए और अच्छे और बुरे कर्म भी सामने आए | स्त्री रूप भी सामने आया और पुरुष रूप भी सामने आया | फिर दो तरह के व्यक्ति बने, सज्जन व्यक्ति और दुर्जन व्यक्ति | हालंकि दोनों आपस में परिवर्तनशील हैं | इसलिए सज्जन व्यक्ति को हर पल जागरूक और सजग रहना पड़ता है, मगर वो भी चूक सकता है इसलिए गुरु की आवश्यकता होती है, जिससे वो कभी चूके नहीं |

वैसे हम आपनी बुद्धि का केवल ५% हिस्सा उपयोग में लेते हैं, कुछ लोग अपनी बुद्धि का ७% हिस्सा उपयोग में लेते हैं उन्हें हम बुद्धिमान कहते हैं, आइन्स्टाइन तो अपनी बुद्धि का १२% उपयोग में लिया करता था ये वैज्ञानिक बता चुके हैं | तो अगर हम बाकी की बुद्धि का भी उपयोग कर लें तो हमें मालूम चल जाएगा कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए | यदि हम जागृत अवस्था में आ जाएं तो हमें मालूम हो जाएगा कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए और उन्हें करते करते हम कैसे आज की स्थिति तक पंहुचे हैं | निरन्तरता के नियम के आधार पर हम जागृत होने की ओर आगे बढ़ते रहें तो हम उस मूलभूत स्थिती को प्राप्त कर सकते हैं , जिसे पूर्णतया जागृति कहते हैं | तब हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने कर्म करने कब आरम्भ किए थे |

के.बी.व्यास

Monday, 14 August 2017

प्रश्न का मनोविज्ञान
हर इंसान कभी ना कभी किसी ना किसी बात पर प्रश्न जरुर पूछता है | पूछा जाने वाला प्रश्न हमारी आंतरिक अवस्था का स्पष्ट प्रतिरूप होता है | जो मन के भीतर होता है वो अपनी अभिव्यक्ति में कई बार प्रश्न बन के भी उभरता है | 


यह जरूरी नहीं की जो हम प्रश्न हम पूछ रहे उसका उत्तर हम जानते नहीं, बल्कि कई बार सामने वाले को परखने के लिए भी हम प्रश्न पूछते हैं | भेद निकालने के लिए प्रश्न पूछते हैं और कई बार बात को भटकाने के लिए हम प्रश्न पूछते हैं | कई बार हम वाकई कोई प्रश्न पूछ रहे होते हैं जिनका उत्तर हमें पता नहीं होता | जब उत्तर कोई दे देता है तो हम उसे अपना बना कर पेश करते हैं | यंहा सबसे बड़ा रोड़ा आता है अहंकार का | पहले तो कई प्रश्नों के उत्तर ही हमें मालूम नहीं होते जब उत्तर मालूम हो जाते हैं तो हम ज्यादातर ये बताना नहीं चाहते कि उत्तर किसने दिया है | 
 हर उत्तर के पीछे बुद्धि और विवेक का हाथ होता है | किसी प्रश्न के उत्तर की खोज करना मनुष्य का स्वभाव है | मनुष्य अपने प्रश्नों के बल बूते पर ही आज यहाँ तक पहुचा है | विज्ञान का तो आधार ही प्रश्न है , बिना प्रश्न के कोई बात ही नहीं होती | प्रश्न पूछा फिर उसका उत्तर मिल जाता है, अब उसका आगे जाने पर उसका उत्तर कुछ नया होता है | प्रश्न वही रहता है मगर विज्ञान में उत्तर बदलते रहते है | आज के जमाने में इसे विज्ञान की प्रगति कहा जाता है |
 एक बात तो तय है की जो भी प्रश्न हमने पूछा है हमारे भीतर उसका उत्तर मौजूद है | जिसका उत्तर हमें मालूम नहीं उसका प्रश्न भी नहीं बन सकता | चाहे हम कोई भी प्रश्न सोच लें, चाहे कहीं से चलकर वो प्रश्न हमारे मस्तिष्क में आया है , हमारे मस्तिष्क में वही प्रश्न आएगा जिसका उत्तर हमारे भीतर होगा, इसलिए उत्तर देने से ज्यादा प्रश्न की गहराई क्या है यह जानना बहुत आवश्यक है | जैसे जैसे बुद्धि और विवेक सघन होते चले जाते हैं हमारे प्रश्न उसी हिसाब से बदलते जाते हैं | एक अवस्था वो आती है जब कोई प्रश्न नहीं रहता क्यों की तब तक सारे उत्तर मिल चुके होते हैं, विज्ञान तब शिशु लगता है क्यों की उसका प्रश्न तो वही होता है लेकिन उत्तर बदलते रहते हैं |
 

अपने बारे में, अपने परिवार के बारे में , समाज के बारे में, देश – दुनिया के बारे में, पूरे संसार के ओर-छोर के बारे में, इस सौरमंडल के बारे में, आकाशगंगा और पूरे ब्रह्मांड के बारे में प्रश्न उठ सकते है | इसलिए कहा गया है की प्रश्न की गहराई जानने का प्रयास करना चाहिए, जिस दिन बुद्धि और विवेक पूरे परिपक्व होंगे उस दिन प्रश्न का उत्तर हमें मिल जाएगा |
उत्तर सभी प्रश्नों के जीवन की भीतरी परतों में छुपे रहते हैं | सतह पे उत्तर भी होते हैं लेकिन केवल प्रश्न ज्यादा उठते है , जिन्हें सुनकर जानकार व्यक्ति ये पता लगा सकता है कि मनुष्य की आदत क्या कह रही है | इसी वजह से जितना ज्यादा मनुष्य और लोगों से मिले, जितना ज्यादा बात करे, जितना ज्यादा समझने की कोशिश करे उतना ज्यादा वो परिपक्व होता चला जाता है और इसका कोई अंत नहीं |


के. बी. व्यास


जीने की कला
एक पूरा जीवन जीने के बाद जब मृत्यु आती है तो कुछ लोगों को डर लगता है, कुछ को बहुत अटपटा लगता है बड़ा अजीब लगता है कि ये क्या हो रहा है मगर कुछ हैं जो बहुत शान्ति से मरते है | पूरी जिन्दगी हमारे सामने कुछ ही देर में एक फिल्म की तरह घूम जाती है | हमें स्पष्ट पता चल जाता है कि हमने किस किस को सुख दिए और किस किस को दुःख दिए | मृत्यु के समय हमारी त्वचा और हड्डियों के बीच में एक हवा चलती है | जिसने सारी उम्र लोगों को दुःख दिए ये हवा बहुत डराती है, वो इंसान पसीने पसीने हो जाता है उसे घबराहट होने लगती है, वो कुछ कह नहीं पाता लेकिन उसे भीतर ही भीतर पता चलने लगता है कि उसने क्या किया है |

वहीं दूसरी ओर अच्छे कर्म करने वालों के भीतर ये हवा बहुत सुहानी लगती है, उन्हें भरपूर आनन्द आता है, उन्हें अहसास होने लगता है कि उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है | अंतिम समय में मन का अहसास मनुष्य को बता देता है कि उसने क्या किया | अक्सर हमने कुछ लोगों को अपने अंतिम समय में माफ़ी मांगते हुए देखा है | सारी उम्र जिससे दुश्मनी रही उससे क्षमा मांग ली जाती है | कहते हैं उसका अंतिम समय आ गया है, इसलिए जो कर दिया वो बदल तो नहीं सकता क्षमा मांग सकता है और उसका फल भोग सकता है | यही उसके बस में होता है और यह एक बहुत बड़े परिवर्तन का सूचक है |

जीने की कला आनी चाहिए | जीते जी जो सुख से जीता है वह मृत्यु पर भी सुखी है | जो व्यक्ति जीते जी दूसरों के भले के बारे में सोचता है और कर देता है उतना ही वो सुखी होता है | इसलिए हमें लोगों की सुननी और समझनी तो चाहिए, मगर फिर अपने विचारों में डूब कर चितंन मनन करना चाहिए और अंत में वही करना चाहिए जो सही हो | बुद्धि पूछ सकती है कि सही और गलत का निर्णय कौन करेगा ? तो वो हमारा मन करेगा | मन के भाव सब खेल खेलते हैं इसलिए निरंतर मन के भावो को ऊपर उठाना चाहिए, यही जीने की कला है |
के.बी.व्यास
( मेरी पुस्तक “सहज अभिव्यक्ति” से उदृत )

Friday, 14 July 2017



सहज सुंदर मन

कहते हैं जो भाव व्यक्ति के मन में होते हैं वो उसके चेहरे पर आ जाते हैं और जो भाव चेहरे पर होते हैं उनका सार व्यक्ति की आँखों में झलक जाता है | एक चेहरा भौतिक होता है, जो सामने दिखता है लेकिन वाणी की गुणवत्ता और शब्दों का चयन भी व्यक्ति का दूसरा चेहरा कहलाता है | हृदय के भावों का जब पूरे होश ओ हवास में प्रबंधन (मैनेज ) किया जाए , उन्हें और सुंदर भावों से भरा जाए तो चेहरे पर स्वतः ही अदभुद सौम्यता आ जाती है | ठीक वैसे ही जैसे यदि जड़ें मजबूत हों तो वृक्ष स्वतः ही समृद्ध होता है |
    
सुंदर और धनात्मक भाव सबसे बड़ी संपदा हैं | इस संपदा को समृद्ध करना अपने आप में एक चुनौती है और धार्मिक व्यक्ति वही है जो इस चुनौती को स्वीकार कर के अंत में विजय प्राप्त करे | जब आस पास के सभी लोग स्नेह दे रहे हों तब भावों को सुंदर और धनात्मक रखना आसान है , लेकिन जब कोई व्यक्ति या घटना आहत कर दे , मन को चोट पंहुचा दे तब भावो को सुदंर और धनात्मक रखना मुश्किल है | अक्सर हम जीवन की रहस्यता देख कर आवाक रह जाते हैं जैसे किसी ने अगर स्नेह, प्रेम , प्रोत्साहन के दो शब्द कह दिए तो हृदय उमंगों से भर जाता है और अगर दूसरे ही क्षण उस व्यक्ति ने कुछ अप्रिय कहा तो क्रोध आ जाता है | तो जब क्रोध आया तब वो उमंगें कहाँ गायब हो गई ? और जब उमंगें थी तब क्रोध कहाँ था ?
 
 चिंतन करने पर पता चलता है कि दोनों ही हमारे भीतर निहित रूप ( लेटेन्ट ) में थे , बाहरी वातावरण में कुछ घटा और प्रत्युतर में भीतर से भी कुछ प्रकट (मैनीफैस्ट) हुआ, कभी उमंग या कभी क्रोध | तो अगर यह सिलसिला चलता रहे कि जब वातावरण में कोई प्रेम स्नेह दे तो उमंग , जब कुछ अप्रिय घटे तो भीतर से क्रोध तो हम एक तरह से वातावरण की कठपुतली बन के रह जाते हैं | हमारी खुशी वातावरण पर निर्भर हो जाती है | धार्मिक व्यक्ति वह है जो वातावरण या जीवन की घटनाओं के हाथ की कठपुतली ना बनें | उसका उमंग उसके अपने प्रबंधन में रहे और उसका क्रोध भी उसके अपने प्रबंधन में रहे | यह यात्रा धर्म की यात्रा है |
  
अच्छे सुंदर और धनात्मक भावों के साथ साथ विवेक को जगाना भी समान रूप से आवश्यक है ताकि अप्रिय वाणी या घटनाओं के उत्तर में मन से अच्छे भाव ही निकलें और स्व गरिमा भी बनी रहे | भावुकता और सही गलत की सोच के बीच , विवेक संतुलन बनाए रखता है | कोरी भावुकता भी मोहवश पाप करवा देती है और कोरी सही गलत की सोच भी मनुष्य को शुष्क और संवेदन हीन बना देती है | इसलिए दोनों पक्षों का संतुलन विवेक के द्वारा होता है , इसलिए विवेक शील व्यक्ति को सच्चा न्याय करने वाला भी कहते हैं |

अंतर्मन को साफ़ रखना , हमारे भावों को स्वच्छ रखना ही सही मायनों में धार्मिक होना है | अपनी ओर से सभी के लिए अच्छी वाणी और किसी भी तरह की घटना या कही गई बात के प्रत्युतर में, सुंदर और धनात्मक भाव ही निकलें , इस तरह की क्रिया या प्रतिक्रिया का अभ्यास ही सही मायनों में धर्म पर चलने जैसा है |
जीवन दर्शन एक पूरा विषय है, एक होलिस्टिक व्यू है | जीवन दर्शन की मात्र किताबें पढ़ना इतना प्रभावी नहीं होता जितना किसी उत्तम कोटि के जानकार के सानिध्य में बैठकर किताबें पढ़ना | ऐसा व्यक्ति ही जीवन दर्शन की शिक्षा यात्रा में हमें अहंकार से बचाए रखता है , अर्जित ज्ञान को अमल में लाने हेतु प्रोत्साहित करने का काम करता है |

जब ज्ञान अमल में आना आरंभ होता है तो हम वातावरण की कठपुतली बिल्कुल नहीं बनते | हम अपनी मनः स्थिति के स्वयं राजा होते हैं | ऐसे लोगों को सच्चा स्वामी कहना ठीक होगा | सुंदर व्यक्ति संसार में रहते हैं , खिलते हैं और सुगंध फैलाते हैं | जितने ज्यादा लोग इस तरह से खिल जाते हैं धरती पर स्वर्ग उतना ही अधिक महकता है |

के. बी. व्यास  

Friday, 10 February 2017



मंत्र तन्त्र और यंत्र
         भारत में तीन तरह की चीजे होती हैं मंत्र, तन्त्र और यंत्र | मंत्र मनुष्य को ऊपर ले जाते हैं, तन्त्र मनुष्य को नीचे ले आते हैं और यंत्र ? यंत्र मनुष्य की सहायता करते हैं, वे ऊपर भी ले जा सकते है वे नीचे भी ला सकते हैं, वे सिर्फ सहायक होते हैं | आजकल यंत्रों का बोलबाला है | अंग्रेजी हिन्दी में कहें तो सब कुछ मशीनीकरण हो रहा है | दिन ब दिन हम मशीन होते जा रहे हैं बिना इंसानियत को केन्द्र में रखे हुए, और इसलिए मशीन होने का हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ रहा है |
                 अब अधिकांशतः कार्य मशीनों से हो रहा है , यंत्रों से हो रहा है | यंत्र ना हो तो शायद जीवन ही ना चले | इतना ज्यादा हम यंत्रों पर निर्भर हो गए हैं | इंटरनेट ठप्प हो जाए तो मुसीबत हो जाए, मोबाइल बंद हो जाए तो जीना मुश्किल हो जाए | ये आलेख भी आप इंटरनेट के जरिए पढ़ रहे हैं| हर तरफ यंत्र ही यंत्र है, मशीन ही मशीन और ये इतनी द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है कि पूछिए मत | परन्तु इसके अनुपात में मंत्र गायब हैं | हमको मंत्रों का उच्चारण सही नहीं लगता | मंत्र जीवन की आंतरिक स्थिति को सम्हालते हैं | उसके आंतरिक धरातल पर असर पड़ता है |
               इंसान के मरने के क्षण में उसकी आंतरिक स्थिति ही उसके सबसे अधिक काम आती है | दूसरा कोई नजदीक से नजदीक का भी रिश्तेदार काम नहीं आता | केवल इंसान का आंतरिक जीवन ही काम आता है और इस समय पता चलता है अकेले यंत्र बेकार थे |
मंत्र जीवन जीने की शैली है | जो लोग मंत्र नही अपनाते उनका जीवन धीरे धीरे यंत्रों के हाथ में चला जाता है और फिर उससे बाहर आना कठिन होता है , लेकिन अगर मंत्र जीवन में हो तो यंत्र भी बहुत सहायक बन जाते हैं |
             यंत्र आज की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है और वो इसलिए कि जीवन में मंत्र नहीं हैं | तन्त्र यदि जीवन में आ जाए तो विनाश है और तन्त्र के साथ खुद का अहंकार भी जुड़ जाता है  इसलिए सर्वनाश है | मंत्र अपने साथ समस्त दूसरों का भला चाहता है और तन्त्र केवल अपना भला चाहता है | इतिहास इस बात का गवाह है | 
हम जीवन में यंत्रों के साथ मंत्र भी अपना लें तो कोई समस्या नहीं है |

के. बी.व्यास

Monday, 6 February 2017



दो कान, दो आँखें और एक मुँह

               कुछ लोग बोलते हैं तो इतना बोलते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि क्या बोल गए | वे सामने वाले की सुनते ही नहीं | ऐसा लगता है उन्हें एक मुँह और मिल गया हो | जब दो लोग ऐसे मिल जाएँ तब किसी को किसी की बात समझ नहीं आती और जब १० में से ८ लोग ऐसे मिल जाएँ तब तो वहाँ बंटाधार है | एक की बात पूरी नहीं होती तो दूसरा शुरू हो जाता है , दूसरे की बात पूरी नहीं होती तो तीसरा अपनी बात कहने लगता है , फिर चौथा शुरू हो जाता है , फिर पाँचवाँ , फिर छटा, फिर सातवाँ और इस तरह पूरी धमाचौकड़ी मच जाती है | ऐसे लोगों को एक नेक सलाह है कि हमे सुनने के लिए दो कान और बोलने के लिए एक मुँह मिला है | हमें दुगुना सुनना है और उस हिसाब से आधा बोलना है | हमें दुगुना पढ़ना है और देखना है तब आधा बोलना है | यह करना कठिन है | जो इंसान जागा हुआ हो वही कर सकता है |
                 सबसे पहले दो कान और एक मुँह को लेते हैं | असल में दुनिया में हमें सबको सुनना चाहिये और भरपूर सुनना चाहिये | जो इंसान सब की सुन लेता है जाग कर, वो महान व्यक्ति है | जब हम विभिन्न इंसानों को सुनते है तो हमारा नजरिया बिल्कुल अलग हो जाता है | अलग अलग दृष्टिकोण सुनने को मिलते हैं | हो सकता है एक दृष्टिकोण दूसरे दृष्टिकोण से भिन्न हो और यहाँ तक कि दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत भी हो सकते हैं , मगर एक पॉइंट पर आकर सारे दृष्टिकोण एक हो जाते है |
          उदाहरण के तौर पर मैं यहाँ विभिन्न धर्मों को लेता हूँ | धर्म यूं तो सभी अलग अलग हैं मगर शान्ति हो दुनिया में यह सारे धर्म चाहते हैं | तो यह एक कौमन दृष्टिकोण हो गया | विभिन्न धर्म सबसे अधिक विरोधाभासी लगते हैं | जिन लोगों को सभी धर्मों में एकाकार मिल जाता वो सही मायने में दो कान, दो आंख और एक मुँह वाली बात को साकार करते है | अपनी बात को दृढ़ता पूर्वक संक्षेप में कह के हमें दोनों कानों से सामने वाले की बात सुननी चाहिये और अपने मस्तिष्क को खुला रखना चाहिए |
            अब दो आँखे और एक मुँह को लेते है | हमें दो आँखे मिली हैं पढ़ने के लिए, देखने के लिए | तो हमे दुगुना पढ़ना चाहिए और उस हिसाब से बोलना चाहिये | हमें लोगों को दुगुना देखना चाहिये | उन्हें देखने के बाद , अपने भीतर निरीक्षण करना चाहिये | लोगों को देखने के बाद ही हम ये जान सकते हैं कि इसका नजरिया क्या है | जब पढ़ने की बात चली है तो इस दिशा में अथाह सागर है | हम सारी उम्र तक पढ़ सकते है | जीवन की आखिरी साँस तक पढ़ सकते हैं | जितनी भाषाएँ हम जानते है , हम उतना पढ़ सकते है | विभिन्न जीवनियाँ हैं , कहानियाँ हैं , कविताएँ हैं , आलेख हैं, शायरी है , रुबाई है , गजल है और भी  कितनी विधाएं है |
                 जैसे अभी पूरे विश्व में कविता का नया रूप आया है - हाइकु | जो मूलतः तो जापान से आया है , मगर अलग अलग भाषाओं में भी लिखा जा रहा है | इसमें तीन लाइने होती हैं और तीनों लाइने अलग अलग होती हैं | कोई भी एक दूसरे से मेल नहीं खाती | पहली पंक्ति में ५ अक्षर , दूसरी में ७ अक्षर और तीसरी में पुनः ५ अक्षर होते हैं, मगर जब तीनों पंक्तियों को एक साथ पढ़ा जाए तो एक भाव उभर के आता है | जिसे हाइकु कहते हैं |
                       तो इस तरह पढ़ने के लिए अथाह सागर है | जिसने जितनी भाषाएँ सीख ली उस इंसान का उतना विस्तार हो गया | अकेले भारत में ही इतनी भाषाएं हैं कि हम उनके साहित्य को अगर पढ़तें जाएँ तो हमारी उम्र निकल जाए |
                  इंसान जितना ज्यादा सुनता है और पढ़ता है तथा लोगों को देखता है , उसे बात उतनी गहरी समझ में आती है | उसे लोगों के बीच में रहना अच्छा लगता है | उसके बाद वो अपनी बात अगर बोले तो उसकी बात का असर होता है | तो हम जितना बोलते हैं उससे दुगुना हमें सुनना चाहिये और जितना बोलें उससे दुगुना पढ़ना व देखना चाहिये | ऐसा अगर हम करें तो जीवन सार्थक हो जाता है |

के.बी.व्यास