Saturday, 25 May 2013



टाइम मशीन

आज से २००० हज़ार साल बाद जब पुष्करणा ब्राह्मणो का इतिहास टटोला जाएगा तो भा सा री हथई का उल्लेख कुछ यूं होगा........यहां सारे लोग हर तरह के रंग बिखेरते थे, जम के ऊंची ऊंची चेपते थे, बाकी के हंस हंस के लपेटते थे.
                                                                                                           
भक्ति भाव रे भरे हुए चित्र लगाते थे, ९९% लोग इधर उधर से अंटा कर शायरी लिखते थे, मूल शायर का नाम नहीं लिखते थे और जितने भी लाइक या कमेंट उस पे आते थे वो सारे खुद ही डकार जाते थे, मूल शायर को चनिया पप्पा भी नहीं देते थे. एक इंजीनियर साहब का ज़िक्र आता है जिन्हौंने समाज सुधार की लहर को पुनः जाग्रत किया और एक नई उम्मीद जगाई. पुष्करणा एकता पर एक बार एक उफ़ान के आने के भी साक्ष्य मिलते हैं.
                                                           
रूढियों और कुरीतियों पर सभी खुल के अपने अपने मत रखते थे. मुम्बई के एक शख्स का ज़िक्र आता है जिसे एक शायर उर्फ़ डौन उर्फ़ कहानीकार और उर्फ़ में पता नहीं क्या क्या कहते थे.यह शख्स मिठाइयों और आइसक्रीम मेंगो की फ़ोटुवें लगा लगा के मूंडे में पाणी की टूंटी खुलवा देता था. एक शख्स कभी मोरिये की, कभी चिडी कबूतर की, कभी गंटा बीडते हुओं की ज़बरदस्त फ़ोटुवें लगाता था, इस शख्स को साफ़ा गुरू से भी जाना जाता है, लोग साफ़ा बांधने की कला सीखने के लिए आते थे, और इस बंदे की सादगी में ही बंध के रह जाते थे.       
                       एडिस गिफ़्ट नामक जगह से आज भी राधे राधे सुनाई देता है. दो बोहरा बंधुओं में एक के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है कि यह शख्स मूलतः जापान का था, फ़्रांस का था या भा सा ही था, क्यों कि एक शब्द है हाइकु, जो जापानी शब्द है और इस शख्स को हाइकु किंग का खिताब मिला हुआ था, दाढी ये फ़्रेंच कट रखता था, मगर बातें भा सा ओं जैसी टणकार करता था,
इनके छोटे भाई को धीरे से कोई औरिजिनल थौट खिसकाने का हुनर प्राप्त था, जिसे पढ के मौज की तरंग लहराया करती थी.
                                               लख जी की पौळ और हाथी चौगान दो स्तंभ गिने जाते थे,जिनकी कलम का जादू और अपनत्व का जादू सर चढ कर बोलता था. चौ.हा.बो., कमला नेहरू नगर,सरदारपुरा आदि जगहों पर बडी बडी टणकार हस्तियों के आवास होने के प्रमाण मिलते हैं. गंगानगर, नागपुर,चेन्नई,दिल्ली पता नहीं कहां कहां तक हथई का चस्का फ़ैला हुआ था, कुछ इतिहासकार तो यह भी कहते हैं कि यह चस्का दुबई, सिंगापुर, हौंग कौंग, अमेरिका तक फ़ैला हुआ था और इनमें से एक देश में तो एक महान विभूति ने सर्व-पतियों के हित में झंडा बुलंद किया था और सारे पतियों को आगे आ कर इसे थामने के लिए आह्वान किया था. अब इस बात पर इतिहास कार खोज कर रहे हैं कि कौन कौन था जिसने अपनी अपनी पत्नियों के कहने से इस झंडे से अपना हाथ हटा के जोड लिया था. अब अगर आप ये पूछ रहे हैं कि हाथ झंडे को जोडा या पत्नी को, तो इस बात पर इतिहासकारों ने लिखा है कि यह वे अपनी पत्नी से परमिशन ले कर ही बता सकते हैं कि सच बताना है कि नहीं बताना है.
                                      

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