सहज सुंदर मन
कहते हैं जो भाव व्यक्ति के मन में होते हैं वो उसके चेहरे पे आ जाते हैं और जो भाव चेहरे पर होते हैं उनका सार व्यक्ति की आंखों में झलक जाता है. एक चेहरा भौतिक होता है जो दिखता है लेकिन वाणी की गुणवत्ता और शब्दों का चयन भी व्यक्ति का दूसरा चेहरा कहलाता है. मन के भावों का जब पूरे होश ओ हवास में प्रबंधन(मैनेज) किया जाय, और मन को सुंदर भावों से भरा जाय तो चेहरे पर स्वतः ही अदभुद सौम्यता आ जाती है. ठीक वैसे ही जैसे यदि जडें मज़बूत हों तो वृक्ष स्वतः ही समृ्द्ध होता है. सुंदर और धनात्मक भाव सबसे बडी संपदा हैं. इस संपदा को समृ्द्ध करना अपने आप में एक चुनौती है, और धार्मिक व्यक्ति वही है जो इस चुनौती को स्वीकार कर के अंत में विजय प्राप्त करे.
जब आस पास के सभी लोग स्नेह दे रहे हों तब तो भावों को सुंदर और धनात्मक रखना आसान है, लेकिन जब कोई व्यक्ति या घटना आहत कर दे, मन को चोट पंहुचा दे तब भावों को सुंदर और धनात्मक रखना मुश्किल है. कभी कभी जीवन की रहस्यता देख कर हम आवाक रह जाते हैं. जैसे अगर किसी ने स्नेह प्रेम प्रोत्साहन के दो शब्द कह दिए तो मन उमंगों से भर जाता है और अगर दूसरे ही क्षण उस व्यक्ति ने कुछ अप्रिय कहा तो क्रोध आ जाता है. तो जब क्रोध आया तब वो उमंगें कहां गायब हो गई? और जब उमंगें थी तब क्रोध कहां था? चिंतन करने से पता चलता है कि दोनो ही हमारे अंदर अदृष्य निहित रूप(लेटेन्ट)में थे, बाहरी वातावरण में कुछ घटा और प्रत्युत्तर में भीतर से कुछ प्रकट (मैनीफ़ेस्ट) हुआ, कभी खुशी या उमंग या कभी क्रोध या उदासी.तो अगर यही सिलसिला चलता रहे कि जब वातावरण में कोई प्रेम स्नेह दे तो खुशी, जब कोई अप्रिय घटे तो क्रोध या उदासी, तो हम एक तरह से वातावरण की कठपुतली बन के रह जाते हैं. हमारी खुशी वातावरण पर निर्भर हो जाती है. धार्मिक व्यक्ति वह है जो वातावरण या जीवन घटनाओं के हाथों की कठपुतली ना बने. उसकी खुशी उसके अपने प्रबंघन में रहे, उसका दुख उसके अपने प्रबंधन में रहे. यह यात्रा धर्म की यात्रा है.
फ़र्ज़ कीजिए कांच के एक ग्लास में पानी भरा हुआ है,जिसमें थोडी मिट्टी डली हुई है. अगर इस ग्लास को थोडी देर स्थिर रख दिया जाय तो मिट्टी नीचे बैठ जाएगी और ऊपर का पानी साफ़ दिखेगा. लेकिन अगर कोई इस ग्लास को हिला दे तो पूरा का पूरा पानी गंदा दिखने लग जाएगा, तो अब ये पानी जो गंदा दिख रहा है क्या इसमें उसका दोष है जिसने ग्लास को हिलाया? अगर पानी पूरा का पूरा स्वच्छ हो तो कोई कितना ही ग्लास को हिला दे, पानी तो साफ़ का साफ़ रहेगा.धार्मिक व्यक्ति अपने जीवन के पानी को स्वच्छ करके उस पर अच्छी संगत का फ़िल्टर युक्त इतना टाइट ढक्कन लगा देता है कि कोई उसमें गंदगी डाल ही नहीं सकता. इसी को सत्संग कहते हैं.
इसके अलावा अच्छे, सुंदर और धनात्मक भावों के साथ साथ विवेक को जगाना भी समान रूप से आवश्यक है, ताकि अप्रिय वाणी या घटनाओं के उत्तर में अच्छे भाव भी निकलें और स्व गरिमा भी बनी रहे. विवेक, भावुकता और सही-गलत की सोच के बीच संतुलन बनाए रखता है.कोरी भावुकता भी मोहवश पाप करवा देती है और कोरी सही-गलत की सोच भी व्यक्ति को शुष्क और संवेदन हीन बना देती है. इन दोनों पक्षों का संतुलन विवेक द्वारा होता है.इसलिए विवेकशील व्यक्ति ही सच्चा न्याय करने वाला होता है.
अन्तर्मन को साफ़ करना, हमारे भावों को स्वच्छ रखना ही सही मायनों में धार्मिक होना है.अपनी ओर से सभी के लिए अच्छी वाणी और अच्छे भाव ही उपजें और किसी भी तरह की घटना या कही गई बात के प्रत्युत्तर में, सुंदर और धनात्मक भाव ही निकले, इस तरह के एक्शन और रिएक्शन का अभ्यास सही मायनों में धर्म मार्ग पर चलने जैसा है.इस मार्ग पर चलने की शुरूआती दिशा और प्रेरणा, किसी को किताबें पढ के मिल जाती है,किसी को अपने मां बाप रिश्तेदार मित्र या टीचर प्रोफ़ेसर की सीख में मिल जाती है,किसी को जीवन की किसी ऎसी घटना से मिल जाती है जिसका बहुत गहरा असर हुआ हो, किसी को किसी धर्म-गुरू के सानिध्य में बैठ के मिल जाती है, किसी को जप तप से मिल जाती है और किसी को इन सभी में से दो या दो से अधिक विकल्पों के आपसी संयोग से मिल जाती है.आप सहमत होंगे इस बात से कि शुरूआत कैसे भी हो मगर होनी चाहिए और मन को स्वच्छ निर्मल करने की और इसे धनात्मक भावों से भरे रखने की यात्रा सतत रूप से जारी रहनी चाहिए.
किसी भी क्षेत्र की शिक्षा लेनी हो, चाहे खेलों की,विज्ञान की,संगीत की,चिकित्सा की,कला की,कानून की तो उसी क्षेत्र के किसी उत्तम कोटि के जानकार के साथ रहकर उससे शिक्षा लेना उचित रहता है. ठीक इसी प्रकार यदि जीवन दर्शन की शिक्षा लेनी हो तो किसी उत्तम कोटि के जानकार के साथ रहकर ही लेनी चाहिए. जीवन दर्शन की शिक्षा में मात्र किताबें पढना इतना प्रभावी नहीं होता जितना किसी उत्तम कोटि के जानकार के सानिध्य में बैठ कर सीखना. ऎसा व्यक्ति ही जीवन दर्शन की शिक्षा-यात्रा में हमें अहंकार से बचाए रख कर, अर्जित ज्ञान को अमल में लाने हेतु प्रोत्साहित करने का काम कर सकता है.
जब ज्ञान अमल में आना आरंभ होता है तो हम वातावरण की कठपुतली कदापि नहीं बनते. हम अपनी मनः स्थिति के स्वयं राजा होते हैं, स्वामी होते हैं. एसे लोगों को सच्चा स्वामी जी कहना ठीक है.जीवन के बारे में पूर्ण जागृति मन को सहज सुंदर बनाती है, भावों को सहज सुंदर बनाती है फ़लस्वरूप चेहरा,वाणी,शब्दों के चयन स्वतः ही सहज सुंदर हो जाते हैं. जितने ज़्यादा लोग इस तरह खिल जाते हैं धरती पर स्वर्ग उतना ही अधिक महकता है.
के.बी.व्यास
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The later part of your thoughts resonated with me. I once read somewhere that as a human being we are an average of the five persons closest to us.
ReplyDeleteI cannot claim to have understood all that is in this post but I did give it an honest attempt :)
Please do keep writing. You have a flair for it and I for one tremendously enjoy reading it.
Thank you Puneet ji.
ReplyDeletePlease feel free to mention if you find any point a bit complex,I will try and express that in more simpler words.Every thing is 2 way process.I am also learning to write my inner understandings in simple words. Bha Sa Uvach is one such attempt and now these small write ups are another way of expression to my inner interospection.