Sunday, 9 June 2013

         


       कर्म और भाग्य

विचार, वाणी और कृत्य, इन तीन धरातलों पर कर्म किया जाता है, विचारों को प्रभावित करने के लिए पांच इंद्रियों द्वारा भी संस्कार निर्मित होते हैं, कुछ देखने से भी एक संस्कार निर्मित होता है, कुछ छूने से भी एक संस्कार निर्मित होता है, कुछ सुनने से भी एक संस्कार निर्मित होता है,कुछ सूंघने से भी एक संस्कार निर्मित होता है,कुछ स्वाद चखने से भी एक संस्कार निर्मित होता है, याने ये सब हमारे विचारों को प्रभावित करते हैं और विचारों की गुणवत्ता का निर्माण करते है.

विचार ही हमारे बोल बनते हैं हमारे बोल ही अंत में हमारे कृत्य बन जाते हैं, और फ़िर इन तीन धरातलों पर किए गए कर्मों की पुनरावृत्ति कर्म-स्वभाव बनाती है. यही कर्म स्वभाव पुनः हमारे विचारों वाणी और कृत्य को प्रभावित करते हैं और संस्कार गहरी जड पकडते हैं. इसे कर्म चक्र कहते हैं. हमारे कर्म, बीज रूप में जीवन भूमि में पडे रहते हैं और जब उपयुक्त वातावरण मिलता है तो प्रस्फ़ुटित होते हैं और इस तरह जीव अपना कर्म फ़ल भोगता है.

भाग्य, व्यक्ति के खुद के ही कर्मो से बनता है,किस्मत स्वयं के अच्छे बुरे कर्मों का ही प्रतिफ़ल है. जो कुछ भी घटित होता है,जन्म से लेकर मरने तक, लिंग निर्धारण से लेकर, किस देश में जन्म लेंगे, किस समाज में जन्म लेंगे, कौन सा वंश-कुटुम्ब होगा, कौन मां बनेगी कौन पिता बनेगा, कौन भाई बहन पति पत्नि संतान बनेगी, वे आपस में कैसा व्यवहार करेंगे, कब कैसे शरीर छूटेगा, सभी कुछ स्वय़ं के ही कर्मों और अन्य इन सभी के व्यक्तिगत कर्मों के आपसी सटीक सामंजस्य के फ़लस्वरूप होता है. यही वजह है कि आपने एक विशेष मां बाप के घर में जन्म लिया है, अपने पडौसी के घर में जन्म नहीं लिया. इसे आपसी कर्म बन्धन भी कहते हैं.




अपने परिवेश अपनी किस्मत के लिए,व्यक्ति स्वयं ज़िम्मेवार है, अन्य कोई ज़िम्मेवार नहीं है इस उदघोष का मूल अर्थ यह है कि कमान व्यक्ति के स्वयं के हाथों में है. यदि व्यक्ति ठान ले तो अपनी किस्मत स्वयं बदल सकता है और अपनी मनः स्थिति तो पूर्णतः आनंद की अवस्था में रख ही सकता है.यह स्वयं उसके अपने हाथ में है. अपने सुख और दुख का बीज कारण व्यक्ति स्वयं है . चूं कि जीव स्वयं अपने वास्तविक स्वरुप के प्रति अज्ञानी रहता है इसलिए बहुत सारे प्रश्न परेशान करते हैं, विशेष रूप से दुख की घडी में, जैसे कि, जो हो रहा है वो क्यूं हो रहा है,मेरे साथ ही ऎसा क्यूं हो रहा है, कौन है नियंता? ये सारे प्रश्न तब तक ही हैं जब तक हमें स्वयं अपने आप के बारे में, निज के बारे में, आधी अधूरी जानकारी या बिल्कुल भी जानकारी नहीं होती. आधी अधूरी जानकारी तो और भी खतरनाक होती है. जिस दिन जीवन या जीव या अन्तर्चेतना के मूल स्वभाव का ज्ञान हो जाए, कोई भी प्रश्न अनुत्तरित नहीं रहता. इसलिए "मैं" कौन हूं इसकी खोज बहुत महत्वपूर्ण है, और इस दिशा में गुरू एक अहम किरदार अदा करते हैं.
                                                           
सच्चे गुरू , शिष्य को स्वयं पे निर्भर नही करते, उसे आत्म ज्ञान के पथ पर स्वयं अपने बल बूते पर खडा होने और अग्रसर होने की प्रेरणा का उपक्रम करते है. पहले तो जीव अन्जाने में ही,ज्ञानता में ही अपना अच्छा बुरा भाग्य लिखता है, यह सुप्त अवस्था है,बेहोशी की अवस्था है. फ़िर एक स्थिति आती है जब पूरे होश ओ हवास में जीव अपना भाग्य लिखता है, यह जागृति की अवस्था है. यह वो क्षण होता है जब वो वाकई यह पूर्णरूपेण जान लेता है कि अपने भाग्य का निर्माता वो स्वयं है उसे उत्तर मिल जाता है कि "मैं" कौन हूं, "नियंता" कौन है, इस "मैंऔर "नियंता" में क्या और कैसा संबन्ध है, ये दो हैं या एक ? कर्म चक्र कैसे चलता है? कर्म बीज कैसे निर्मित होता है? कर्म फ़ल कैसे बनता है? कर्मों की गति कैसी होती है? कार्मिक स्वभाव कैसे निर्मित होते हैं? कर्म कैसे बदले जा सकते हैं? बीज रूप में कर्म कैसे जीवन की भूमि में पडे रहते है और कैसे प्रस्फ़ुटन के लिए अपने सही वातावरण की प्रतीक्षा करते है ? समय क्या है? समय कैसे आगे पीछे किया जा सकता है? सही समय का क्या तात्पर्य है? ये सारे प्रश्न गुरू कृपा से उत्तर पाते हैं. अनंत शक्ति और ऊर्जा स्त्रोत हमारे ही भीतर निहित है, गुरू हमें जगाते हैं और जागृति की उस प्रक्रिया को आरंभ करते हैं जिसके पूरा होने के क्षण में यही अनंत शक्ति और ऊर्जा आंतरिक जगत में प्रचंड रूप से विस्फ़ोटित हो कर सब कुछ स्पष्ट कर देती है.
                                                  

                                  


प्रश्न है यात्रा के आरंभ करने का.खोज करने का.....इस यात्रा का आरंभ, मध्य एवम अंत सभी सुखद है, और अंत मे पता चलता है कि यह यात्रा अनंत है और परम सुख से भरी हुई है.प्रार्थना की शक्ति, विश्वास की शक्ति, आस्था का बल, इन सारे पक्षों का अनुभव गुरु सानिध्य मे होता हैं. गुरू एक व्यक्ति नहीं गुरू एक तत्व है, यह ज्ञान भी गुरू कृपा से ही आ पाता है.

गुरू का व्यक्ति रुप में जीवन में आना प्रथम सोपान है, उसके बाद कडी से कडी जुडती चली जाती है. गुरू भी स्वयं की प्यास के प्रत्युत्तर में प्रकट होते हैं,प्रश्नों के उत्तर पाने की सच्ची गहन सघन उत्कंठा के फ़लस्वरूप प्रकट होते हैं, गुरू व्यक्ति के स्वयं के कर्म फ़ल के अनुसार प्रकट होते हैं.

यह पूरी यात्रा जीव के स्वयं के कर्मों की गति के अधार पर संचलित होती है. पूरी की पूरी भौतिक जीवन यात्रा में पांच इन्द्रियों द्वारा निर्मित संस्कार, विचारों को प्रभावित करने वाले अलग अलग आयाम हैं. विचार अपना प्रभाव वाणी पर डालते हैं और फ़िर विचार और वाणी अंत में हमारे कृत्यों को प्रभावित करते हैं. ये सब कर्म कहलाते हैं और भाग्य, मात्र स्वयं के द्वारा किए गए कर्मों का कर्म-फ़ल है, जिनका प्रभाव अत्यंत क्षीण किया जा सकता है यहां तक कि उन्हें बदला भी जा सकता है.


के.बी.व्यास



  •  यह
  • विषय मुझे बहुत रुचिकर है इसलिए आपके विचार, अनुभव, सुझाव प्रश्न सभी का इस ब्लौग में स्वागत है.
    •  इस आलेख के पूर्ण या आंशिक पुनः प्रकाशन के लिए
    • लेखक की अनुमति लेना आवश्यक है. सर्वाधिकार, पुष्करणा शोध प्रकाशन, नैक्स जेन ईवेन्ट्स एम.एफ़.ज़ेड.., रैक मीडिया सिटी, रस अल खैमाह, संयुक्त अरब अमीरात के पास सुरक्षित हैं

      2 comments:

      1. To take this argument further , even guru is an extension of self. The final responsibility of all that we are or seek to be rests with us ( specifically 'I').

        Our mind acts as a filter. I only receive what filters past collective consciousness of my past actions ie my karm. My world view is hence tainted by how my mind perceives it as , which in turn is governed by how I've interacted with the world in the past. I've not had the blessings of finding the correct guru yet so I really cannot comment on it but I would imagine that he would perhaps open the vistas that are as yet unknown to me. But I guess , part of the journey of finding my guru , is finding myself.

        A thoughtful article. Thanks.

        ReplyDelete
      2. Thank you for sharing your insight on the subject.
        Guru IS an extension of the self,and there comes a time when we realize our "self" is an extension of Guru. This is called as oneness of mentor & disciple.
        Your words "Our mind acts as a filter. I only receive what filters past collective consciousness of my past actions ie my karm. My world view is hence tainted by how my mind perceives it as , which in turn is governed by how I've interacted with the world in the past" are correct and this is collectively called as Karmic Tendency. Guru surely inspire us, guide us,in such a way that we naturally take initiative based on our own seeking will to open the vistas that are yet unknown to us.Awakening to "myself" or "who am I" is the blessing of a Guru.Guru help us explore ourself, and awaken us.
        Thank you.

        ReplyDelete