चेतना के नौं स्तर
बौद्ध शिक्षाओं में एक सूत्र आता है - "चेतना के नौं स्तर " जो हमें इस बात को विस्तार से समझने में सहायता प्रदान करता है कि हम कौन हैं और हमारा सत्य रूप क्या है ? यह सूत्र हमें इस बात को समझने में सहायता प्रदान करता है कि जन्म और मृत्यु से गुजरते हुए जीवन की अनन्तकाल चलने वाली निरंतरता को बौद्ध मार्ग किस तरह से देखता है | चेतना के स्वभाव में उसके भीतर उतर कर गहन रूप से उसकी जाँच पड़ताल करने के हजारों वर्षों के अथक प्रयासों का ही फल है कि मानव जीवन को इस तरह देखना संभव हो पाया है |

एतिहासिक रूप से आज से करीब २५०० वर्ष पहले बोधि वृक्ष के नीचे शाक्यमुनी को जो परम सत्य की प्राप्ति हुई थी, उसी परम सत्य के मूल स्वरूप को समझाने और अनुभव करने के प्रयासों में ही इस सूत्र की जड़े निहित हैं | चेतना के नौं स्तरों को चेतना की नौं परतों के रूप में देखा जा सकता है, जो हमारे जीवन का सृजन करने के लिए आपस में कार्यरत रहती हैं |
'चेतना' शब्द अपने आप में कई तरह के क्रिया कलापों को समेटे हुए है, जिसमे विभिन्न इन्द्रियों द्वारा हुआ बोध या अनुभव तथा जागृत अवस्था के विचार आदि शामिल हैं | इस चेतना के पहले पाँच स्तरों से हम भली भांति परिचित है | ये हैं - देखना, सूँघना, सुनना, चखना, और स्पर्श करना जो हम हमारी आँख, कान , नाक ,जीभ और त्वचा इन पाँचों विभिन्न इन्द्रियों की सहायता से करते हैं |
चेतना का छठा स्तर वो है जहां इन पाँचो इन्द्रियों से मिली सूचनाओं के आधार पर या तो किसी छवि का निर्माण होता है या कोई विचार आकार लेता है, जिससे ये पता चले कि हमारी पाँचो इन्द्रियाँ क्या कहना चाह रही हैं | इस छठे स्तर को हम मस्तिष्क कहते हैं |
सामान्यतः इस छह स्तरों पर हमारी दैनिक गतिविधियां चलती रहती हैं | इस छठी चेतना के नीचे एक सांतवी चेतना भी निवास करती है | बौद्ध ग्रंथो में जिसे मनो-चेतना का नाम दिया गया है | जहां एक ओर ऊपर की छह चेतनाएं मूलतः बाहरी जगत की ओर अभिमुख होती हैं वहीं दूसरी ओर सातवीं चेतना मौटे तौर पर विभिन्न इन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित ना होकर, स्वतंत्र रूप से जीवन की आंतरिक दिशा की ओर अभिमुख होती हैं |
सातवीं चेतना ही वो धरातल है जहां हमें हमारी व्यक्तिगत पहचान होने का आभास होता है, अपने 'मैं ' होने का अहसास होता है | जहां अपने आप से पैदा हुआ मोह स्वयं को दूसरों से अलग करता है और विशिष्ट होने का भाव उत्पन्न करता है और यही वो धरातल है जो यह तय करता है कि - हमारे व्यक्तिगत नजरिए से सही क्या है और गलत क्या है |
बौद्ध मार्ग के अनुसार इस सातवें स्तर के नीचे एक और गहरी परत विद्यमान है, जिसे चेतना का आठवाँ स्तर कहते हैं |बौद्ध मार्ग में इसका नाम है "आलय-चेतना " | इस चेतना का कभी क्षय नहीं होता और इसे हमारे कर्मों का संचय भवन भी कहते है | जहां हमारे कर्म, ऊर्जा के रूप में संचित हो कर निवास करते हैं | मृत्यु होने पर जहां पहली सात चेतनाएं लुप्त हो जाती हैं, वहीं आठवी चेतना तब भी अस्तित्व में रहती है और जन्म के लौकिक रूप तथा मृत्यु के अदृश्य काल के चक्र से होती हुई अक्षय रहती है | इसे जीवन धारा भी कहा जा सकता है, जो दूसरी अन्य चेतनाओं की गतिविधियों को चलाने में सहायक की भूमिका निभाती है |

जो लोग चिकित्सा जगत के अनुसार मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और फिर से जीवित हो उठते हैं, उनके अनुभव को सातवीं और आठवीं चेतना की सीमा रेखा पर घटी घटना कहा जा सकता है | चेतनाओं के इन विभिन्न धरातलों के बीच के आपसी क्रियाकलाप और इनकी समझ जीवन की प्रकृति और निज (स्वयं) को समझने में अति मूल्यवान दृष्टि प्रदान कर सकती है | साथ ही साथ मानवता आज जिन समस्याओं से जूझ रही है उनके समाधान भी इससे मिल सकते हैं |
बौद्ध शिक्षाओं के अनुसार सातवीं चेतना के स्तर पर अपने निज (स्वयं) की प्रकृति को लेकर, या यूं कहें कि जिसे 'मैं ' कहते है, उस 'मैं ' का असली रूप क्या है, इसे लेकर कुछ गहरे बैठी हुई भ्रातियाँ होती हैं | ये भ्रातियाँ चेतना के सातवें और आठवें स्तर के आपसी सम्बन्ध के फलस्वरूप जन्म लेती हैं और प्रारम्भिक अहंकार के रूप में प्रस्फुटित होती हैं |
बौद्ध शिक्षाओं के अनुसार चेतना का सातवाँ स्तर, आठवें स्तर में से निकल कर आता है | सातवीं चेतना का ध्यान हमेशा व्यक्ति की आठवीं चेतना पर ही केद्रित रहता है और इस आठवी चेतना को ये एक ठहरी हुई, अपरिवर्तनीय, विशिष्ट और दूसरी अन्य चीजों से अलग मानती है | जबकि सच्चाई यह है कि आठवीं चेतना निरंतर रूप से बहती रहती है, गतिशील रहती है, याने इसमें हर क्षण बदलाव होता रहता है |
जन्म से लेकर मृत्यु तक के बीच हमारे सातों धरातल, इस आठवें धरातल से आपस में, निरंतर वार्तालाप करते रहते है और दोनों एक दूसरे पर अपना गहरा प्रभाव डालते हैं | इस तरह सातवीं चेतना हमारे 'स्वयं ' के एक ठहरे हुए, स्थिर, अपरिवर्तनीय होने का जो बोध करवाती है वो असत्य सिद्ध होता है |
चेतना का सातवाँ स्तर मृत्यु के भय का भी निवास स्थान है | यह चूंकि आठवी चेतना के मूल स्वभाव को नहीं पकड़ पाती जिसमें ऊर्जा का चिर स्थाई प्रवाह रहता है, सातवीं चेतना यह कल्पना कर बैठती है कि मृत्यु होने पर आठवीं चेतना भी सदा के लिए समाप्त हो जाएगी | इसलिए मृत्यु का भय अवचेतन की इन्हीं गहरी परतों में निहित है |
यह भी भ्रम है कि आठवीं चेतना हमारा असली रूप है, यह एक मूलभूत अज्ञानता है, जो समस्त अस्तित्वों के आपस में एक दूसरे से जुड़े होने वाले सत्य से हमें दूर ले जाती है | व्यक्ति का यही भाव कि वो दूसरों से अलग है, भिन्न है, कि वो सिर्फ वो है और दूसरे दूसरे हैं, यही भाव है जो भेदभाव को जन्म देता है, विध्वंसक अहंकार और बेलगाम लालसा को जन्म देता है |
बौद्ध मार्ग के अनुसार हमारे विचार, बोले गए शब्द और किए गए क्रिया कलाप हमारी आठवी चेतना पर निश्चित रूप से छप जाते हैं | जिन्हें बौद्ध मार्गी 'कर्म ' कहते हैं | इसलिए आठवीं चेतना को कर्मों का संचय भवन भी कहते हैं - वो स्थान जहां ये सारे कर्म, बीज रूप में पड़े रहते हैं | ये सारे बीज या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ी हुई ऊर्जा धनात्मक या ऋणात्मक कैसी भी हो सकती है, या यूं कहें कि ये बीज अच्छे या बुरे किसी भी तरह के हो सकते हैं |
चेतना का आठवाँ स्तर स्वयं तटस्थ रहकर इन दोनों तरह के कर्मों को अपने धरातल पर आने देता है | ये सारे बीज अपनी उपयुक्त परिस्थितियां मिलते ही प्रस्फुटित हो कर जीवन में प्रकट हो जाते है | धनात्मक अप्रत्यक्ष बीज रूपी ऊर्जा जीवन में धनात्मक घटनाएं और घनात्मक गुणों जैसे विश्वास, अहिंसा , आत्म - संयम , करुणा और विवेक के रूप में उभर कर आती है | ऋणात्मक बीज रूपी ऊर्जा विभिन्न प्रकार के भ्रम और विध्वंसनात्मक व्यवहार को जन्म देती है और स्वयं तथा दूसरों के लिए दुःख का कारण बनती है |
हालांकि आठवी चेतना को जहां संचय भवन जैसा नाम देना कुछ हद तक बात को समझने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसे प्रचण्ड रूप से बहती हुई, कर्म - ऊर्जा की वेगधारा कहें तो चित्रण और अधिक सही होगा | यह ऊर्जा निरंतर रूप से गतिशील रहती है और हमारे जीवन तथा उनके अनुभवों को आकार देती रहती है |इस तरह हमारे जीवन पथ में कुल मिला कर सोचे गए विचार, बोले गए शब्द और किए गए कृत्य पुनः इस कर्म - ऊर्जा की वेगधारा में संचित हो जाते हैं | इस तरह कर्म के वेगधारा की गुणवत्ता, हर व्यक्ति में अपने अपने द्वारा किए गए अच्छे -बुरे कर्मों के अनुसार अलग अलग होती है और यही गुणवत्ता हर व्यक्ति को दूसरों से पृथक बनाती है - उनके अपने विशिष्ट 'मैं ' का निर्माण करती है |
इस वेगधारा में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं, परन्तु एक नदी की तरह यह अपनी पहचान बनाए रखती है और निरंतर जन्म और मृत्यु के, एक के बाद एक आने वाले हर चक्र में भी बनाए रखती है | इसी धारा प्रवाह के रूप में चलने वाली तरलता के गुण, सदैव स्थिर नहीं रहने वाले गुण के कारण ही आठवी चेतना में जो कुछ भी समाया हुआ है, उसे बदल सकने की संभावना को जन्म मिलता है |
जीवन में सब कुछ शुभ - अशुभ घटता है, तब अक्सर लोग हताश हो कर कह देते हैं - यह तो हमारे कर्म हैं, भुगतने पड़ेंगे , लेकिन अगर बिल्कुल ठीक तरह से समझ लिया जाए तो पता चलेगा कि कर्मों का सही मतलब कोई तयशुदा भाग्य नहीं है जिसे कभी बदला नहीं जा सकता या इसे कभी टाला नहीं जा सकता | प्रश्न ये उठता है कि किस तरह हम धनात्मक कर्मों के खाते में बढ़ोतरी करें ? यही भाव विभिन्न प्रकार के बौद्ध अभ्यासों का आधार है जो हमारे जीवन में "धनात्मक कारण " रूपी कर्म बीज होने की प्रेरणा बनता है |
जब हम बुरा कर्म करते हैं तो ये अपने आप में एक कारण बनता है, जिसके प्रभाव स्वरूप हमारे जीवन में बुरे फल आते हैं, जब बुरे फल आते हैं तो मन खिन्न होता है, क्रोध, घृणा, उदासी , वैर , ईर्ष्या जैसे कई अन्य बुरे विचार उत्पन्न होते हैं, जो पुनः बीज बनकर जीवन की आठवी चेतना में चले जाते हैं | ये बुरे बीज भविष्य में सही वातावरण मिलने पर पुनः बुरे फल बनकर सामने आते हैं और इस तरह मनुष्य का बुराई के दुष्चक्र से निकल पाना अत्यंत कठिन हो जाता है |
इस स्थिति पर पंहुच कर हम आते है जीवन की आधारभूत चेतना के धरातल पर जिसे चेतना का नौवां स्तर कहते हैं | इसे नाम दिया गया है - अमाला चेतना | इसे ऐसा समझा जा सकता है कि समस्त ब्रह्मांड में जो जीवन व्याप्त है, वही हमारे भीतर नौवीं चेतना के रूप में विद्यमान है | इसे मूलभूत रूप से "पवित्र - चेतना " के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है | सभी तरह के कर्मों के क्रिया-कलापों की मलिनता से अनछुई रह कर ये चेतना हमारे सच्चे और अनंत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है | निचिरेन दाईशोनिन के बौद्ध मार्ग का ये एक क्रांतिकारी आयाम है कि इसमें सीधे नौवीं चेतना की ऊर्जा, जिसे - बुद्ध का पूर्ण जागृत स्वभाव भी कहते हैं, को उभारने की सुचेष्टा है, जो फिर चेतना की ऊपरी सतही परतों को विशुद्ध करती चली जाती है |
नौवीं चेतना से प्रस्फुटित होती हुई ये महान शक्ति, चेतना के आठवे स्तर पर आकर आकार ले चुके बुरे कर्मों की उबड़ - खाबड़ जमीन को ठीक कर देती है | चूँ कि आठवी चेतना व्यकिगत परिधी से आगे निकल कर अपने परिवार के लोगों में, अपने जाति समाज के समस्त लोगों में छुपी अदृश्य ऊर्जा के साथ एकाकार होने की क्षमता रखती है, इसलिए जब आठवीं चेतना के धरातल पर कर्म - ऊर्जा में धनात्मक परिवर्तन होता है, याने जब अच्छे कर्मों में वृद्धि होती है, तो एक व्यक्ति में आया ये शुभ परिवर्तन अपने परिवार, समाज, पशु -पक्षी , पेड़ -पौधों तक एक साथ धनात्मक प्रभाव उसी तरह उत्पन्न करता है, जैसे बहुत सारी घिर्रियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हों और अगर एक घिर्री घूमने लगे तो बाकी की घिर्रियाँ अपने आप घूमने लगती हैं |

जैसा कि सोका गक्काई के अध्यक्ष श्री दाईसाकु इकेदा ने एक जगह लिखा है - " जब हम इस मूलभूत विशुद्ध चेतना को क्रियाशील बना देते हैं तो हमारे जीवन के अच्छे और बुरे कर्मों की ऊर्जा, मूल्यों के सृजन की दिशा में घूम जाती हैं तथा मन या चेतना, करुणा और विवेक की धारा से एकाकार हो जाते हैं |" निचिरेन ने "नम्यो- हो-रेंगे -क्यो" ( यंहा "क्यों" नहीं है "क्यो" है ) के निरंतर उच्चारण पाठ को हमारे जीवन में निहित नौवीं चेतना को क्रियाशील बनाने के मूलभूत स्त्रोत के रूप में पहचाना है |
जैसे जैसे चेतना की परतों में रूपान्तरण होता है, एक विशेष प्रकार के विवेक का उदय होता है | आठवीं चेतना का विवेक, हमे स्वयं अपने आप को जानने, हमारे अनुभवों को तथा जीवन में होने वाली दूसरी घटनाओं को शत प्रतिशत स्पष्ट रूप से पहचानने की क्षमता प्रदान करता है तथा समस्त प्रकार के अस्तित्वों की आपस में एक दूसरे से जुड़े ताने बाने को गहरे तक समझ कर उसे सराहता है |
जब चेतना के सातवें स्तर पर गहरी जड़े जमाए भ्रम रूपांतरित हो जाते हैं, तो व्यक्ति मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है, साथ ही इस भय से पैदा होने वाली हिंसा और उत्तेजना जनित प्रहार करने की वृति भी समाप्त हो जाती है | एक विवेक जागृत होता है, जो समस्त प्राणियों को मूलरूप से समान समझने लगता है तथा पूरे आदर और सम्मान के साथ उनसे व्यवहार करता है और उसका ये व्यवहार कभी नहीं बदलता | यही वो रूपान्तरण और विवेक है, जिसकी आज विश्व को नितांत रूप से आवश्यकता है |
सोका गक्कई इंटरनेशनल
हिन्दी अनुवाद : के.बी.व्यास
The nine consciousnesses can be
thought of as different layers of consciousness which are constantly operating
together to create our lives. The Sanskrit word vijnāna, which is
translated as consciousness, includes a wide range of activities, including
sensation, cognition and conscious thought. The first five of these
consciousnesses are the familiar senses of sight, hearing, smell, taste and
touch. The sixth consciousness is the function that integrates and processes
the various sensory data to form an overall picture or thought, identifying
what it is that our five senses are communicating to us. It is primarily with
these six functions of life that we perform our daily activities.
बौद्ध शिक्षाओं में एक सूत्र आता है - "चेतना के नौं स्तर " जो हमें इस बात को विस्तार से समझने में सहायता प्रदान करता है कि हम कौन हैं और हमारा सत्य रूप क्या है ? यह सूत्र हमें इस बात को समझने में सहायता प्रदान करता है कि जन्म और मृत्यु से गुजरते हुए जीवन की अनन्तकाल चलने वाली निरंतरता को बौद्ध मार्ग किस तरह से देखता है | चेतना के स्वभाव में उसके भीतर उतर कर गहन रूप से उसकी जाँच पड़ताल करने के हजारों वर्षों के अथक प्रयासों का ही फल है कि मानव जीवन को इस तरह देखना संभव हो पाया है |

एतिहासिक रूप से आज से करीब २५०० वर्ष पहले बोधि वृक्ष के नीचे शाक्यमुनी को जो परम सत्य की प्राप्ति हुई थी, उसी परम सत्य के मूल स्वरूप को समझाने और अनुभव करने के प्रयासों में ही इस सूत्र की जड़े निहित हैं | चेतना के नौं स्तरों को चेतना की नौं परतों के रूप में देखा जा सकता है, जो हमारे जीवन का सृजन करने के लिए आपस में कार्यरत रहती हैं |
'चेतना' शब्द अपने आप में कई तरह के क्रिया कलापों को समेटे हुए है, जिसमे विभिन्न इन्द्रियों द्वारा हुआ बोध या अनुभव तथा जागृत अवस्था के विचार आदि शामिल हैं | इस चेतना के पहले पाँच स्तरों से हम भली भांति परिचित है | ये हैं - देखना, सूँघना, सुनना, चखना, और स्पर्श करना जो हम हमारी आँख, कान , नाक ,जीभ और त्वचा इन पाँचों विभिन्न इन्द्रियों की सहायता से करते हैं |
चेतना का छठा स्तर वो है जहां इन पाँचो इन्द्रियों से मिली सूचनाओं के आधार पर या तो किसी छवि का निर्माण होता है या कोई विचार आकार लेता है, जिससे ये पता चले कि हमारी पाँचो इन्द्रियाँ क्या कहना चाह रही हैं | इस छठे स्तर को हम मस्तिष्क कहते हैं |
सामान्यतः इस छह स्तरों पर हमारी दैनिक गतिविधियां चलती रहती हैं | इस छठी चेतना के नीचे एक सांतवी चेतना भी निवास करती है | बौद्ध ग्रंथो में जिसे मनो-चेतना का नाम दिया गया है | जहां एक ओर ऊपर की छह चेतनाएं मूलतः बाहरी जगत की ओर अभिमुख होती हैं वहीं दूसरी ओर सातवीं चेतना मौटे तौर पर विभिन्न इन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित ना होकर, स्वतंत्र रूप से जीवन की आंतरिक दिशा की ओर अभिमुख होती हैं |
सातवीं चेतना ही वो धरातल है जहां हमें हमारी व्यक्तिगत पहचान होने का आभास होता है, अपने 'मैं ' होने का अहसास होता है | जहां अपने आप से पैदा हुआ मोह स्वयं को दूसरों से अलग करता है और विशिष्ट होने का भाव उत्पन्न करता है और यही वो धरातल है जो यह तय करता है कि - हमारे व्यक्तिगत नजरिए से सही क्या है और गलत क्या है |
बौद्ध मार्ग के अनुसार इस सातवें स्तर के नीचे एक और गहरी परत विद्यमान है, जिसे चेतना का आठवाँ स्तर कहते हैं |बौद्ध मार्ग में इसका नाम है "आलय-चेतना " | इस चेतना का कभी क्षय नहीं होता और इसे हमारे कर्मों का संचय भवन भी कहते है | जहां हमारे कर्म, ऊर्जा के रूप में संचित हो कर निवास करते हैं | मृत्यु होने पर जहां पहली सात चेतनाएं लुप्त हो जाती हैं, वहीं आठवी चेतना तब भी अस्तित्व में रहती है और जन्म के लौकिक रूप तथा मृत्यु के अदृश्य काल के चक्र से होती हुई अक्षय रहती है | इसे जीवन धारा भी कहा जा सकता है, जो दूसरी अन्य चेतनाओं की गतिविधियों को चलाने में सहायक की भूमिका निभाती है |

जो लोग चिकित्सा जगत के अनुसार मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और फिर से जीवित हो उठते हैं, उनके अनुभव को सातवीं और आठवीं चेतना की सीमा रेखा पर घटी घटना कहा जा सकता है | चेतनाओं के इन विभिन्न धरातलों के बीच के आपसी क्रियाकलाप और इनकी समझ जीवन की प्रकृति और निज (स्वयं) को समझने में अति मूल्यवान दृष्टि प्रदान कर सकती है | साथ ही साथ मानवता आज जिन समस्याओं से जूझ रही है उनके समाधान भी इससे मिल सकते हैं |
बौद्ध शिक्षाओं के अनुसार सातवीं चेतना के स्तर पर अपने निज (स्वयं) की प्रकृति को लेकर, या यूं कहें कि जिसे 'मैं ' कहते है, उस 'मैं ' का असली रूप क्या है, इसे लेकर कुछ गहरे बैठी हुई भ्रातियाँ होती हैं | ये भ्रातियाँ चेतना के सातवें और आठवें स्तर के आपसी सम्बन्ध के फलस्वरूप जन्म लेती हैं और प्रारम्भिक अहंकार के रूप में प्रस्फुटित होती हैं |
बौद्ध शिक्षाओं के अनुसार चेतना का सातवाँ स्तर, आठवें स्तर में से निकल कर आता है | सातवीं चेतना का ध्यान हमेशा व्यक्ति की आठवीं चेतना पर ही केद्रित रहता है और इस आठवी चेतना को ये एक ठहरी हुई, अपरिवर्तनीय, विशिष्ट और दूसरी अन्य चीजों से अलग मानती है | जबकि सच्चाई यह है कि आठवीं चेतना निरंतर रूप से बहती रहती है, गतिशील रहती है, याने इसमें हर क्षण बदलाव होता रहता है |
जन्म से लेकर मृत्यु तक के बीच हमारे सातों धरातल, इस आठवें धरातल से आपस में, निरंतर वार्तालाप करते रहते है और दोनों एक दूसरे पर अपना गहरा प्रभाव डालते हैं | इस तरह सातवीं चेतना हमारे 'स्वयं ' के एक ठहरे हुए, स्थिर, अपरिवर्तनीय होने का जो बोध करवाती है वो असत्य सिद्ध होता है |
चेतना का सातवाँ स्तर मृत्यु के भय का भी निवास स्थान है | यह चूंकि आठवी चेतना के मूल स्वभाव को नहीं पकड़ पाती जिसमें ऊर्जा का चिर स्थाई प्रवाह रहता है, सातवीं चेतना यह कल्पना कर बैठती है कि मृत्यु होने पर आठवीं चेतना भी सदा के लिए समाप्त हो जाएगी | इसलिए मृत्यु का भय अवचेतन की इन्हीं गहरी परतों में निहित है |
यह भी भ्रम है कि आठवीं चेतना हमारा असली रूप है, यह एक मूलभूत अज्ञानता है, जो समस्त अस्तित्वों के आपस में एक दूसरे से जुड़े होने वाले सत्य से हमें दूर ले जाती है | व्यक्ति का यही भाव कि वो दूसरों से अलग है, भिन्न है, कि वो सिर्फ वो है और दूसरे दूसरे हैं, यही भाव है जो भेदभाव को जन्म देता है, विध्वंसक अहंकार और बेलगाम लालसा को जन्म देता है |
बौद्ध मार्ग के अनुसार हमारे विचार, बोले गए शब्द और किए गए क्रिया कलाप हमारी आठवी चेतना पर निश्चित रूप से छप जाते हैं | जिन्हें बौद्ध मार्गी 'कर्म ' कहते हैं | इसलिए आठवीं चेतना को कर्मों का संचय भवन भी कहते हैं - वो स्थान जहां ये सारे कर्म, बीज रूप में पड़े रहते हैं | ये सारे बीज या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ी हुई ऊर्जा धनात्मक या ऋणात्मक कैसी भी हो सकती है, या यूं कहें कि ये बीज अच्छे या बुरे किसी भी तरह के हो सकते हैं |
चेतना का आठवाँ स्तर स्वयं तटस्थ रहकर इन दोनों तरह के कर्मों को अपने धरातल पर आने देता है | ये सारे बीज अपनी उपयुक्त परिस्थितियां मिलते ही प्रस्फुटित हो कर जीवन में प्रकट हो जाते है | धनात्मक अप्रत्यक्ष बीज रूपी ऊर्जा जीवन में धनात्मक घटनाएं और घनात्मक गुणों जैसे विश्वास, अहिंसा , आत्म - संयम , करुणा और विवेक के रूप में उभर कर आती है | ऋणात्मक बीज रूपी ऊर्जा विभिन्न प्रकार के भ्रम और विध्वंसनात्मक व्यवहार को जन्म देती है और स्वयं तथा दूसरों के लिए दुःख का कारण बनती है |
हालांकि आठवी चेतना को जहां संचय भवन जैसा नाम देना कुछ हद तक बात को समझने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसे प्रचण्ड रूप से बहती हुई, कर्म - ऊर्जा की वेगधारा कहें तो चित्रण और अधिक सही होगा | यह ऊर्जा निरंतर रूप से गतिशील रहती है और हमारे जीवन तथा उनके अनुभवों को आकार देती रहती है |इस तरह हमारे जीवन पथ में कुल मिला कर सोचे गए विचार, बोले गए शब्द और किए गए कृत्य पुनः इस कर्म - ऊर्जा की वेगधारा में संचित हो जाते हैं | इस तरह कर्म के वेगधारा की गुणवत्ता, हर व्यक्ति में अपने अपने द्वारा किए गए अच्छे -बुरे कर्मों के अनुसार अलग अलग होती है और यही गुणवत्ता हर व्यक्ति को दूसरों से पृथक बनाती है - उनके अपने विशिष्ट 'मैं ' का निर्माण करती है |
इस वेगधारा में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं, परन्तु एक नदी की तरह यह अपनी पहचान बनाए रखती है और निरंतर जन्म और मृत्यु के, एक के बाद एक आने वाले हर चक्र में भी बनाए रखती है | इसी धारा प्रवाह के रूप में चलने वाली तरलता के गुण, सदैव स्थिर नहीं रहने वाले गुण के कारण ही आठवी चेतना में जो कुछ भी समाया हुआ है, उसे बदल सकने की संभावना को जन्म मिलता है |
जीवन में सब कुछ शुभ - अशुभ घटता है, तब अक्सर लोग हताश हो कर कह देते हैं - यह तो हमारे कर्म हैं, भुगतने पड़ेंगे , लेकिन अगर बिल्कुल ठीक तरह से समझ लिया जाए तो पता चलेगा कि कर्मों का सही मतलब कोई तयशुदा भाग्य नहीं है जिसे कभी बदला नहीं जा सकता या इसे कभी टाला नहीं जा सकता | प्रश्न ये उठता है कि किस तरह हम धनात्मक कर्मों के खाते में बढ़ोतरी करें ? यही भाव विभिन्न प्रकार के बौद्ध अभ्यासों का आधार है जो हमारे जीवन में "धनात्मक कारण " रूपी कर्म बीज होने की प्रेरणा बनता है |
जब हम बुरा कर्म करते हैं तो ये अपने आप में एक कारण बनता है, जिसके प्रभाव स्वरूप हमारे जीवन में बुरे फल आते हैं, जब बुरे फल आते हैं तो मन खिन्न होता है, क्रोध, घृणा, उदासी , वैर , ईर्ष्या जैसे कई अन्य बुरे विचार उत्पन्न होते हैं, जो पुनः बीज बनकर जीवन की आठवी चेतना में चले जाते हैं | ये बुरे बीज भविष्य में सही वातावरण मिलने पर पुनः बुरे फल बनकर सामने आते हैं और इस तरह मनुष्य का बुराई के दुष्चक्र से निकल पाना अत्यंत कठिन हो जाता है |
इस स्थिति पर पंहुच कर हम आते है जीवन की आधारभूत चेतना के धरातल पर जिसे चेतना का नौवां स्तर कहते हैं | इसे नाम दिया गया है - अमाला चेतना | इसे ऐसा समझा जा सकता है कि समस्त ब्रह्मांड में जो जीवन व्याप्त है, वही हमारे भीतर नौवीं चेतना के रूप में विद्यमान है | इसे मूलभूत रूप से "पवित्र - चेतना " के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है | सभी तरह के कर्मों के क्रिया-कलापों की मलिनता से अनछुई रह कर ये चेतना हमारे सच्चे और अनंत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है | निचिरेन दाईशोनिन के बौद्ध मार्ग का ये एक क्रांतिकारी आयाम है कि इसमें सीधे नौवीं चेतना की ऊर्जा, जिसे - बुद्ध का पूर्ण जागृत स्वभाव भी कहते हैं, को उभारने की सुचेष्टा है, जो फिर चेतना की ऊपरी सतही परतों को विशुद्ध करती चली जाती है |
नौवीं चेतना से प्रस्फुटित होती हुई ये महान शक्ति, चेतना के आठवे स्तर पर आकर आकार ले चुके बुरे कर्मों की उबड़ - खाबड़ जमीन को ठीक कर देती है | चूँ कि आठवी चेतना व्यकिगत परिधी से आगे निकल कर अपने परिवार के लोगों में, अपने जाति समाज के समस्त लोगों में छुपी अदृश्य ऊर्जा के साथ एकाकार होने की क्षमता रखती है, इसलिए जब आठवीं चेतना के धरातल पर कर्म - ऊर्जा में धनात्मक परिवर्तन होता है, याने जब अच्छे कर्मों में वृद्धि होती है, तो एक व्यक्ति में आया ये शुभ परिवर्तन अपने परिवार, समाज, पशु -पक्षी , पेड़ -पौधों तक एक साथ धनात्मक प्रभाव उसी तरह उत्पन्न करता है, जैसे बहुत सारी घिर्रियाँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हों और अगर एक घिर्री घूमने लगे तो बाकी की घिर्रियाँ अपने आप घूमने लगती हैं |

जैसा कि सोका गक्काई के अध्यक्ष श्री दाईसाकु इकेदा ने एक जगह लिखा है - " जब हम इस मूलभूत विशुद्ध चेतना को क्रियाशील बना देते हैं तो हमारे जीवन के अच्छे और बुरे कर्मों की ऊर्जा, मूल्यों के सृजन की दिशा में घूम जाती हैं तथा मन या चेतना, करुणा और विवेक की धारा से एकाकार हो जाते हैं |" निचिरेन ने "नम्यो- हो-रेंगे -क्यो" ( यंहा "क्यों" नहीं है "क्यो" है ) के निरंतर उच्चारण पाठ को हमारे जीवन में निहित नौवीं चेतना को क्रियाशील बनाने के मूलभूत स्त्रोत के रूप में पहचाना है |
जैसे जैसे चेतना की परतों में रूपान्तरण होता है, एक विशेष प्रकार के विवेक का उदय होता है | आठवीं चेतना का विवेक, हमे स्वयं अपने आप को जानने, हमारे अनुभवों को तथा जीवन में होने वाली दूसरी घटनाओं को शत प्रतिशत स्पष्ट रूप से पहचानने की क्षमता प्रदान करता है तथा समस्त प्रकार के अस्तित्वों की आपस में एक दूसरे से जुड़े ताने बाने को गहरे तक समझ कर उसे सराहता है |
जब चेतना के सातवें स्तर पर गहरी जड़े जमाए भ्रम रूपांतरित हो जाते हैं, तो व्यक्ति मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है, साथ ही इस भय से पैदा होने वाली हिंसा और उत्तेजना जनित प्रहार करने की वृति भी समाप्त हो जाती है | एक विवेक जागृत होता है, जो समस्त प्राणियों को मूलरूप से समान समझने लगता है तथा पूरे आदर और सम्मान के साथ उनसे व्यवहार करता है और उसका ये व्यवहार कभी नहीं बदलता | यही वो रूपान्तरण और विवेक है, जिसकी आज विश्व को नितांत रूप से आवश्यकता है |
सोका गक्कई इंटरनेशनल
हिन्दी अनुवाद : के.बी.व्यास
The Nine Consciousnesses
The Buddhist teaching of the nine
consciousnesses offers the basis for a comprehensive understanding of who we
are, our true identity. It also helps explain how Buddhism sees the eternal
continuity of our lives over cycles of birth and death. This perspective on the
human being is the fruit of thousands of years of intense introspective
investigation into the nature of consciousness. Historically, it is grounded in
efforts to experience and explain the essence of Shakyamuni’s enlightenment
beneath the bodhi tree some 2,500 years ago.
The nine consciousnesses can be
thought of as different layers of consciousness which are constantly operating
together to create our lives. The Sanskrit word vijnāna, which is
translated as consciousness, includes a wide range of activities, including
sensation, cognition and conscious thought. The first five of these
consciousnesses are the familiar senses of sight, hearing, smell, taste and
touch. The sixth consciousness is the function that integrates and processes
the various sensory data to form an overall picture or thought, identifying
what it is that our five senses are communicating to us. It is primarily with
these six functions of life that we perform our daily activities.
Below this level of
consciousness is the seventh consciousness. Unlike those layers of
consciousness that are directed toward the outer world, the seventh
consciousness is directed toward our inner life and is largely independent of
sensory input. The seventh consciousness is the basis for our sense of
individual identity; attachment to a self distinct to and separate from others
has its basis in this consciousness, as does our sense of right and wrong.
Below the seventh consciousness,
Buddhism elucidates a deeper layer, the eighth or ālaya consciousness,
also known as the never-perishing or storehouse consciousness. It is here that
the energy of our karma resides. Whereas the first seven consciousnesses
disappear on death, the eighth consciousness persists through the cycles of
active life and the latency of death. It can be thought of as the life-flow
that supports the activities of the other consciousnesses. The experiences
described by those who have undergone clinical death and been revived could be
said to be occurrences at the borderline of the seventh and eighth
consciousnesses.
An understanding of these levels of
consciousness and the interaction between them can offer valuable insights into
the nature of life and the self, as well as pointing to the resolution of the
fundamental problems that humanity confronts.
related ar.According to Buddhist
teachings, there are specific deep-seated delusions in the seventh
consciousness regarding the nature of self. These delusions arise from the
relationship between the seventh and eighth levels of consciousness and
manifest as fundamental egotism.
Buddhist teachings describe the seventh
layer as emerging from the eighth consciousness: it is always focused on the
eighth consciousness of the individual, which it perceives as something fixed,
unique and isolated from other things. In reality, the eighth consciousness is
in a state of continual flux. At this level our lives constantly interact,
exerting a profound influence on each other. The perception of a fixed and
isolated self that the seventh consciousness generates is thus false.
The seventh consciousness
is also the seat of the fear of death. Being unable to perceive the true nature
of the eighth consciousness as an enduring flow of life energy, it imagines
that upon death, the eighth consciousness will become permanently extinct. Fear
of death thus has roots in the deep layers of the subconscious.
The delusion that the eighth
consciousness is one’s true self is also termed fundamental ignorance, a turning
away from the interconnectedness of all being. It is this sense of one’s self
as separate and isolated from others that gives rise to discrimination, to
destructive arrogance and unbridled acquisitiveness. Humanity’s ravaging of the
natural environment is another obvious result.
Buddhism posits that our thoughts, words and deeds invariably
create an imprint in the deep layers of the eighth consciousness. This is what
Buddhists refer to as karma. The eighth consciousness is therefore sometimes referred
to as the karmic storehouse—the place where these karmic seeds are stored.
These seeds or latent energy can be either positive or negative; the eighth
consciousness remains neutral and equally receptive to either type of karmic
imprinting. The energy becomes manifest when conditions are ripe. Positive
latent causes can become manifest as both positive effects in one’s life and as
positive psychological functions such as trust, nonviolence, self-control,
compassion and wisdom. Negative latent causes can manifest as various forms of
delusion and destructive behavior and give rise to suffering for ourselves and
others.
While the image of a storehouse is helpful, a truer image may be that of
a raging torrent of karmic energy. This energy is constantly moving through and
shaping our lives and experience. Our resultant thoughts and actions are then
fed back into this karmic flow. The quality of the karmic flow is what makes
each of us distinct beings—our unique selves. The flow of energy is constantly
changing, but, like a river, it maintains an identity and consistency even
through successive cycles of life and death. It is this aspect of fluidity,
this lack of fixity, that opens the possibility of transforming the content of
the eighth consciousness. This is why karma, properly understood, is different
from an unchanging or unavoidable destiny.
The question, therefore, is how
we increase the balance of positive karma. This is the basis for various forms
of Buddhist practice that seek to imprint positive causes in our lives. When
caught up in a cycle of negative cause and effect, however, it is difficult to
avoid making further negative causes, and it is here that we turn to the most
fundamental layer of consciousness, the ninth or amala consciousness.

This can be thought of
as the life of the cosmos itself; it is also referred to as the fundamentally
pure consciousness. Unstained by the workings of karma, this consciousness
represents our true, eternal self. The revolutionary aspect of Nichiren
Buddhism is that it seeks to directly bring forth the energy of this
consciousness—the enlightened nature of the Buddha—thus purifying the other,
more superficial layers of consciousness. The great power of the ninth consciousness
welling forth changes even entrenched patterns of negative karma in the eighth
consciousness.
Because the eighth
consciousness transcends the boundaries of the individual, merging with the
latent energy of one’s family, one’s ethnic group, and also with that of
animals and plants, a positive change in this karmic energy becomes a
“cogwheel” for change in the lives of others. As SGI President Daisaku Ikeda
writes, “When we activate this fundamentally pure consciousness, the energy of
all life’s good and evil karma is directed toward value creation; and the mind
or consciousness...of humankind is infused with the life current of compassion
and wisdom.” Nichiren identified the practice of chanting the phrase
Nam-myoho-renge-kyo as the basic means for activating the ninth consciousness
in our lives.
As the layers of consciousness are
transformed, they each give rise to unique forms of wisdom. The wisdom inherent
in the eighth consciousness allows us to perceive ourselves, our experience and
other phenomena with perfect clarity and to profoundly appreciate the
interconnectedness and interdependence of all things. As the deep-rooted
delusions of the seventh consciousness are transformed, an individual is
enabled to overcome the fear of death, as well as the aggression and violence
that spring from this fear. A wisdom arises which enables us to perceive the
fundamental equality of all living beings and to deal with them on an unchanging
basis of respect. It is this type of transformation and wisdom that is sorely
required in our world today.
Soka Gakkai International
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