गुरु - शिष्य
हर गुरु पहले शिष्य है | जब तक
वो खरा शिष्य नहीं बनता वो गुरु नहीं बन सकता | माँ इस जन्म की पहली गुरु होती है
और पिता दूसरे गुरु | हर जन्म में माँ और बाप बदल जाते है लेकिन गुरु वही रहता है
| यह जानने का प्रयास अगर हम करें कि गुरु किसका शिष्य है तो ? तो गुरु और शिष्य
अपना रोल बदल सकते हैं | जो इस जन्म में गुरु है, हो सकता है वो अगले जन्म में शिष्य
हो, या पिछले जन्म में शिष्य था और इस जन्म में गुरु है | गुरु-शिष्य एक होते है |

एक गुरु के एक शिष्य, दो शिष्य , चार
छह शिष्य , सौ दो सौ शिष्य , हजार शिष्य, लाखों करोड़ों शिष्य, अनगिनत शिष्य, अथाह शिष्य
हो सकते हैं | जैसे एक स्कूल के गुरु के सैकड़ों शिष्य होते हैं | वैसे ही जीवन के एक
गुरु के हजारों, लाखों, करोड़ों शिष्य हो सकते हैं | पूरा ब्रह्मांड भरा पड़ा है कई करोड़ों
गुरुओं से तथा अनगिनत शिष्यों से | शिष्यों
की संख्या ज्यादा होती है जो आगे चलकर गुरु के पद पर पंहुचते हैं | हमें जीवन दर्शन
सीखना हो तो पहले शिष्य बनना चाहिये, समर्पित शिष्य |
के.बी.व्यास
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