भव्यता
जब आंतरिक धरातल पर जीवन उठाव लेता है - भव्यता आने लगती है | परन्तु एक मोड़ पर आकर मन इस भव्यता की ओर मुड़ने लगता है और वहीं से भव्यता पुनः कम होने लगती है | इसी के बीच इंसान झूलता रहता है | वह मनुष्य उत्कृष्ट है जो भव्यता को साधन बना लेता है, साध्य नहीं | उसे पता है कि इस भव्यता में बदलाव आने वाला है, इसलिए उसका विवेक समझाता है कि ये तो नश्वर है इसलिए जीवन के आंतरिक उठाव की ओर मन को मोड़ ले , भव्यता की ओर नहीं मोड़े | फिर भव्यता केवल साधन बन जाती है, और मूल रूप से उसे जीवन का उठाव लेने में ही मानव को आनंद आता है | एक मोड़ पर आकर वो उस कक्षा में (आर्बिट में) चक्कर लगाने लगता है जो जीवन का उठाव लेने के लिए प्रतिपल जागरूक रहता है | निरंतर जीवन का उठाव तथा उसके साथ ही औरों के जीवन का भी उठाव, यह यात्रा अनंत है |


अब ऐसा युग आ गया है जब गृहस्थी वाले संत आएँगे | अब भगवा पहन कर आने वाले संतो का समय चला गया | क्यों कि अब पाप ने भी वही चोगा पहन लिया जो कि पुण्य ने पहना हुआ था, तो ऐसे लोगों को तकलीफ होती है | पाप करने वाले ने भी दाढ़ी बढ़ा ली, गेरुवे वस्त्र पहन लिए और वो भी संतो जैसा दिखने लगा | ये कलयुग है | इसलिए संत भी सांसारिक होंगे और अपना काम करते चले जाएंगे | वे भी रात दिन वो ही काम करेंगे जो सभी करते हैं, मगर उनका हृदय धर्म में डूबा हुआ होगा | वे कीचड़ में कमल की भांति खिले रहेंगे और दूसरों को प्रेरित करते रहेंगे | इस तरह से वे समाज में रह कर अपना काम पूरा करेंगे और चले जाएंगे, फिर आएँगे और फिर चले जाएंगे | हर बार अलग अलग रूप में आएँगे और चले जाएंगे, लेकिन उनकी कक्षा (आर्बिट) वही रहेगी जिसकी हम पहले बात कर चुके हैं |इस सारी प्रक्रिया में भव्यता मात्र एक साधन हुआ करती है |

भले ही पाप चालाकी से दुनिया की नजरों में धूल झोंक रहा है, मगर उसे ये नहीं पता कि मृत्यु का क्षण जब आएगा वो उनमें धूल नहीं झोंक सकता | यह सत्य है | इसलिए सांसारिक द्रष्टिकोण से पाप और पुण्य का खेल चलता रहता है और अगर हम चाहें कि पाप अंत में पुण्य की राह पर आए तो हमें अपने जीवन में हर मोड़ पर पुण्य कार्य करने होंगे | अंत में जीत पुण्य की होती है और भव्यता इसमें साधन बन जाती है |
के.बी.व्यास
(आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए )

भले ही पाप चालाकी से दुनिया की नजरों में धूल झोंक रहा है, मगर उसे ये नहीं पता कि मृत्यु का क्षण जब आएगा वो उनमें धूल नहीं झोंक सकता | यह सत्य है | इसलिए सांसारिक द्रष्टिकोण से पाप और पुण्य का खेल चलता रहता है और अगर हम चाहें कि पाप अंत में पुण्य की राह पर आए तो हमें अपने जीवन में हर मोड़ पर पुण्य कार्य करने होंगे | अंत में जीत पुण्य की होती है और भव्यता इसमें साधन बन जाती है |
के.बी.व्यास
No comments:
Post a Comment