Saturday, 2 July 2016

आत्म विजय
सुना है क्रोध करना पाप है , लेकिन उस वक्त पाप है जब क्रोध हृदय से हो रहा हो तब | मनुष्य में दो तरह की धाराएं बहती रहती हैं | एक धनात्मक और एक ऋणात्मक | घृणा, द्वेष, वैर आदि ऋणात्मक भाव हैं और प्रेम, स्नेह ,दया ,करुणा, अपनापन आदि धनात्मक भाव है | लेकिन क्रोध को हम क्या कहेंगे ? धनात्मक या ऋणात्मक ? क्रोध धनात्मक भी है और ऋणात्मक भी | 
                                                        
हम इसे यूं समझें कि हम किसी को सुधारना चाहते है, तो हम जरूरत पड़ने पर विवेक से क्रोधित होते हैं | एक बार, दो बार या हो सकता है हम तीन बार क्रोध करें, मगर बार बार क्रोध न करें | बार बार क्रोध करने से हमारा अपना चित्त दूषित होता है | कोई अगर तीन बार क्रोध करने के उपरान्त वही कार्य करता जा रहा हो तो उसके बारे में प्रार्थना करना और निरंतर सजग रह कर प्रोत्साहन देना कारगर होता है | प्रोत्साहन देना अपने आप में एक सार्थक सम्पदा है, जो व्यक्ति पूरे होश में देता है | 
                                                    

वैसे क्रोध करना किसी को उचित न लगे मगर प्रोत्साहित करते हुए बाहरी धरातल पर क्रोध करना और वो भी दो या तीन बार करना उचित है | आंतरिक क्रोध बिलकुल नहीं होना चाहिए | अंदर क्रोध नहीं उपजना चाहिए | हृदय के भीतर क्रोध नहीं उपजना चाहिए | इस बात का सही सही पता या तो आप लगा सकते हैं या वो व्यक्ति लगा सकता है जो आपसे हृदय के तल पर जुड़ा हो | 
जो आंतरिक क्रोध नहीं करता वह सर्वोत्तम है,क्योकि वह 
बाहरी स्तर पर क्रोध करके नसें नहीं फुलाता, वह आँखे लाल नहीं करता, वो अनाप शनाप नहीं बोलता | हाँ वो फ्रस्टेट हो जाता है, उसके दिल में गजब की उथल पुथल हो रही होती है, मगर ऐसे में वो क्रोध को चेनेलाइजेशन करता है और उसे दिशा देता है, और वो बहुत ही दृढ़ होता है | 
                                                            

वो बहुत ही गौर से तथा अत्यंत गम्भीरता से मामले की तह तक पहुंचता है अंत में उसका निपटारा कर के ही बाहर आता है | इसके अलावा निरंतर क्रोध करने वाले का गलत असर पड़ सकता है, केवल क्रोध करना, बहुत जोर जोर से बोलना, कुछ ख्याल ही ना रहे ऐसा कुछ कह देना, बोलने के बाद सामान्य आने में असामान्य वक्त लग जाना, और मूल बात कि जिस पर क्रोध आ रहा है उसका बुरा सोच लेना, इस तरह का क्रोध कतई नहीं होना चाहिए | यह आसुरी वृत्ति है और हमें सुर में रहना है |
इसलिए क्रोध में एक कदम तो आगे बढ़ाया जाता है मगर दूसरा कदम अभी मुक्त होता है | विवेकशील व्यक्ति इस दूसरे कदम को क्रोध के चेनेलाईजेशन में लगाते हैं | इसलिए क्रोध को धनात्मक और ऋणात्मक दोनों कहा गया है |
                                                  
अब यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वो इसका किस तरह से उपयोग करता है | जितने ज्यादा पेचीदे मामले जिंदगी में आएं उतना बेहतर है, क्यों कि जीवन का उठाव भी उतना ही होगा | जितनी अबूझ पहेली उतना जीवन का विस्तार | तभी जीवन का असली रंग सामने आता है, फिर इसके तारों में हम ढूँढ पाते हैं कि इसके सुर कहाँ है और इसका संगीत कैसा है ? इसका ओर कहाँ है और इसका छोर कहाँ है ? सब कुछ स्पष्ट हो जाता है | कुछ भी अन्जाना नहीं रहता और तब सारी कायनात हमें बहुत सुंदर लगने लगती है | यही आत्म विजय है |

के.बी.व्यास 

 (आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा  और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए ) 

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