Thursday, 23 June 2016

मित्रता की ताकत

                   आकाश अपनी ऊँचाईयों को देख कर कहता है कि जो इससे भी ऊपर जाए वो मित्रता है | कोई शायर कहता है कि ये दुनिया का सबसे खूबसूरत और हसीन जस्बा है | माली कहता है मित्रता मेरे बगीचे का वो बेशकीमती फूल है जिसकी खुशबू दूर दूर तक फेल जाती है | मगर मित्रता में ऐसी क्या चीज है किसी से हो तो हो और नहीं हो तो नहीं हो |
                                       
                    वैज्ञानिक कहते हैं कि मित्रों का डी.एन.ऐ. बहुत हद तक मेल खाता है | परामनोवैज्ञानिक कहते हैं यह पिछले जन्मों में बोया हुआ बीज है | हमारे बचपन में सभी से हमारी मित्रता होती है, मगर जैसे जैसे हम बड़े होते है हमारी मित्रता कम होती जाती है और दुश्मनी  बढ़ने लगती है | जीवन के अंतिम सौपान तक आते आते हमारी मित्रता २-४ लोगों से ही होती है मगर हम देखें तो दुश्मनी अक्सर कई लोगों के साथ हो चुकी होती है |
                                  ये स्थिती पलट सकती है | हमारे चारों ओर मित्र ही मित्र पैदा करने हों तो हमें सबसे पहले अपने आप से मित्रता करनी चाहिए , फिर अपने माँ बाप से और परिवार से फिर आगे बाक़ी के समाज से | जो सही रूप में इस तरह से मित्रता कर लेता है वो मनुष्य बन जाता है |
                             असल में मित्रता अपने अंदर से उपजती है, भीतर से उपजती है, अंतर्मन से उपजती है और अगर भीतर से ही उपजे तो क्यों ना सभी के लिए उपजे ? जैसा मनुष्य का भीतरी आयाम होता है वैसा ही उसका बाहरी आयाम हो जाता है |
                         कुछ लोग हमसे बिलकुल उल्टे होते हैं यह बात सही है | हम पूरब की बात करें तो वो पश्चिम की बात करते हैं, हम उत्तर की बात करें तो वो दक्षिण की बात करने लग जाते हैं | 
                                                          
                    लेकिन हमें ये सोचना चाहिए कि ऐसे इंसान से तो मित्रता करना सबसे महत्वपूर्ण होगा | विपरीत दिशाओं में जब दो इंसान चलते हैं तो धरती पर एक जगह आकर मिल जाते हैं और मिलने से पहले वे एक दूसरे की तरफ आने लगते हैं | विपरीत दिशा में जाने वाले सबसे करीब होते हैं |  ये विपरीत जाने का और पुनः एक दूसरे के करीब आने का सिलसिला धरती पर आश्चर्य चकित कर देने वाला है |
                     इसलिए जब हम विपरीत होते हैं तो विवेक से काम लें | विवेक सब चीजों को सुलझा सकता है | विवेक अंतर्मन से बाहर आने वाली मित्रता का पोषण करता है | अगर हम विवेक से काम नहीं लें तो जब विपरीत जा रहे होते हैं तो दुश्मनी और जब पास आ रहे होते हैं तो मित्रता | हम इसी मित्रता और दुश्मनी के बीच हिलोरें जन्म जन्मान्तरों तक लेते रहते हैं | यदि विवेक से काम लें तो जन्म जन्मान्तरों तक हम केवल और केवल मित्रता से काम लेते हैं | यह विवेक का सर्वोत्तम उपहार है | इसलिए अगर विपरीत दिशा में कोई जा रहा है तो विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए |
                                 मित्रता प्रतिदिन हो सकती है | हर रोज हम नए लोगों से मिलते हैं जो सभी हमारे मित्र हो सकते हैं | अपना विवेक जागृत कर हम शुभकामना का आदान प्रदान तो कर ही सकते हैं | हम अगर गहराई से सोचें तो पाएंगे कि जगत सिर्फ मित्रों से ही भरा हुआ है |

                                     

के.बी.व्यास 

 (आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा  और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए ) 

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