मित्रता की ताकत
आकाश अपनी ऊँचाईयों को देख कर
कहता है कि जो इससे भी ऊपर जाए वो मित्रता है | कोई शायर कहता है कि ये दुनिया का सबसे
खूबसूरत और हसीन जस्बा है | माली कहता है मित्रता मेरे बगीचे का वो बेशकीमती फूल है
जिसकी खुशबू दूर दूर तक फेल जाती है | मगर मित्रता में ऐसी क्या चीज है किसी से हो
तो हो और नहीं हो तो नहीं हो |

वैज्ञानिक कहते हैं कि मित्रों
का डी.एन.ऐ. बहुत हद तक मेल खाता है | परामनोवैज्ञानिक कहते हैं यह पिछले जन्मों में
बोया हुआ बीज है | हमारे बचपन में सभी से हमारी मित्रता होती है, मगर जैसे जैसे हम
बड़े होते है हमारी मित्रता कम होती जाती है और दुश्मनी बढ़ने लगती है | जीवन के अंतिम सौपान तक आते आते हमारी
मित्रता २-४ लोगों से ही होती है मगर हम देखें तो दुश्मनी अक्सर कई लोगों के साथ हो
चुकी होती है |
ये स्थिती पलट सकती है
| हमारे चारों ओर मित्र ही मित्र पैदा करने हों तो हमें सबसे पहले अपने आप से मित्रता करनी चाहिए , फिर अपने माँ बाप से और परिवार से फिर आगे बाक़ी के समाज से | जो सही रूप
में इस तरह से मित्रता कर लेता है वो मनुष्य बन जाता है |
असल में मित्रता अपने अंदर
से उपजती है, भीतर से उपजती है, अंतर्मन से उपजती है और अगर भीतर से ही उपजे तो क्यों
ना सभी के लिए उपजे ? जैसा मनुष्य का भीतरी आयाम होता है वैसा ही उसका बाहरी आयाम हो
जाता है |
कुछ लोग हमसे बिलकुल उल्टे होते
हैं यह बात सही है | हम पूरब की बात करें तो वो पश्चिम की बात करते हैं, हम उत्तर की
बात करें तो वो दक्षिण की बात करने लग जाते हैं |

लेकिन हमें ये सोचना चाहिए कि ऐसे
इंसान से तो मित्रता करना सबसे महत्वपूर्ण होगा | विपरीत दिशाओं में जब दो इंसान चलते
हैं तो धरती पर एक जगह आकर मिल जाते हैं और मिलने से पहले वे एक दूसरे की तरफ आने
लगते हैं | विपरीत दिशा में जाने वाले सबसे करीब होते हैं | ये विपरीत जाने का और पुनः एक दूसरे के करीब आने
का सिलसिला धरती पर आश्चर्य चकित कर देने वाला है |
इसलिए जब हम विपरीत होते हैं तो – विवेक से काम लें | विवेक सब चीजों को सुलझा सकता है | विवेक अंतर्मन
से बाहर आने वाली मित्रता का पोषण करता है | अगर हम विवेक से काम नहीं लें तो जब विपरीत
जा रहे होते हैं तो दुश्मनी और जब पास आ रहे होते हैं तो मित्रता | हम इसी मित्रता
और दुश्मनी के बीच हिलोरें जन्म जन्मान्तरों तक लेते रहते हैं | यदि विवेक से काम लें
तो जन्म जन्मान्तरों तक हम केवल और केवल मित्रता से काम लेते हैं | यह विवेक का सर्वोत्तम
उपहार है | इसलिए अगर विपरीत दिशा में कोई जा रहा है तो विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए |
मित्रता प्रतिदिन हो सकती है | हर रोज हम
नए लोगों से मिलते हैं जो सभी हमारे मित्र हो सकते हैं | अपना विवेक जागृत कर हम शुभकामना
का आदान प्रदान तो कर ही सकते हैं | हम अगर गहराई से सोचें
तो पाएंगे कि जगत सिर्फ मित्रों से ही भरा हुआ है |

के.बी.व्यास
(आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए )
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