Wednesday, 8 June 2016


  नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है
  Woman can definitely perform last rituals  
                       
             नारी अंतिम संस्कार कर सकती है या नहीं, यह प्रश्न फेसबुक पर उठा था और इस पर बहुत विचार विमर्श हुआ. अब मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है | अब मुझे लगा कि अपनी बात को पूरे सबूतों के आधार पर लिखकर मैं पुस्तक में छापूंगा, लेकिन सबूत मिलेंगे कहाँ ? लेकिन जहां चाह होती है वहीं राह भी होती है, और मेरा अंतर्मन कह रहा था कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है. इस विषय पर मैंने जहां संभव हो सकता था खोजा और विभिन्न लोगों से बातचीत की |

                                                               
                      
       पुस्तक में छपने हेतु इस विषय पर मैंने तीन लोगों से इंटरव्यू लिए, एक डा. आशा रानी राय से जो कानपुर में महिला महा -विधालय की प्रिंसिपल है तथा वेदों की पूर्ण ज्ञाता हैं.ये हर रविवार को वेदों पर अपने विचार प्रकट करती हैं तथा पूरे भारत में भी भ्रमण करती है. साथ में प्रिंसिपल का पूरा काम सम्हाल रही हैं. दूसरा डा.जेठमल बोहरा से, जो जोधपुर में रहते हैं तथा पुष्करणों में एक अहम व्यक्तित्व हैं इनके घर पर इतनी किताबें हैं कि जितनी किसी अन्य पुष्करणा के घर में नहीं है, और सारी किताबे इन्होने पढ़ी हुई है. इन्होने करीब ५० लोगों को पी.एच.डी. में सहायता करवाई है तथा ये संस्कृत, अंगेजी और हिंदी के गहरे जानकार कहे जाते है.तीसरा मैंने सोमदत्त अग्निहोत्री जी का इंटरव्यू लिया जो आधुनिक समय में लोगों के बीच प्रचलित है.
मेरे पास निम्न लिखित साक्ष्य थे जो मुझे डा. आशा रानी राय से एवं डा. जेठमल बोहरा से प्राप्त हुए. इन दोनों का कहना था कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है.
                               
१)       वेदों में और उपनिषदों में नारी अंतिम संस्कार नहीं कर सकती इसका कोई निषेध नहीं है.
२)       स्मृति सन्दर्भ ग्रन्थ में अध्याय ७ पेज नम्बर ७९५ का ४९ में, जो कि पाराशर स्मृति: है इसके श्राद्धवर्णन में कहा गया है कि
पितु: पुत्रेण कर्त्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया
पुत्राभावे तु पुत्री च तद्भावे सहोदर:
याने पिता की पिंडदान क्रिया पुत्र द्वारा की जानी चाहिए, पुत्र के अभाव में पुत्री एवं उसके अभाव में सहोदर (भाई) को करनी चाहिए.
३)       पाराशरगृह सूत्र के तृतीयकाण्डम के दसवे भाग में बयालीस और तैयालीसवें सूत्र, पेज नम्बर ४३६ में कहा गया है
प्रत्तानामितरे  कुर्विरन.. ३/१०/४२
ताश्च तेषाम ...३/१०/४३
अनुवाद : विवाहित स्त्रियों का दाह संस्कार उनके पति करें और विवाहित स्त्रिया अपने पतियों का दाह संस्कार करें.(यहाँ प्रत्ता का मतलब विवाहित स्त्रीयों से है) 
४)       धर्मशास्त्र का इतिहास नाम के ग्रन्थ में अन्येष्टि करने के अधिकारी में ११४९ पेज पर निम्न लिखित बात लिखी हुई है शंख का कथन है कि पिता के लिए पिण्डदान एवं जल तर्पण पुत्र द्वारा होना चाहिए, पुत्राभाव में (उसकी अनुपस्थिती में या मृत्यु पर) पत्नी को अधिकार है और पत्नी के अभाव में सगा भाई (सहोदर) श्रादकर्म करता है ( स्मृतिचन्द्रिका २, पृष्ठ ३३५ ; निर्णयसिन्धु ३, पृष्ठ २८० )
५)       स्मृत्यर्थसार (पृष्ठ ९४ ) ने अधिकारियों का क्रम इस प्रकार दिया है  पिण्ड देने के लिए योग्य पुत्र प्रथम अधिकारी है, उसके अभाव  में पति,पत्नी एवं सह्प्त्नीयाँ होती है........ इस प्रकार दामाद  और श्वशुर भी कर सकते है, पुत्रवधू सास को पिण्ड दे सकती है.
६)       निर्णयसिंधु और धर्म सिन्धु में पत्नी को वैदिक मन्त्रों के साथ अंत्येष्टि कर्म करने की अनुमति देते हैं. इसमें आगे लिखा है कि अपनी बहनों, सोतेली बहनों, छोटी एवम बड़ी बहिनों के विषय में वे ही नियम लागू होते हैं जो भाइयो के विषय में हैं. इसी के पृष्ठ ३७० पर स्त्रियों के विषय में श्राद्धादिकारियों का क्रम देते हुए लिखा है .........पति के अभाव में पुत्री, उसके बाद पुत्री का पुत्र, उसके बाद देवर उसके बाद देवर का पुत्र...
७)       गरुड़ पुराण में ११ वे श्लोक में लिखा हुआ है कि पुत्र के अभाव में पत्नी अंतिम संस्कार कर सकती है.
           ये जो साक्ष्य थे ये समुचित थे कि मैं किसी से भी बात कर सकता था. तो मैं सोमदत्त जी अग्निहोत्री से विचार विमर्श करने पंहुचा. पहले तो उन्होने कहा कि नारी अंतिम संस्कार नहीं कर सकती. क्यों कि नारी के उपवीत संस्कार नहीं होता है इसलिए नारी इन सब कार्यों के लिए पूर्ण रूप से अनुपयुक्त है. मैंने कहा कि डा.अशारानी राय जो कानपुर में महिला महाविधालय की प्रिसिपल हैं उनहोंने तो अभी १०० कन्याओं के जनेऊ डाले है तो क्या वो गलत है ? उन्होंने कहा कि इस बारे में वे कुछ नहीं कह सकते. उन्होंने इतना जरुर कहा कि जनेऊ डाली हो तो सब अधिकार मिल जाते हैं,जो पुरुष को मिलते है, लेकिन नारी को जनेऊ नहीं डाली जाती है. नारी का जनेऊ पुरुष पहनता है इसलिए शादी के बाद पुरुष दो जोड़े जनेऊ पहनता है.
मैंनेदूसरे सभीसाक्ष्य प्रस्तुत किए तो उनहोंने बड़ी मुश्किल से कहा कि ......हाँ अंतिम विकल्प में नारी कर सकती  है. जब कोई भी न हो तो नारी कर सकती है मगर इसे सामान्य नियम नहीं समझना चाहिए.
मैंने फिर कहा कि अंतिम विकल्प में नहीं है, यहाँ पहले, दूसरे और तीसरे विकल्प पर नारी के अंतिम संस्कार करने के हक का जिक्र आया है, तो फिर ये कैसे आया?उनहोंने कहा कि ये कैसे आया है मुझे खुद समझ नहीं आया. पाराशर स्मृति में और स्मृतिचन्द्रिका में कैसे आ गया ये मेरी खोज का विषय है.
मैंने कहा स्मृति सन्दर्भ ग्रन्थ में पाराशर स्मृति, इसके अलवा पराशरसूत्र, धर्मशास्त्र,स्मृतिसूत्र, स्मृत्यर्थसार, निर्णयसिधु, धर्म सिन्धु इन सभी में आया है, तो क्या आपके हिसाब से इन्हें गलत माना जाए ?
उन्होंने कहा कि पराशर सूत्र में तो स्तिथी ऐसी है कि आप यूं समझीऐ कि शादी हुई और उसी वक्त पति की मृत्यु हो गई उस विशेष स्थिती का जिक्र है, और इसमें आपकी बात सही है, मगर दूसरी सारी जगह नारी का नाम पहले, दूसरे और तीसरे नम्बर पर कैसे आ गया ये मेरे लिए रिसर्च का विषय है. मैं इसकी खोज करूंगा और आपको बता दूंगा.
इस प्रकार वे अंत तक नहीं माने और कहते रहे, बिलकुल अंतिम स्थान पर नारी अंतिम संस्कार कर सकती है.
       उसके बाद में डा.जेठमल बोहरा से मिला. डा. जेठमल बोहरा ने कहा कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है, बस उसके जनेऊ डाली हुई होनी चाहिए, और इसके अलावा ये साक्ष्य मैंने आपके सामने रख दिए हैं, जो यह स्पष्ट तौर पर कहते है कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है. ग्रंथो को आधार मान कर सनातन धर्म चला है लेकिन बाद में आकर पुरुष प्रधान समाज हो गया और उन्होंने नारी को यह सुविधा नहीं दी जो उसे मिलनी चाहिए. असल में लोगों को शास्त्र पढने चाहिए तभी हमारा ज्ञान बढ़ेगा, और भ्रांतियां दूर होंगी. हालांकि वेद और दूसरे ग्रन्थ  मूलत: संस्कृत में है मगर आजकल अंग्रेजी में भी अपलब्ध हैं.इस तरह उन्होंने अपनी बात कही .
                  सबसे पहले मैंने डा. आशारानी रॉय का इंटरव्यू लिया था. मैं भारत आने के बाद कानपुर अपनी पत्नी के साथ गया था. १ अगस्त 2014 को मैं भारत आया और ४ अगस्त को कानपुर गया. डा.आशारानी रॉय ने कहा कि.. "नारी के साथ वेदों ने पूर्ण रूप से न्याय किया है. अंतिम संस्कार करने के लिए नारी भी उपयुत्त मानी गई है. नारी पुरोहित का काम भी कर सकती है. वेदों में ऋषी और ऋषीकाएं हुई हैं. पुरुष और नारी में कोई भेद नहीं है. दोनों जीवन में साथ साथ चलने वाले हैं और जीवन के विभिन्न आयामों पर समान रूप से उत्तरदायी है. उत्तरोतर काल में पुरुष प्रधान समाज के चलते इसमें बहुत बदलाव आया और नारी को किनारे कर दिया गया. असल में पुरुष और नारी एक समान हैं ना कोई कम ना कोई ज्यादा. लेकिन पुरुष प्रधान समाज ने पुरुष को आगे कर दिया और नारी को पीछे. जबकि दोनों बराबर हैं."
                                                                                               

              उन्होंने कहा  "वेद सत्य हैं और सबसे प्राचीन ग्रन्थ है तथा उसमें ऋग्वेद सबसे पहला ग्रन्थ है. और वेदों ने पुत्र या पुत्री किसी को भी एक दूसरे से ज्यादा नहीं बताया है. मनुष्य अपना कर्म करता है उसके अनुसार अपने फल भोगता है और चला जाता है. जब व्यक्ति अपनी देह त्याग कर चला जाता है तो उसका दाह संस्कार शालीन तरीके से होना चाहिए, यह एक मात्र उद्देश्य है. इसमें नारी भी अंतिम संस्कार कर सकती है, और निश्चित तौर पर कर सकती है."
               मैंने अंत में कहा नारी का स्थान समाज में बराबर का रहा है इस विषय पर एक पूरी किताब निकलनी चाहिए. उन्होने जवाब दिया कि "हाँ निकलनी चाहिए क्यों कि लोगों में गलत धारणाएं है जिन्हें दूर करना आवश्यक है. ये चीजे लोगों ने धर्म से जोड़ दी है और धर्म से जब कोई बात जुड़ जाती है तो भय होना स्वाभाविक है."

              मुझे आनन्द की अनुभूति हुई क्यों कि मेरा प्रश्न अब स्पष्ट उत्तर पा चुका था कि वेदों के अनुसार पुरुष और स्त्री में कोई भेद नहीं है दोनों समान रुपेण हैं, और नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है,और इसके लिए मैं डा.जेठमल बोहरा और डा.आशारानी रॉय का हृदय से कृतज्ञ हूँ. 

के.बी.व्यास 
                                                       
                                                

(आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा  और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए ) 

No comments:

Post a Comment