Monday, 20 June 2016

दो कान, दो आँखें और एक मुँह

               कुछ लोग बोलते हैं तो इतना बोलते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि क्या बोल गए | वे सामने वाले की सुनते ही नहीं | ऐसा लगता है उन्हें एक मुँह और मिल गया हो | जब दो लोग ऐसे मिल जाएँ तब किसी को किसी की बात समझ नहीं आती और जब १० में से ८ लोग ऐसे मिल जाएँ तब तो वहाँ बंटाधार है | एक की बात पूरी नहीं होती तो दूसरा शुरू हो जाता है , दूसरे की बात पूरी नहीं होती तो तीसरा अपनी बात कहने लगता है , फिर चौथा शुरू हो जाता है , फिर पाँचवाँ , फिर छटा, फिर सातवाँ और इस तरह पूरी धमाचौकड़ी मच जाती है | ऐसे लोगों को एक नेक सलाह है कि हमे सुनने के लिए दो कान और बोलने के लिए एक मुँह मिला है | हमें दुगुना सुनना है और उस हिसाब से आधा बोलना है | हमें दुगुना पढ़ना है और देखना है तब आधा बोलना है | यह करना कठिन है | जो इंसान जागा हुआ हो वही कर सकता है |
                 सबसे पहले दो कान और एक मुँह को लेते हैं | असल में दुनिया में हमें सबको सुनना चाहिये और भरपूर सुनना चाहिये | जो इंसान सब की सुन लेता है जाग कर, वो महान व्यक्ति है | जब हम विभिन्न इंसानों को सुनते है तो हमारा नजरिया बिल्कुल अलग हो जाता है | अलग अलग दृष्टिकोण सुनने को मिलते हैं | हो सकता है एक दृष्टिकोण दूसरे दृष्टिकोण से भिन्न हो और यहाँ तक कि दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत भी हो सकते हैं , मगर एक पॉइंट पर आकर सारे दृष्टिकोण एक हो जाते है |
                                                                
          उदाहरण के तौर पर मैं यहाँ विभिन्न धर्मों को लेता हूँ | धर्म यूं तो सभी अलग अलग हैं मगर शान्ति हो दुनिया में यह सारे धर्म चाहते हैं | तो यह एक कौमन दृष्टिकोण हो गया | विभिन्न धर्म सबसे अधिक विरोधाभासी लगते हैं | जिन लोगों को सभी धर्मों में एकाकार मिल जाता वो सही मायने में दो कान, दो आंख और एक मुँह वाली बात को साकार करते है | अपनी बात को दृढ़ता पूर्वक संक्षेप में कह के हमें दोनों कानों से सामने वाले की बात सुननी चाहिये और अपने मस्तिष्क को खुला रखना चाहिए |
                                            
            अब दो आँखे और एक मुँह को लेते है | हमें दो आँखे मिली हैं पढ़ने के लिए, देखने के लिए | तो हमे दुगुना पढ़ना चाहिए और उस हिसाब से बोलना चाहिये | हमें लोगों को दुगुना देखना चाहिये | उन्हें देखने के बाद , अपने भीतर निरीक्षण करना चाहिये | लोगों को देखने के बाद ही हम ये जान सकते हैं कि उनका नज़रिया क्या है | जब पढ़ने की बात चली है तो इस दिशा में अथाह सागर है | हम सारी उम्र तक पढ़ सकते है | जीवन की आखिरी साँस तक पढ़ सकते हैं | जितनी भाषाएँ हम जानते है , हम उतना पढ़ सकते है | विभिन्न जीवनियाँ हैं , कहानियाँ हैं , कविताएँ हैं , आलेख हैं, शायरी है , रुबाई है , गजल है और भी  कितनी विधाएं है |
                                         
                 जैसे अभी पूरे विश्व में कविता का नया रूप आया है - हाइकु | जो मूलतः तो जापान से आया है , मगर अलग अलग भाषाओं में भी लिखा जा रहा है | इसमें तीन लाइने होती हैं और तीनों लाइने अलग अलग होती हैं | कोई भी एक दूसरे से मेल नहीं खाती | पहली पंक्ति में ५ अक्षर , दूसरी में ७ अक्षर और तीसरी में पुनः ५ अक्षर होते हैं, मगर जब तीनों पंक्तियों को एक साथ पढ़ा जाए तो एक भाव उभर के आता है | जिसे हाइकु कहते हैं |
                                           
                       तो इस तरह पढ़ने के लिए अथाह सागर है | जिसने जितनी भाषाएँ सीख ली उस इंसान का उतना विस्तार हो गया | अकेले भारत में ही इतनी भाषाएं हैं कि हम उनके साहित्य को अगर पढ़तें जाएँ तो हमारी उम्र निकल जाए |

                  इंसान जितना ज्यादा सुनता है और पढ़ता है तथा लोगों को देखता है , उसे बात उतनी गहरी समझ में आती है | उसे लोगों के बीच में रहना अच्छा लगता है | उसके बाद वो अपनी बात अगर बोले तो उसकी बात का असर होता है | तो हम जितना बोलते हैं उससे दुगुना हमें सुनना चाहिये और जितना बोलें उससे दुगुना पढ़ना व देखना चाहिये | ऐसा अगर हम करें तो जीवन सार्थक हो जाता है |

के.बी.व्यास


 (आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा  और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए ) 

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