Friday, 10 June 2016

लिकता  चंद  जी रो इन्टरव्यू


काले दोपहर रो भोजन कर ने होचियो अबे थोडी देर पौड लियो जावे,
जरे तकिए माते मथॊ टिकायों ने २-४ मिनट इ ज हुया व्हेला ने आडे री घण्टी बाज गी...
अरे यार इण टैम कुण आयो, आ होचतो होचतो मैं आडो खोलियो तो हौमे ऊबा हा.........लिकता चंद जी .

                                                                 
लिकता चंद जी हाथ जोड ने बोलिया ..कई भा सा किकर ?
मैं कैयो .....लिकता  चंद जी आप और अबार ने म्हारे घरे ????
वे बोलिया मने ठा ही.... मैं थने ५० फ़ोन कर लिया हूं....मने ठा है न तो तू फ़ोन उठावेला, न पाछी कौल करेला, न म्हारो इन्टरव्यू लेवेला, जरे मैं होचियो हीदो घरे इ ज चालॊ, दोपारा खाणो खा ने तू थोडी देर हूया करे जरे मने ठा ही तू घरे मिलेला ही मिलेला.
मैं कैयो...आप वाकई लिकता चंद जी हो सा....वे चीकणा घडा व्है ज्यूं हंसता हुआ मौने आय ग्या...                                                                                                

ने सोफ़े माते बैठ ने बोलिया ...मने ठा है थारे इन्टरव्यू रो पैलो प्रश्न कई व्हैला.....वो व्हैला....लिकताई रो माहात्म्य कई है ?
मैं कैयो ..लिकता चंद जी  मैं तो की पूछियो ही कोई आपने और न पूछूं. लोग आपने चाहे कित्तो ही इशारो दे दे, आडॆ टेडे तरीके सू हमजा दे, डायरेक्ट मूंडे माते की कै देवे तौ भी आप आपरी लिकतायों नहीं छोडोला.
लिकता  चंद जी मुळक ने बोलिया...देख ऎडो है लिकताई कलयुग रो एक गुण है, लिकता पुराण में कैयोडो है..."हमजो तो अपमान नहीं हमजो तो कॊई अपमान नहीं"....ने हमें तू पूछेला म्हारा गुरू कुण है?
मैं कैयो ...मैं तो की पूछियो ही कोनी आपने और न की पूछूं.
पण लिकता चंद जी तौ लिकता चंद जी है....तौ वे एक आदमी री ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटू काडी जिणमे वो आदमी आपरी नाक ने हथाली सूं छुपायोडो बैठो हो, लिकता चंद जी बोलिया ऎ म्हारा नकटा गुरू जी है, योंरो कैवणो है कि आज रे ज़मौने में सुपरगिरी रो लाडू जिने खावणों है तो उनो एक महत्वपूर्ण अंश है.....लिकताई. और मने सुपरगिरी रो शौक है. मैं ही ज हूं हारों सूं सुपर, म्हारे सूं भत्तो कोई नहीं, ने अगर म्हारे सूं भत्तो कोई है तो मैं उण सूं डबल भत्तो, कोई कने नहीं बैठाई तो मैं उने कने ऊबो रैऊं, वो कने ऊबो नहीं राखी तो थोडो आगो जा ने ऊब जाऊं, और आगो जा ने ऊबूं जरे कैऊं ..हौमले वाळो म्हारे लेवल रो कोनी सा, इण वास्ते मैं खुद नैडो नहीं जा रियो हूं.......ने मौको मिलतो ही पाछो नैडो आ जाऊं......पाछो नेडो आ ने भेर लिकतायों करूं.
मैं कैयो आप तो ढीठ चंद जी व्हे ज्यूं बात कर रिया हो...वे मुळक ने कैयो, ढीठियो म्हारो रिश्ते में इ ज है सा, मौरे हूतक पिण्डरू लागे.....हमें तू पूछेला म्हारा और कुण कुण रिश्तेदार है, तौ हुण...ढीटियो म्हारो भाई है,

 नागाई कुचमादी ने ओछाई म्हारी बैहनों है,                         

 फ़च्चर म्हौरी जात है ने रौळो म्हौरो गोत्र .

मैं कैयो ...मैं तो की पूछियो ही कोनी आपने और न की पूछूं....यूं तो इंसानियत रे नाते आप सूं भी अपणायत है म्हारी पण जदे तक आप थोडी गरिमा नहीं बणा ने राखो, मैं की नहीं पूछूं, आपरी लिकताई सुं आपरी इज इज्जत पें बोल री है, ने आ सुपरगिरी, आ भत्तागिरी जिने जिने लागी है उने उने ले डूबी है......लिकता चंद जी मुळकता ही रैया --- वे की जवाब देवता इत्ते में म्हारे मोबाइल री घण्टी बाजी, मैं कौल उठावण रो बटण दो चार बार दबायो तो भी कोरी घण्टी इ ज हुणीजे...हारा बटण दबा ने देख लिया घण्टी बन्द इ ज नहीं हूवती.......मै होचियो ओ मोबाइल खराब हु ग्यो दीखे....कि अचानक भरी नींद सूं म्हारी औंख खुल गी, तकिये कने पडियो म्हारो मोबाइल बाजतो हो ......ने कौल करणिया हा ..........लिकता चंद जी.

                                                             
मैं एक बार फ़ेर कौल कोनी उठाई और व्योंरी कौल ने मैं कई .....कोई कोनी उठावे, हारा बाट जो रिया है उण दिन री जिण दिन लिकता चंद जी ने थोडी सी क खुद री गरिमा बणायोडी राखण री अक्कल आ जाई.



:- के.बी.व्यास

Wednesday, 8 June 2016


  नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है
  Woman can definitely perform last rituals  
                       
             नारी अंतिम संस्कार कर सकती है या नहीं, यह प्रश्न फेसबुक पर उठा था और इस पर बहुत विचार विमर्श हुआ. अब मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है | अब मुझे लगा कि अपनी बात को पूरे सबूतों के आधार पर लिखकर मैं पुस्तक में छापूंगा, लेकिन सबूत मिलेंगे कहाँ ? लेकिन जहां चाह होती है वहीं राह भी होती है, और मेरा अंतर्मन कह रहा था कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है. इस विषय पर मैंने जहां संभव हो सकता था खोजा और विभिन्न लोगों से बातचीत की |

                                                               
                      
       पुस्तक में छपने हेतु इस विषय पर मैंने तीन लोगों से इंटरव्यू लिए, एक डा. आशा रानी राय से जो कानपुर में महिला महा -विधालय की प्रिंसिपल है तथा वेदों की पूर्ण ज्ञाता हैं.ये हर रविवार को वेदों पर अपने विचार प्रकट करती हैं तथा पूरे भारत में भी भ्रमण करती है. साथ में प्रिंसिपल का पूरा काम सम्हाल रही हैं. दूसरा डा.जेठमल बोहरा से, जो जोधपुर में रहते हैं तथा पुष्करणों में एक अहम व्यक्तित्व हैं इनके घर पर इतनी किताबें हैं कि जितनी किसी अन्य पुष्करणा के घर में नहीं है, और सारी किताबे इन्होने पढ़ी हुई है. इन्होने करीब ५० लोगों को पी.एच.डी. में सहायता करवाई है तथा ये संस्कृत, अंगेजी और हिंदी के गहरे जानकार कहे जाते है.तीसरा मैंने सोमदत्त अग्निहोत्री जी का इंटरव्यू लिया जो आधुनिक समय में लोगों के बीच प्रचलित है.
मेरे पास निम्न लिखित साक्ष्य थे जो मुझे डा. आशा रानी राय से एवं डा. जेठमल बोहरा से प्राप्त हुए. इन दोनों का कहना था कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है.
                               
१)       वेदों में और उपनिषदों में नारी अंतिम संस्कार नहीं कर सकती इसका कोई निषेध नहीं है.
२)       स्मृति सन्दर्भ ग्रन्थ में अध्याय ७ पेज नम्बर ७९५ का ४९ में, जो कि पाराशर स्मृति: है इसके श्राद्धवर्णन में कहा गया है कि
पितु: पुत्रेण कर्त्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया
पुत्राभावे तु पुत्री च तद्भावे सहोदर:
याने पिता की पिंडदान क्रिया पुत्र द्वारा की जानी चाहिए, पुत्र के अभाव में पुत्री एवं उसके अभाव में सहोदर (भाई) को करनी चाहिए.
३)       पाराशरगृह सूत्र के तृतीयकाण्डम के दसवे भाग में बयालीस और तैयालीसवें सूत्र, पेज नम्बर ४३६ में कहा गया है
प्रत्तानामितरे  कुर्विरन.. ३/१०/४२
ताश्च तेषाम ...३/१०/४३
अनुवाद : विवाहित स्त्रियों का दाह संस्कार उनके पति करें और विवाहित स्त्रिया अपने पतियों का दाह संस्कार करें.(यहाँ प्रत्ता का मतलब विवाहित स्त्रीयों से है) 
४)       धर्मशास्त्र का इतिहास नाम के ग्रन्थ में अन्येष्टि करने के अधिकारी में ११४९ पेज पर निम्न लिखित बात लिखी हुई है शंख का कथन है कि पिता के लिए पिण्डदान एवं जल तर्पण पुत्र द्वारा होना चाहिए, पुत्राभाव में (उसकी अनुपस्थिती में या मृत्यु पर) पत्नी को अधिकार है और पत्नी के अभाव में सगा भाई (सहोदर) श्रादकर्म करता है ( स्मृतिचन्द्रिका २, पृष्ठ ३३५ ; निर्णयसिन्धु ३, पृष्ठ २८० )
५)       स्मृत्यर्थसार (पृष्ठ ९४ ) ने अधिकारियों का क्रम इस प्रकार दिया है  पिण्ड देने के लिए योग्य पुत्र प्रथम अधिकारी है, उसके अभाव  में पति,पत्नी एवं सह्प्त्नीयाँ होती है........ इस प्रकार दामाद  और श्वशुर भी कर सकते है, पुत्रवधू सास को पिण्ड दे सकती है.
६)       निर्णयसिंधु और धर्म सिन्धु में पत्नी को वैदिक मन्त्रों के साथ अंत्येष्टि कर्म करने की अनुमति देते हैं. इसमें आगे लिखा है कि अपनी बहनों, सोतेली बहनों, छोटी एवम बड़ी बहिनों के विषय में वे ही नियम लागू होते हैं जो भाइयो के विषय में हैं. इसी के पृष्ठ ३७० पर स्त्रियों के विषय में श्राद्धादिकारियों का क्रम देते हुए लिखा है .........पति के अभाव में पुत्री, उसके बाद पुत्री का पुत्र, उसके बाद देवर उसके बाद देवर का पुत्र...
७)       गरुड़ पुराण में ११ वे श्लोक में लिखा हुआ है कि पुत्र के अभाव में पत्नी अंतिम संस्कार कर सकती है.
           ये जो साक्ष्य थे ये समुचित थे कि मैं किसी से भी बात कर सकता था. तो मैं सोमदत्त जी अग्निहोत्री से विचार विमर्श करने पंहुचा. पहले तो उन्होने कहा कि नारी अंतिम संस्कार नहीं कर सकती. क्यों कि नारी के उपवीत संस्कार नहीं होता है इसलिए नारी इन सब कार्यों के लिए पूर्ण रूप से अनुपयुक्त है. मैंने कहा कि डा.अशारानी राय जो कानपुर में महिला महाविधालय की प्रिसिपल हैं उनहोंने तो अभी १०० कन्याओं के जनेऊ डाले है तो क्या वो गलत है ? उन्होंने कहा कि इस बारे में वे कुछ नहीं कह सकते. उन्होंने इतना जरुर कहा कि जनेऊ डाली हो तो सब अधिकार मिल जाते हैं,जो पुरुष को मिलते है, लेकिन नारी को जनेऊ नहीं डाली जाती है. नारी का जनेऊ पुरुष पहनता है इसलिए शादी के बाद पुरुष दो जोड़े जनेऊ पहनता है.
मैंनेदूसरे सभीसाक्ष्य प्रस्तुत किए तो उनहोंने बड़ी मुश्किल से कहा कि ......हाँ अंतिम विकल्प में नारी कर सकती  है. जब कोई भी न हो तो नारी कर सकती है मगर इसे सामान्य नियम नहीं समझना चाहिए.
मैंने फिर कहा कि अंतिम विकल्प में नहीं है, यहाँ पहले, दूसरे और तीसरे विकल्प पर नारी के अंतिम संस्कार करने के हक का जिक्र आया है, तो फिर ये कैसे आया?उनहोंने कहा कि ये कैसे आया है मुझे खुद समझ नहीं आया. पाराशर स्मृति में और स्मृतिचन्द्रिका में कैसे आ गया ये मेरी खोज का विषय है.
मैंने कहा स्मृति सन्दर्भ ग्रन्थ में पाराशर स्मृति, इसके अलवा पराशरसूत्र, धर्मशास्त्र,स्मृतिसूत्र, स्मृत्यर्थसार, निर्णयसिधु, धर्म सिन्धु इन सभी में आया है, तो क्या आपके हिसाब से इन्हें गलत माना जाए ?
उन्होंने कहा कि पराशर सूत्र में तो स्तिथी ऐसी है कि आप यूं समझीऐ कि शादी हुई और उसी वक्त पति की मृत्यु हो गई उस विशेष स्थिती का जिक्र है, और इसमें आपकी बात सही है, मगर दूसरी सारी जगह नारी का नाम पहले, दूसरे और तीसरे नम्बर पर कैसे आ गया ये मेरे लिए रिसर्च का विषय है. मैं इसकी खोज करूंगा और आपको बता दूंगा.
इस प्रकार वे अंत तक नहीं माने और कहते रहे, बिलकुल अंतिम स्थान पर नारी अंतिम संस्कार कर सकती है.
       उसके बाद में डा.जेठमल बोहरा से मिला. डा. जेठमल बोहरा ने कहा कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है, बस उसके जनेऊ डाली हुई होनी चाहिए, और इसके अलावा ये साक्ष्य मैंने आपके सामने रख दिए हैं, जो यह स्पष्ट तौर पर कहते है कि नारी अंतिम संस्कार कर सकती है. ग्रंथो को आधार मान कर सनातन धर्म चला है लेकिन बाद में आकर पुरुष प्रधान समाज हो गया और उन्होंने नारी को यह सुविधा नहीं दी जो उसे मिलनी चाहिए. असल में लोगों को शास्त्र पढने चाहिए तभी हमारा ज्ञान बढ़ेगा, और भ्रांतियां दूर होंगी. हालांकि वेद और दूसरे ग्रन्थ  मूलत: संस्कृत में है मगर आजकल अंग्रेजी में भी अपलब्ध हैं.इस तरह उन्होंने अपनी बात कही .
                  सबसे पहले मैंने डा. आशारानी रॉय का इंटरव्यू लिया था. मैं भारत आने के बाद कानपुर अपनी पत्नी के साथ गया था. १ अगस्त 2014 को मैं भारत आया और ४ अगस्त को कानपुर गया. डा.आशारानी रॉय ने कहा कि.. "नारी के साथ वेदों ने पूर्ण रूप से न्याय किया है. अंतिम संस्कार करने के लिए नारी भी उपयुत्त मानी गई है. नारी पुरोहित का काम भी कर सकती है. वेदों में ऋषी और ऋषीकाएं हुई हैं. पुरुष और नारी में कोई भेद नहीं है. दोनों जीवन में साथ साथ चलने वाले हैं और जीवन के विभिन्न आयामों पर समान रूप से उत्तरदायी है. उत्तरोतर काल में पुरुष प्रधान समाज के चलते इसमें बहुत बदलाव आया और नारी को किनारे कर दिया गया. असल में पुरुष और नारी एक समान हैं ना कोई कम ना कोई ज्यादा. लेकिन पुरुष प्रधान समाज ने पुरुष को आगे कर दिया और नारी को पीछे. जबकि दोनों बराबर हैं."
                                                                                               

              उन्होंने कहा  "वेद सत्य हैं और सबसे प्राचीन ग्रन्थ है तथा उसमें ऋग्वेद सबसे पहला ग्रन्थ है. और वेदों ने पुत्र या पुत्री किसी को भी एक दूसरे से ज्यादा नहीं बताया है. मनुष्य अपना कर्म करता है उसके अनुसार अपने फल भोगता है और चला जाता है. जब व्यक्ति अपनी देह त्याग कर चला जाता है तो उसका दाह संस्कार शालीन तरीके से होना चाहिए, यह एक मात्र उद्देश्य है. इसमें नारी भी अंतिम संस्कार कर सकती है, और निश्चित तौर पर कर सकती है."
               मैंने अंत में कहा नारी का स्थान समाज में बराबर का रहा है इस विषय पर एक पूरी किताब निकलनी चाहिए. उन्होने जवाब दिया कि "हाँ निकलनी चाहिए क्यों कि लोगों में गलत धारणाएं है जिन्हें दूर करना आवश्यक है. ये चीजे लोगों ने धर्म से जोड़ दी है और धर्म से जब कोई बात जुड़ जाती है तो भय होना स्वाभाविक है."

              मुझे आनन्द की अनुभूति हुई क्यों कि मेरा प्रश्न अब स्पष्ट उत्तर पा चुका था कि वेदों के अनुसार पुरुष और स्त्री में कोई भेद नहीं है दोनों समान रुपेण हैं, और नारी निश्चित तौर पर अंतिम संस्कार कर सकती है,और इसके लिए मैं डा.जेठमल बोहरा और डा.आशारानी रॉय का हृदय से कृतज्ञ हूँ. 

के.बी.व्यास 
                                                       
                                                

(आप इस आलेख से सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा  और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए ) 

२४ घंटे
            हमको एक दिन में २४ घंटे मिलते हैं | अब इसका उपयोग हम सार्थक कार्य में करें या निरर्थक कार्य में, ये हम पर ही निर्भर करता है | प्रधानमन्त्री को भी २४ घंटे मिलते हैं, युनाइटेड नेशंस के चीफ को भी २४ घंटे मिलते हैं, एक बिजनेस मैन को भी २४ घंटे मिलते है और हर नौकरी करने वाले को भी २४ घंटे मिलते हैं | इनमें से कोई तो अपनी उम्र में इतना कार्य कर जाता है कि हम सोच भी नहीं सकते और कोई कोई इतना सामान्य गति से कार्य करता है कि हम उसे कहते है, ये मनुष्य कार्य धीरे धीरे कर रहा है | देखना ये है की हम दुनिया में कौनसी गति से काम कर रहे हैं ?
                                                                         
            ये माना जाता है कि मनुष्य एक गति से कार्य करता है, लेकिन ये गति बढ़ाई भी जा सकती है और घटाई भी जा सकती है | हमारा ध्यान जिस दिशा में होता है वो चीज बहुत तेज गति से आगे बढ़ती है | जैसे अगर किसी का ध्यान कोई विज्ञान की किसी चीज पर है और वो कुछ खोजना चाहता है तो वो यह कर सकता है | कहते हैं कि हमारा ध्यान वहां केंद्रित हो जाना चाहिए तो वो चीज अंत में द्रुत गति से हो जाती है | ध्यान अक्सर एक दिशा में होता है लेकिन अगर ध्यान सभी दिशाओं में एक साथ हो जाए तो ? हर पल ध्यान सभी दिशाओं में हो, एक पल के बाद दूसरा पल इसी तरह गुजर जाए तो ? इसको पचाना जरा मुश्किल है, मगर हमारा ध्यान ऐसा हो सकता है |
                        
                 लाखों करोड़ों लोग हैं इस दुनिया में, सभी की अपनी अपनी गति है | जैसे पिछले २० सालों में हमने देखा कि जो प्रगति इंसान ने तकनीक में अब की है वैसी हमारी जानकारी में किसी ने अभी तक नहीं की | पिछले २० सालों में जो हम आगे बढे हैं वो वाकई तारीफ़ के काबिल है | ये किसी इंसान की ही गति है | तकनीकी तौर पर अभी कुछ नया आया ही होता कि पता चला कुछ महीनों में वो पुराना पड़ जाता है,और फिर कुछ नया आ जाता है | आने वाले १०० सालों में तो बहुत द्रुत गति से तकनीक में वृद्धि होगी | तो जिस तरह से गति हमारी तेज़ हुई है उसे देख के तो लगता है कि हमनें एक साल में दस बीस साल ज़ी लिए | कभी कभी तो लगता है कि कहाँ जा के रुकेगा ये सब | मगर जनाब ये रुकेगा कभी नहीं, इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा |
                                                             
                            हम बात कर रहे थे कि पूरी दुनिया में हम कौनसी गति पर हैं | क्या हम दुनिया में सबसे आगे है ? क्या हम दुनिया में सबसे पीछे हैं ? या ना आगे ना पीछे, हम बीच में हैं ? बीच के तो और भी अलग अलग स्तर हो सकते है | गति के साथ साथ हम सुरक्षित भी हैं, यह एक महत्वपूर्ण बात है | हमारे २४ घंटे में हम कितना आगे बढ़ते हैं और कितना अपने साथ लोगों को आगे बढाते हैं | उन लोगों को आगे बढाते हैं जो पीछे रह गए | इसलिए स्वयं की निरंतर प्रगति ही हमारा ध्येय होना चाहिए | अपने भीतर यह संकल्प लेना चाहिए कि हम आगे बढ़ेंगे और सबसे पीछे वाले को भी आगे बढ़ाएंगे |
                                              इसके लिए जरूरी है नियमितता | हम रोज यह सोचें कि आज हमें क्या करना है ? अगर हम सवेरे १० मिनट लगा कर यह तय कर लें कि आज के दिन क्या करना है तो शुरुआत हो सकती है | उसके बाद काम की गति को बढाते रहें | ४ से ६ काम लें, ६ से ८ काम लें फिर ८ से १२ काम लें, तो धीरे धीरे हम ४ या ६ महीने में वो सब कुछ कर लेंगे जो हमने सोच रखा था, और जो सोच रखा था उससे कहीं अधिक कर सकते हैं | उस समय हमें पता चलता है हमारे भीतर छुपी हुई कार्य क्षमता का | हमारे भीतर की कार्य क्षमता अनंत है और एक तरह से हमें आने वाले कई वर्षो की खबर पहले ही लग जाती है, सैंकड़ो वर्षो की बिलकुल ठीक ठीक समझ हमें पहले से ही आ जाती है |                         
                                                             
                      ये चक्र है समय का जो हमें यहाँ २४ घंटे के लिए मिला है, दूसरे ग्रहों  पर इससे ज्यादा का मिला हो सकता है कहीं पे कम | पृथ्वी २४ घंटे में एक अपना चक्कर लगाती है और एक पूरे साल में सूर्य के चारों तरफ एक चक्कर लगा लेती है | यह पृथ्वी का नियम है | इस २४ घंटे में हम अपनी गति को कितना बढ़ा सकते है ये हम पे निर्भर करता है | ये जिन्होंने जाना वो भी इंसान ही है मगर जागा हुआ इंसान है | जाग जाए तो जान जाए |

के.बी.व्यास 

(यह लेख मेरे अपने  विचारों की अभिव्यक्ति है | आप इससे सहमत हों या नहीं यह आपकी स्वतंत्रता है | उचित समझें तो जहाँ आपकी सहमति हो उसे अभिव्यक्त कीजिएगा  और जहाँ असहमति हो तो उसका कारण शेअर कीजिएगा , ताकि मेरा चिंतन और प्रखर हो सके | संभव है मुझे भी कुछ नया सीखने को मिल जाए ) 

Saturday, 27 December 2014

प्रार्थना का असर









प्रार्थना का असर
प्रार्थना का सिलसिला धर्म के अस्तित्व में आने से पहले का है. प्रार्थना का अर्थ है कोई कामना करना, कि जैसे मैं कामना करता हूँ कि आप स्वस्थ रहे. यह एक प्रार्थना हो गई. अब ये प्रार्थना कितनी बार की, कितनी गहरी की यह एक कदम आगे की बात है.फिर इसमें ये पक्ष भी आ गया कि प्रार्थना किससे की, इसलिए यह बात गौण है कि प्रार्थना किससे की. अपने अपने मत के अनुसार अलग अलग ईष्ट चुन लिए लोगों ने. सब सही भी हो सकते है,कुछ कम सही हो सकते है. मगर हम बात कर रहे है प्रार्थना के असर की.
प्रार्थना का असर बहुत ही गहरा है. इतना गहरा कि शायद हम सोच भी नहीं सकते. हम कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि इसका असर कितना गहरा होगा. कहते है अगर कोई पेड़ कट गया हो और प्रार्थना की जाए तो वह पेड़ एक बार फिर से हरा भरा हो सकता है, अगर पेड़ का केवल तना रह गया हो और प्रार्थना की जाए तो भी एक बार फिर से वो हरा भरा हो सकता है , अब यदि पेड़ को धरती के बराबर काट दिया जाए उसका तना पूरा काट दिया जाए तो भी प्रार्थना के दम पर वो एक बार फिर हरा भरा हो जाएगा, और अब यदि उसकी जड ही निकाल दी जाए तो? प्रार्थना में वो असर है कि तब भी एक पेड़ वहां खड़ा हो सकता है और हरा भरा हो सकता है. 


    सोचना पड़ता है गहन चिन्तन करना पड़ता लेकिन लोग ये सोचते हैं कि हमें केवल प्रार्थना करनी है कोई कर्म नहीं करना,जबकि प्रार्थना में कर्म समाया हुआ है. बिना प्रार्थना के अगर कोई कार्य शुरू करें तो उसके गलत होने का अंदेशा रहता है प्रार्थना कर के कर्म ना करे तो केवल खोखली बात रह जाती है. प्रार्थना और कर्म कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं.
कई बार ये होता है कि हम जिस बात के लिए प्रार्थना करते हैं, निरंतर कर्म भी करते हैं मगर फिर भी वो प्रार्थना पूरी नहीं होती. इस बात पर मैं मेरी माँ का एक उदाहरण देता हूँ लोगों को. वो जोधपुर के बहुचर्चित स्कूल बाल् निकेतन में स्कूल अध्यापिका थी. उनका रिटायर्मेंट होने से २ दिन पहले राजस्थान सरकार ने एक्स्टेंशन देना बंद कर दिया. अब २ दिन पहले एक्स्टेंशन बंद हुआ तो माँ को बहुत निराशा हुई. वो प्रार्थना करती थी इसलिए मैंने कहा आप यकीन रखिए इसमें कुछ न कुछ भला ही होगा. लेकिन एक वो बात कि जो होता है भले के लिए होता है सोच कर वो शांत हो गई. मगर गाहे बगाहे उनकी वो उदासी झलक जाती.
      मेरी माँ ने अपनी ग्रेचुटी ली अपना हिसाब पूरा किया और रिटायरमेंट ले लिया. उसके बाद वो २ साल में ६ बार शारजाह आई और बड़े मजे से जिन्दगी कटी. अब दो साल बाद पीछे के लोगों के भी रिटायर्मेंट थे मगर जब वे रिटायर हुए तो सरकार ने कह दिया उनके पास पैसा नहीं है इसलिए न कोई ग्रेचुटी है और न कोई पैसा. तो २ साल बाद उनको समझ में आया कि उस वक्त अगर उनका एक्स्टेंशन हो जाता तो आज वो ग्रेचुटी और पैसा जो मिला, जो इंसान की उम्र भर की पूंजी होती है वो नही मिलता. और इन दो सालों में उन्होंने जिन्दगी को पूरा जिया. रिटायरमेंट पर पैसा भी लिया और बड़े आराम से वे तमाम जगह घूमी.
   यह होता है प्रार्थना का असर. हमें विशवास रखना होता है कि जो हो रहा है हमारे हित में हो रहा है. कई मायनों में २ के ४ साल लग जाएँ ४ के ६ साल लग जाएं, पूरी जिन्दगी लग जाए मगर प्रार्थना पूरी हो के रहती है. पूरे मनोयोग से जब प्रार्थना होती है तो पूरी होती है. यह अटल सत्य है.

के.बी.व्यास 


Friday, 26 December 2014

हमने कर्म करने प्रारंम्भ कब किए ?



 हमने कर्म करने प्रारंम्भ कब किए ? 
यह एक जटिल प्रश्न है मगर फिर भी एक सामान्य उत्तर प्रस्तुत कर सकता हूँ कि कर्म हमने पूर्व जन्म जन्मान्तरों में किए जिसका फल या तो भोग रहे है अन्यथा आगे भोगेंगे इसके अलावा हम अब भी हर पल कर्म कर रहे है.प्रतिपल नया कर्म कर रहे हैं. और न जाने कब से कर रहे है सौ, दौ सौ ,चार सौ, हजारो, लाखो, करोड़ो, अरबो, खरबों,अनंत सालो से अनगिनत असीमित असंख्य सालो से कर रहे है. हर पल में दो काम हो रहे है एक तो जो कर्म किया उसका फल भोग रहे है और दूसरा नया कर्म भी कर रहे है, जो बाद में फल देगा. ये दोनों काम एक साथ हो रहे हैं.
अब नया कर्म जो कर रहे है वह अमूमन पुराने कर्मो के प्रभाव में हो रहा है. और इसी तरह कर्मों का एक चक्र निर्मित होता है. इसलिए जिनके कर्म उलटे है उनके अमूमन उलटे ही कर्म होते है और जिनके सीधे कर्म होते है उनके सीधे होते है तथा जिनके दोनों मिले जुले होते उनके पुनह मिले जुले कर्म हो जाते हैं. मरने पर हमारे कर्मो की एक बैलेंस शीट बन जाती है. एक तरह से हम कर्म चक्र में बंध जाते है और सदियों से वही कर्म किये जाते है. तब प्रश्न यह उठता है कि आखिर कर्म बदलें कैसे ? इसी एक काम के लिए कुछ लोगों ने जन्म लिए है जिन्हें गुरु कहा जाता है. लोगों के कर्म बदलने के लिए ही गुरु जन्म लेता है और लोगों के कर्म बदल कर वो चला जाता है. यहाँ कर्म को अच्छे में बदलने की बात हो रही है. इसलिए जब भी कर्म बदलना हो एक गुरु का समर्पण के साथ होना जरुरी है.
सच्चे गुरु में और बुद्ध में कोई अंतर नहीं. मूलतः हम बुद्ध है. हर कोई बुद्ध है इसलिए हर कोई आदर के योग्य है. कई जन्म जन्मान्तरो पहले हम बुद्ध थे. जब सृष्टि शुरू नहीं हुई थी तब हम सभी बुद्ध थे. फिर सृष्टि शुरू हुई  और कालान्तर में हम कुछ और बन गए. यह थोडा जटिल विषय है.
पुल्लिंग या स्त्रीलिंग दोनों में से कुछ भी उस वक्त हुए और होते चले गए. कई योनिया बदली और वर्तमान में मनुष्य है. मनुष्य के भीतर जो छुपा हुआ है वह अद्भुत है. हम मूलतः बुद्ध है का अर्थ है हममे सामर्थ्य है बुद्ध बनने की. हममें योग्यता है बुद्ध बनने की. सारे कर्मों का निष्कर्ष है कि हम जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते है. इसे समझने की कोशिश करें.
जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति संभव नही लेकिन जन्म और मृत्यु के दुःख से मुक्ति मिल सकती है. जन्म और मृत्यु दोनों को सुखी बनाकर, और जन्म और मृत्यु दिखते दो है मगर हैं एक ही. इसे सीढ़ि चढना बोल सकते है और इसके ऊपर पहुच कर हमें बुद्ध होने का ज्ञान होता है.मानव ही मुक्त होता है और मुक्त अवस्था में वह जन्म और मृत्यु का अनुभव करता है यानी मानव ही बुद्ध बनता है, और बुद्ध बनने के बाद वो दूसरों के बुद्ध बनने का इन्तजार करता है और सही वक्त पर जन्म लेता है. यह क्रम बहुत पहले से चल रहा है. वह प्रकृति का आनन्द लेता है, वह सुरों में डूब जाता है, वह हर पल का आनन्द उठाता है. केवल जीवित रहना ही उसके लिए आनन्द है फिर इसमें आने वाले कष्ट तो मात्र हवा है. वह हर कष्ट को उत्साह और उमंग से लेता है. और फिर मृत्यु भी उसके लिए आनन्द है. यही फर्क है गुरु में और दूसरे इंसान में. कष्ट को हंसते हुए सहकर गुरु आनन्द की स्थिति में रहता है.
सृष्टि का अंत जिस दिन होगा हम पुनः बुद्ध होगे. सृष्टि का आरम्भ हुआ है तो इसका अंत भी होगा. सूर्य की भी एक उम्र है चन्द्रमा की भी एक उम्र है हर ग्रह की एक उम्र है.लेकिन जो सूर्य चन्द्र पृथ्वी इन सबसे परे है, वो हम है, वो हम ही हैं. इस जीवन का यही सार है. 

Wednesday, 30 October 2013

समझ पुराण से उदृत सात महान सूत्र


  • जो समझने को तैय्यार हो उसे समझा दो
  • जो समझने को तैय्यार तो हो लेकिन समझाने पर भी नहीं समझ पा रहा हो उसके लिए प्रार्थना करो, और फिर समझाओ
  • जो समझने को तैय्यार न हो उसे एक जोक सुना के विदा करो
  • जो समझ के भी नासमझ बना रहे उसे मुस्कुरा के साइड में करो, क्यों कि उसे वास्तव में तो समझ में आ ही गया है
  • जिसे समझाने पर उल्टे आप पर ही क्रोध की उल्टियां हो रही हों, उसे तारीफ़ का ईनो पिला दो
  • जो अपने आप को समझदार का पूंछडा समझता हो उसके लिए कुछ मत करो एक दिन वो खुद ही अपनी डेढ़ समझदारी में फंस के रह जाएगा
  • और जिसे आपका स्व - विवेक समझदार कहे, उसकी संगत में बैठे रहो .....................के.बी.व्यास 

Tuesday, 29 October 2013


दुआओं में हाथ उठे रहें तो बेहतर है

जमीन पे पांव टिके रहें तो बेहतर है


अभी तो बहुत काम बाकी है


रोज मन-कचरा साफ़ होता रहे बेहतर है .....के.बी.व्यास